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  • योग पारिजातधन योग

    टी.पी. त्रिवेदी
    श्रीमती मृदुला त्रिवेदी

    योग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
    किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
    योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।

     

    360.00450.00
  • योग पारिजातभाग्य योग

    टी.पी. त्रिवेदी
    श्रीमती मृदुला त्रिवेदी

    योग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
    किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
    योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।

    360.00450.00
  • योग पारिजातराजयोग

    योग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
    किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
    योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।

    360.00450.00
  • रहस्यावरण से मुक्तिवास्तु(जीने की कला और विज्ञान)

    पुस्तक के बारें में
    वास्तुशास्त्र प्रसन्न और संतुष्ट दीर्घ जीवन जीने की कला और विज्ञान है। आजकल तेज भागती प्रौद्योगिकी के युग में रहन-सहन की गलत जीवन शैली के कारण बहुत सी बीमारियां पैदा को रही हैं। वास्तु के शास्त्रीय ग्रंथों में प्राचीन जीवन शैली का वर्णन मिलता है, जिसमें आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन होने चाहिए।
    पुस्तुत पुस्तक ‘रहस्यावरण से मुक्ति, वास्तुः जीने की कला और विज्ञान वास्तुसम्मत रहन-सहन की प्राचीन पद्धति और गृह निर्माण व वास्तु-कला की आधुनिक प्रौद्योगिकी का सुबोध सम्मिश्रण है। वास्तुशास्त्र की तकनीकी और विधियों के मानकीकृत और व्यवस्थित रूप का पूर्ण परिचय इस पुस्तक में मिलता है।
    पुस्तक तीन खंडों में विभाजित हैं। प्रथम खंड वास्तु की उन मूल अवधारणाओं, सिद्धांतों और शक्तियों की गहरी समझ के प्रति समर्पित हैं, जो किसी स्थान विशेष को प्रभावित करती हैं। पुस्तक का दुसरा खंड रहस्योद्घाटन करता है कि किस प्रकार हम इस घरा पर, अपने घर में ही, स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि किस प्रकार हम घर की बाहरी शांति की स्थापना द्वारा मन की आंतरिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। तृतीय खंड वास्तु के नित्यप्रति उपयोग से संबंधित हैं। एक अलग अध्याय में कार्यस्थल वास्तु की भी विस्तृत चर्चा की गई है, जो कई दृष्टियों से, रिहायशी वास्तु से अलग है।
    यह पुस्तक वैदिक ज्योतिष से सुनिश्चित सिद्धांतों के अनुसार लिखी गई है। वैदिक ज्योतिष, वास्तुशास्त्र का अभिन्न अंग है। ज्योतिष यदि दशाओं पर निर्भर है, तो वास्तु दिशाओं पर। ज्योतिष मे कालपुरुष की आवधारणा है, तो वास्तु में वास्तुपुरुष की।
    प्रस्तुत पुस्तक में वास्तुशास्त्र की प्राचीन प्रज्ञा की व्याख्या करने के लिए भवन निर्माण के वर्तमान ज्ञान को भी समहित किया गया है ताकि प्राचीन परंपराओं और आधुनिक सोच के बीच की दरार को पाटा जा सके। फेंगशुई तथा पिरामिडशास्त्र आदि अन्य समानांतर विद्याओं में अतिक्रमण करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। इन दोनों विद्याओं को पूर्णतः अलग अध्ययन अपेक्षित है। यह पुस्तक मुख्यतः उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो वास्तु को एकदम प्रारंभ से सीखना चाहते हैं, और इसके गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन का अनुसरण करना चाहते हैं। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए भी मील का पत्थर सिद्ध होगी जो वास्तुशास्त्र के अब तक अछूते पड़े क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहते हैं, उदाहरणतया विशिष्ट दिशाओं की उपयोगिता, वास्तुपुरुष के गुहा अर्थ, पैंतालीस देवता, दिकपाल, तीन प्रकार की ऊर्जाएं, पंचमहाभूत, वास्तुकला की सहायता से घर और इसमें रहने वालों का भाग्य बताना आदि।

    400.00450.00
  • लघु पाराशरी

    लघुपाराशरी की लोकप्रियता इसीलिए इतनी बढ़ी, क्योंकि यह उपरोक्त तीन बिन्दुओं में से दूसरे बिन्दु पर केन्द्रित है। पहले बिंदु का विवरण तो लगभग सभी सामान्य शास्त्रों में दिया ही गया है। तीसरे बिंदु का महत्त्व भी षड्बल से स्पष्ट हो जाता है जिसका वर्णन भी सामान्यतः सभी शास्त्रों में मिल जाता है। दूसरे बिंदु पर व्याख्या और वैज्ञानिक सूत्रों का लघु रूप में एकत्रीकरण करके प्रस्तुत करना अद्वितीय था। सारावली में केवल भावेश के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा है कि बुद्धिमान ज्योतिषी को होराशास्त्र में वर्णित फलादेश का भावाधिपति के आधार पर ही विचार करना चाहिये क्योंकि भावेश के बिना इस फलित में एक भी कदम चलना असंभव है।

    इस संपूर्ण पुस्तक को 5 अध्यायों में विभाजित किया गया है।

    100.00120.00
  • लघु पाराशरी

    सम्भव है, स्वयं महर्षि पाराशर या उनके किसी सुयोग्य शिष्य ने इस लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो। पंडित मुकुन्द वल्लभ दैवज्ञ की ‘उडुदाय प्रदीप’ तथा डॉ. सुरेश चन्द्र मिश्र की ‘लघु पाराशरी’ से मुझे पर्याप्त सहायता मिली-मैं इनका हृदय से आभारी हूँ।

    160.00200.00
  • वर्ग कुण्डली रहस्य

    इंजीनियर मित्रों की कुंडली में राक्षस दशांश ने ही इस पुस्तक का बीजारोपण किया-ऐसा मानना अधिक न्यायसंगत होगा। इसी बीच गुरुजन के आदेश और मित्रों के आग्रह से वर्गों में संज्ञा विचार पर एक लघु पुस्तिका भी मेरे नाम से प्रकाशित हुई।

    300.00350.00
  • विशोतरी दशफल तरंगिणी

    वर्तमान पुस्तक विशोतरी दशा पर सर्वोत्कृष्ट रचना है। लेखक ने ‘सत्य-जातंकम्’, ‘वृहत्पराशर होराशास्त्रा’, ‘फलदीपिका’, ‘भावार्थरत्नाकर’, तथा ‘उत्तरकालामृत’ में उपलब्ध एतत्संबंधी लाभदायक सामग्रियों को एक नए कलेवर के रूप में प्रस्तुत किया है। ग्रहों के भावेश के रूप में विभिन्न भावों में क्या दशाफल होंगे, जन्म लग्न से तथा दशानाथ से विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के दशाफल कैसे होंगे, नक्षत्राधिपत्य तथा राश्याधिपत्य के अनुसार ग्रहों के दशाफल कैसे होंगे आदि का विचार व्यापक रूप में इस पुस्तक में किया गया है। वैदिक त्रिकोणों के आलोक में लेखक ने भावेशों के दशाफल का जो पुनर्मूल्यांकन किया है, पुनः लेखक ने बाधक सिद्धान्त की कतिपय त्रुटियों के सुधार का जो प्रस्ताव दिया है वह सभी सामग्री पराशरी ज्योतिष में नये प्राण फूंकने का कार्य करेगी। प्रतिकूल फल देने वाली महादशाओं तथा अंतर्दशाओं की शान्ति हेतु प्रत्येक लग्न के लिए कैन-से देवताओं की उपासना की जाए। कौन से रत्न धारण किये जाएँ और कौन से रत्न धारण नहीं किये जाएँ, इसकी जितनी गहराई से इस पुस्तक में छान-बीन की गई है, वह अन्यत्रा किसी पुस्तक में आपको देखने को नहीं मिलेगी। ज्ञान तथा व्यवहारिक उपयोगिता की दृष्टि से विशोत्तरी दशा फल तरंगिणी महादशा पर यह एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है, जिसे पाठकों के विशेष अनुरोध पर लेखक ने लिखा है। आशा है, जिज्ञासु पाठक इसे सहृदय अपनाएँग

    160.00200.00
  • व्यवसाय रत्नाकर

    ग्रन्थ-परिचय

    व्यक्तित्व के निर्माण में स्वस्थ शारीरिक संरचना, उत्तम आचरण के अतिरिक्त व्यवसाय की प्रकृति की उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती। व्यवसाय की दिशा, गति, मति और प्रगति ही व्यक्ति की पहचान होती है। व्यावसायिक गतिविधियों से ही व्यक्ति के सामाजिक स्तर का अनुमान लगाया जाता है। व्यवसाय का स्थायित्व जितना आवश्यक है, संप्रति वह उतना ही संदिग्ध भी है। व्यवसाय की परिवर्तनशील गति जीवन को अनेक स्तरों पर संदेह की परिधि में विभाजित कर देती है। व्यवसाय रत्नाकर में समृद्ध सूत्रों और जन्मांगों के गहन विश्लेषण के आधार पर, सटीक व्यवसाय के निर्धारण में सहायता प्रदान करने वाली शोधपरक प्रविधि प्रस्तुत की गई है जिसके अनुसरण से जातक / जातिका के व्यवसाय की दिशा का सही अनुमान लगाकर ज्योतिष शास्त्र की प्रामाणिकता तो प्रतिष्ठित होती ही है, साथ ही जातक का अबाधित जीवन सही दिशा की ओर तीव्रता से प्रगति पथ पर प्रशस्त होता है।

    यदि व्यवसाय का चुनाव करने में त्रुटि हो जाए और प्रतिकूल दिशा की ओर व्यवसाय किया जाए, तो आर्थिक उन्नति तथा प्रगति भी अत्यन्त शिथिल और मन्द हो जाती है। जातक के जन्मांग के अनुरूप व्यवसाय करना, उसे अपार सफलता, प्रशंसा, धन आदि सभी कुछ प्रदान करता है। व्यवसाय और धन दोनों समानान्तर शब्द हैं। व्यवसाय के अभाव में धन नहीं आता और धन व्यवसाय द्वारा ही प्राप्त होता है, इसलिए अनुकूल व्यवसाय करना प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता होती है। प्रचुर अभ्यास के आधार पर उपलब्ध सूत्रों का जन्मांग पर क्रियान्वयन करने पर सटीक व्यवसाय का निर्णय करने में त्रुटि होने की संभावना नहीं होती है।

    व्यवसाय रत्नाकर अग्रांकित संपुष्ट और संपूर्ण अध्यायों में व्याख्यायित हैः 1. भाग्य भवन और व्यवसाय व्यवस्था, 2. आत्माकारक ग्रह एवं व्यवसाय, 3. व्यापार: आजीविका का आचार, 4. व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय भाव की भूमिका, 5. षष्ठ भाव एवं नौकरी, 8. व्यवसाय निर्धारण में अष्टम भाव का महत्व, 7. प्रमुख ग्रहयोग, 8. बाधक ग्रह-सिद्धान्त एवं समाधान।

    प्रमुख ग्रहयोगों से सम्बन्धित समृद्ध सामग्री व्यवसाय रत्नाकर का वैशिष्ट्य है। व्यवसाय निर्धारण में आत्माकारक ग्रह की विशिष्ट भूमिका का भी रेखांकन इस कृति में सन्निहित है। आत्माकारक ग्रह के आधार पर निर्मित जन्मांग द्वारा जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान सहज ही हो जाता है। इस अनुसंधानपरक प्रविधि का व्यवहारीकरण कृति में प्रचुर उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। व्यवसाय रत्नाकर शीषाकित यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों व श्रेष्ठ ज्यातिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    400.00450.00
  • व्यवसाय विमर्श

    ग्रन्थ-परिचय

    हमारे ऋषि मनीषियों ने भारतीय संस्कृति एवं संस्कार के अलौकिक आलोक में व्यवसाय की विस्तृत व्यवस्था को परम्परागत प्रतिभा, शिक्षा, योग्यता, विद्वता तथा कार्यकौशल के आधार पर श्रृंखलाबद्ध किया है। सम्प्रति, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव हेतु माता-पिता का प्रारम्भिक दायित्व है कि वे बालक की अभिरुचि के अनुसार उसके व्यवसाय की दिशा बाल्यकाल में ही सुनिश्चित करें और तदनुसार ही शिक्षा-दीक्षा का आधार निर्मित करें। उपयुक्त विषय के अध्ययन के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षा प्रतिष्ठान, योग्य, सुशिक्षित व अनुभवी शिक्षक, बालक के भविष्य के व्यवसाय के संदर्भ में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करते हैं। इस प्रकार जातक की अभिरुचि व ग्रहस्थिति के अनुसार उसकी शिक्षा के परिणाम भी अत्यन्त उज्ज्वल होंगे, जो उसके प्रबल व्यवसाय के निर्माण में अत्यन्त सहायक सिद्ध होंगे।

    व्यवसाय विमर्श को अग्रांकित बारह अध्यायों में विभाजित किया गया है: 1. अनुभव सिद्ध शोध सूत्र, 2. न्याय संदर्भित निजी व्यवसाय अर्थात् अधिवक्ता बनने के ग्रहयोग, 3. पुलिस एवं रक्षा विभाग, 4. अध्यापन हेतु ग्रहयोग, 5. लेखाकार एक व्यवसाय, 6. पत्रकारिता : एक व्यवसाय, 7. विज्ञान एक व्यवसाय, 8. खेलकूद: एक व्यवसाय, 9. अभिनय: एक व्यवसाय, 10. सन्त, संन्यासी एवं महर्षि बनने के योग, 11. व्यवसाय का विचार: नवांश का आधार, 12. दशमांश चक्र और आजीविका।

    उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव उतना ही आवश्यक है जितना कि अनुकूल शिक्षा का चुनाव। व्यवसाय पर केन्द्रित इस शोध प्रबन्ध के अध्ययन और अनुसरण के उपरान्त ज्योतिर्विदों की, आगंतुकों के व्यवसाय पथ प्रदर्शन हेतु दिशा-निर्देश करने की चेष्टा समाज के उत्सर्ग और उत्थान में अप्रतिम सहयोग प्रदान करेगी, यही हमारी मंगलाशा है।

    व्यवसाय विमर्श शीर्षांकित इस कृति के अन्तर्गत कतिपय प्रमुख व्यवसाय हेतु उत्तरदायी ग्रहयोगों का समावेश किया गया है जिनके अध्ययन, अनुसरण और क्रियान्वयन द्वारा जातक के व्यवसाय को रेखांकित करने में सफलता प्राप्त होती है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी का ज्योतिष शास्त्र पर आधारित 40 वर्षों से भी अधिक का अनुभव और अनुसंधान, जो विशेष रूप से व्यवसाय पक्ष पर केन्द्रित है. का बहुआयामी विश्लेषण व्यवसाय विमर्श में समायोजित है।

    सटीक व्यवसाय का निर्णय करने हेतु नवांश और दशमांश चक्र के अध्ययन की अनिवार्यता असंदिग्ध है। दशमांश चक्र के आधार पर जन्म समय का संशोधन करने की प्रविधि भी इस कृति के अन्तर्गत व्याख्यायित है जिसके आधार पर त्रुटिपूर्ण दशमांश, नवांश और जन्मांग का संशोधन करने के उपरान्त व्यवसाय सम्बन्धी सटीक भविष्यकथन करने में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त होती है। अतः व्यवसाय विमर्श समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अध्येताओं, जिज्ञासुओं, प्रबुद्ध पाठकों आदि के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    400.00450.00
  • व्याधि विभावरी( रोगमुक्त जीवन )

    व्याधि विकार और विविध विकृतियों से विमुक्त होने हेतु किसी सघन और प्रमाणित सामग्री के अभाव ने ही देश के प्रतिष्ठित, विद्वान श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी को व्याधि पर केन्द्रित व्याधि विभावरी नामक शोध प्रबन्ध की संरचना हेतु प्रेरित व प्रोत्साहित किया। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक ऐसे मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं, जिनके नियमित एवं निरन्तर अनुसरण से कैंसर और एड्स जैसी कर्मज व्याधियों का भी शमन संभव है।

    व्याधि विभावरी से तात्पर्य है व्याधिमुक्त करने वाली आनन्दप्रदायक सुखपूर्ण रात्रि। ज्योतिष शास्त्र में विविध वीभत्स व्याधियों के ग्रहयोगों के अनेकानेक विधान व्याख्यायित व विवेचित हैं। व्याधियों की चिकित्सा और निदान की अनिवार्यता भी असंदिग्ध है। किसी भी व्यक्ति के व्याधिग्रस्त होने पर प्रायः महामृत्युंजय जप का परामर्श प्रदान कर दिया जाता है। कब, कहाँ, किस स्थिति में मृत्युंजय मंत्र शीघ्र लाभप्रदायक सिद्ध होगा, इसकी अनिवार्यता असंदिग्ध है। क्या महामृत्युंजय के जप मात्र से कैंसर, एड्स, पक्षाघात, हृदयाघात, लीवर सिरोसिस, ब्रेन हैमरेज व पागलपन जैसी असाध्य व्याधियों की चिकित्सा के समय महामृत्युंजय मंत्रजप का अनुष्ठान करने से अपेक्षित सफलता उपलब्ध हो सकती है? ऐसी असाध्य व्याधियों से मुक्त होने हेतु अनेक विशिष्ट मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि का सविधि अनुष्ठान संपादन करने से व्याधिग्रस्त व्यक्ति का व्याधिमुक्त होना, अनेक अवसरों पर अनुभवसिद्ध है।

    स्वास्थ्य रक्षा हेतु विविध असाध्य व्याधियों से मुक्ति हेतु अनेक दुर्लभ मंत्र अनुष्ठान, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान व्याधि विभावरी के अंतर्गत आविष्ठित हैं। कब, कहाँ, किन स्थितियों में किस मंत्र प्रयोग का अनुकरण करके साधक शीघ्र व्याधिमुक्त हो सकेगा, इसका विस्तृत विवेचन कृति के अग्रांकित अध्यायों में व्याख्यायित व विश्लेषित हैः 1. नवग्रहकृत परिहार, 2. विविध ग्रहकृत व्याधिविधान एवं समाधान, 3. बालरोग शमन साधना, 4. कर्मज व्याधि शमन विधान, 5. मंत्र शक्ति द्वारा व्याधिमुक्ति विधान, 6. ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म का संत्रास, 7. गण्डमूल में जन्म : अनिष्ट शमन, 8. अशुभ जन्म समय संज्ञान, 9. गंभीर व्याधि परिहार परिज्ञानः प्रबल मारकेश शमन विधान, 10. अथर्ववेद के अन्तर्गत व्याधि शमन विधान, 11. गुरु परम्परा : सिद्ध अनुष्ठान।

    असाध्य व्याधि से आक्रांत व्यक्ति हेतु व्याधि विभावरी में सन्निहित मंत्र प्रयोग, अनुष्ठान आदि संजीवनी सिद्ध होंगे, इसमें किंचित सन्देह नहीं है। व्याधि विभावरी मात्र ज्योतिषियों अथवा ज्योतिष प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी व्यक्तियों के लिए पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय शोध प्रबन्ध है।

    320.00400.00
  • व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )

    व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।

    व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।

    व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।

    व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है

  • व्यावसायिका

    ग्रन्थ-परिचय

    व्यावसायिका जीविकोपार्जन के सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोपयुक्त माध्यम का ज्योतिष सुलभ स्वर्णिम सिद्धान्त और सशक्त सूत्र तथा सारस्वत संज्ञान द्वारा धनार्जन के विधि-विधान व प्रावधान का पूर्वानुमान करके तदनुसार उपयुक्त शिक्षार्जन की ओर प्रशस्त व गतिशील होकर उपयुक्त व्यवसाय चयन हेतु गहन चिंतन-मनन की गणना का अलौकिक आधारस्तम्भ है। व्यवसाय का निर्धारण, जीविकोपार्जन की उपयुक्त दिशा और बालक की प्रतिभा की गति, मति, प्रगति एवं उन्नति आदि पर विचार करने में, सदा शीघ्रता करना अपेक्षित है और यही ज्योतिष शास्त्र की वास्तविक उपयोगिता है कि व्यवसाय की व्यवस्था, उचित वय में ही की जा सके। जन्मांग के आधार पर ग्रहों की स्थिति के अनुसार उपयुक्त व्यवसाय का सटीक निर्धारण करने हेतु ही व्यावसायिका की संरचना हुई है।

    दशम भावगत ग्रह और दशमेश के नवांशाधिपति, दशम भाव पर दृष्टि निक्षेप करने वाले ग्रह तथा दशमेश से संयुक्त ग्रह आदि द्वारा व्यवसाय की दिशा का संकेत प्राप्त होता है। खेद का विषय है कि इस दिशा में किये गये शोध कार्यों से अधिकांश ज्योतिष प्रेमी अनभिज्ञ हैं। संप्रति व्यवसाय की अनगिनत शाखाओं ने, उसकी सीमा का इतना अधिक विस्तार किया है जिसे लिपिबद्ध किया जा सकना संभव नहीं है परन्तु व्यवसाय के चंचल, चटुल प्रवाह में अवगाहन करके कतिपय मूल्यवान रत्न खोजकर, उन्हें अनुभव के निकष पर संस्कारित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत करने का दुःसाध्य अनुसंधान, इस कृति के स्वच्छ, स्पष्ट एवं पावन पीयूष में संचित और संकलित है। व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय, तृतीय, अष्टम, नवम, दशम भाव, लग्न के अतिरिक्त विविध ग्रहयोगों की भूमिका की उपेक्षा करने से त्रुटिपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार अनेक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनका गहन आकलन इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

    ज्योतिष शास्त्र के हिंदी पाठकों के निरंतर आग्रह ने यशस्वी ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व श्री टी.पी. त्रिवेदी को इस विषय पर प्रमाणित व सारगर्भित संरचना व्यावसायिका के लेखन हेतु विवश किया। यह कृति अन्यान्य शोधपरक अध्यायों में व्याख्यायित है जिनके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, अभियन्ता, अधिवक्ता, लेखाकार, कलाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, खिलाड़ी, बैंककर्मी, भविष्यवक्ता, वैज्ञानिक, पुलिस एवं रक्षा, प्रबंधन, अध्यापन, व्यापार, लेखक, कवि, संत, संन्यासी, महर्षि आदि विविध व्यवसाय निर्धारण हेतु उपयुक्त ग्रहयोगों की विस्तृत व्याख्या तथा अन्यान्य उदाहरण प्रस्तुत किए गये हैं। यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है जिसके फलस्वरूप प्रबुद्ध पाठकगण विविध व्यवसायों से सम्बन्धित भविष्यकथन करने में सिद्धहस्त हो सकते हैं।

    400.00450.00
  • व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान

    कलिकाल के वर्तमान चक्र के विकृत एवं विरूपित स्वरूप में निमग्न होते जा रहे समाज के मध्य व्रत संपादन की लोकप्रियता, उपयोगिता तथा उसके विलक्षण प्रभाव की महिमा को ‘व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति के मधुरिम मधुवन के महकते प्रांगण में संबंधित जातकों के सम्मुख प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। यह कृति नौ पृथक पृथक अध्यायों में व्याख्यायित है जिन्हें अग्रांकित शीर्षकों से स्थिर किया गया है-
    1. मंत्र : सत्यान्तिक विश्लेषण, 2. वैवाहिक विलम्ब एवं ग्रहयोग : ज्योतिषीय
    विश्लेषण, 3. वैवाहिक विलम्ब कुछ अनुभूत मंत्र, स्तोत्र एवं प्रयोग, 4. व्रत परिज्ञानः प्रविधि एवं प्रावधान, 5. वैवाहिक समस्याओं का सुगम समाधान व्रत विधान, 6. विशिष्ट व्रत का अनुसरण : वैवाहिक विसंगतियाँ, वैधव्य, पार्थक्य का शमन, 7. संतति सुगम : परिहार प्रावधान, 8. सर्वश्रेष्ठ अनुष्ठान व्रत विधान तथा 9. प्रमुख पुत्र सुगम व्रत एवं विधान
    विविध व्रत विधान, विवाह एवं सन्तान से संबंधित अनेक सुगम समाधान इस कृति में अनुमान किए गए हैं। प्रायः व्रत और उपवास की भिन्नता से अनभिज्ञ जन-सामान्य व्रत को अनुष्ठान के रूप में उपयोग करने तथा उसके चमत्कृत कर देने वाले प्रभाव से भिन्न है। इस वास्तविकता की सम्यक् व्याख्या ‘व्रत विधान विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति में आविष्ठित है। वैवाहिक विलम्ब एवं विघटन का सुगम समाधान है- मंत्रजप, स्तोत्र पाठ, व्रत और दान। इसी प्रकार से संततिहीनता को संतति सुख में रूपांतरित करने हेतु विविध विधान मंत्र प्रयोग तथा अनेक व्रत और उनका अद्भुत एवं अनुभूत व्यावहारिक पक्ष इस कृति में अनुमान किया गया है
    वैवाहिक विलम्ब, विघटन, संततिहीनता अथवा शाप से ग्रसित अनेक ऐसे जातक हैं जो संस्कृत के मंत्र, स्तोत्र तथा अनुष्ठान का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं हैं तथा न ही वह योग्य आचार्यों द्वारा संबंधित अनुष्ठानों का प्रतिपादन कराने में सक्षम हैं। विवाह एवं सन्तान सुख हेतु आतुर एवं प्रतीक्षारत जातकों के लिए सर्वोच्च सुगम मार्ग है, उपयुक्त व्रत का चयन तथा विधि विधान सहित उसका अनुकरण, आरंभ एवं उद्यापन आदि, जो इस कृति का सर्वस्व है।
    इस कृति में अनेक पुत्रप्रदाता व्रत एवं संतति सुख की कामना की संसिद्धि हेतु विविध व्रत एवं विधान दार्शनिक किए गए हैं, जो अद्भुत और अनुभूत हैं जिनमें से कात्यायनी व्रत, पुंसवन व्रत, पयोव्रत, श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत, षष्ठी देवी व्रत आदि प्रमुख हैं तथा वैवाहिक विलम्ब के समाधान हेतु विविध वारों से संबंधित व्रतविधान और वैवाहिक संकट एवं प्रशासन के परिहार हेतु मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि के साथ-साथ उसके विधान भी इस कृति में सत्रिहित हैं
    यह कृति अपनी सारगर्भिता, सार्वभौमिकता तथा उपयोगिता के कारण समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए अत्यन्त हितकर और लाभप्रद सिद्ध होगी, इसमें किंचित सन्देह नहीं।

    320.00350.00
  • शक्ति कुंज’

    शक्ति कुंज’ भक्ति भावना का त्रिभुवन मोहन, भव्य भुवन है जो भगवान पराम्बा, जगतजननी, जगदम्बा के परम पावन पदपंकज के प्रसादामृत से परिपूर्ण प्रेरणा प्रार्थना प्रभूथ प्रार्थना पथ एवं प्रांजल प्राशीष है। ‘शक्ति’ भाव और भक्ति, साधना और शक्ति, प्रार्थना और आराधना से पवित्र प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र से सुशोभित भव्य त्रिभुवन मोहन, दिव्य सौन्दर्य से आश्रम, सुगठित, संयोजन, सु साधन, अविद्या, सारस्वत, शाश्वत साधना का स्वर्णिम शक्ति सेतु है, जो स्तुति मणिमण्डित स्तम्भों पर आधारित है, सात सौ रत्नजड़ित स्वर्ण सोपानों से निर्मित है, जिसमें आदिशक्ति, महाशक्ति, पराम्बा, भगवान, कुव्वरी, आदि शामिल हैं। जगतजननी के परम पावन पवित्र प्रांजल चरित्र का दर्शन, विपुल अनुकंपा के निमित्त सिद्धांत सु नियोजित आक्षेप के साथ जाने वाले, विशिष्ट अनुष्ठान का सम्यक विश्लेषण, विवेचन का आख्यान, व्याख्यान विधि-विधान सहित शास्त्र आविष्ठित है।
    ‘शक्ति कुञ्ज’ 16 अध्यायों में विवेचित एवं व्याख्यायित है जिसे मोक्ष-प्रदायिनी श्री दुर्गासप्तशती के प्रसाद-प्रबन्ध की विस्तृत के साथ-साथ नैमित्तिक साधनाओं के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित किया गया है। श्री दुर्गासप्तशती भू-लोकवासियों की मनोकामनाओं एवं सम्यक् अभिलाषाओं की संपूर्ति एवं संसिद्धि हेतु माता जगदम्बा का अनुपम वरदान है, जो मानव समाज को प्रसादामृत रूप उपलब्ध है।
    *भक्ति पुंज: शक्ति कुंज-श्री दुर्गासप्तशती शक्ति रहस्य शक्ति साधनाः संस्कार अनुष्ठान दुर्गाभुवन कामनापरक श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान अनुष्ठान अनुष्ठान और नवार्ण मंत्र एक पूजन शतचंडी एवं दुर्गापाठ विधान श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान-अष्ट सिद्धि उपदेश श्री दुर्गासप्तशती : व्यापक प्रवचन सप्तशती स्थित प्रसिद्ध सम्पुटित मंत्र अन्य मंत्रों की संसिद्धि कथा श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप साधना के सामान्य सूत्र श्री देव्यथर्वशीर्ष और महत्वपूर्ण चंडिका मंगलमंत्र का प्रयोग संपूर्ण मंत्रों की संसिद्धि के लिए ‘सिद्धकुंजिका स्तोत्र’ और ‘बीसा यंत्र’ प्रयोग शक्ति साधना: कतिपय चमत्कार कर देने वालेअंतरंग आभास।
    इन अतिरिक्त अन्यान्य प्रस्तावों की संसिद्धि के लिए श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप विधान, ‘शक्ति कुंज’ की दुर्लभ वैशिष्ट्य है जिसमें व्याहतों से संयुक्त संपुट मंत्रों का जप विधान, विनियोग, संख्या और प्रविधि आदि सिद्धांत शामिल हैं।
    श्री दुर्गासप्तशती आस्तिकों की आस्था का ललाट है। माता दुर्गा के अनुपम अनुराग एवं शक्ति साधना की सौरभ सुधा-धारा ‘शक्ति कुञ्ज’ में अविरल गति से प्रवाहित, प्रसारित हो रही है। भक्ति भावना के भव्य भुवन में त्रिभुवन मोहिनी, महाशक्ति पराम्बा की अवर्णनीय अनुरागपूर्ण आस्था, आराधना, अर्चना, अभ्यर्थना के स्वर्णिम संकल्प का हीरक हस्ताक्षर है- ‘शक्ति कुञ्ज’, जिसका पठन और पारायण शक्ति के भक्तों, साधकों, आराधकों, उपासकों तथा जिज्ञासुओं हेतु अपरिहार्य है।

    320.00400.00
  • शनि संहिता

    शनि शक्ति के संत्रास तथा त्रासदी से आतंकित, व्यथित, पीड़ित, भयाक्रान्त, मानव की विपुल वेदना, विपत्ति, विकृति, विनाश, व्याधि, विषमता, विघटन, विसंगतिपूर्ण विपरीत स्थितियों, परिस्थितियों के अवांछित, अनापेक्षित, अनावश्यक सम्भावनाओं के विषैले दंश और कैटीले पथ की पीड़ा प्रदायक चुभन के अन्तरंग आभास के अवलोकन और अवगाहन करने के उपरान्त पापाक्रान्त शनि की साढ़ेसाती, अष्टम शनि और शनि की लघु कल्याणी वैया आदि से संतप्त जीवन को विमुक्त करने के निमित्त ‘शनि संहिता’ का प्रसादामृत प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें सन्निहित, अनुभूत, अद्भुत, अमोघ एवं दुर्लभ साधना परिहार परिज्ञान, सम्पादन विधान एवं सुगम साधना प्रावधान का अवलोकन, अध्ययन, अनुसरण और अभ्यास शनि संतप्त जातक-जातिकाओं के जीवन को अलौकिक आलोक से आनन्दित और आहह्लादित करने हेतु, नैमित्तिक साधनाओं का परम पावन, प्रांजल पीयूष है।
    ‘शनि संहिता’ उन सशक्त, शाश्वत, संकल्पों का सुरभित सेतु है, जिसकी संरचना, शनि ग्रह सन्दर्भित परिहार परिज्ञान पर प्रमाणित शास्त्रसंगत सघन सामग्री के अभाव में अंकुरित और प्रस्फुटित हुई है। ‘शनि संहिता’ अभीष्ट संसिद्धि के संसुप्त संज्ञान की जागृति का अभिनव अनुसंधान है जिसमें शनि सन्दर्भित अन्यान्य अरिष्टों, अनिष्टों, अवरोधों, अप्रत्याशित आतंक, विविध व्यथाओं, विपत्ति प्रदायक व्याधियों से आक्रान्त जातक-जातिकाओं के दुर्दमनीय दारूण दुःखों और दुर्गति का शास्त्रानुमोदित सुगम समाधान तथा अनुकूल विधान, अखण्डित आस्थाओं को अविचलित आधार प्रदान कर देने वाले परिहार परिज्ञान, दुर्लभ स्तोत्र तथा साधनाएँ, मंत्र प्रयोग और साधना विधान, शनि दान : दिव्य अनुष्ठान के अतिरिक्त शताधिक सुगम सांकेतिक साधनाएँ और उनके प्रतिपादन के विधिविधान आदि अ‌ट्ठाइस अध्यायों में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में सुव्यवस्थित किए गए हैं।
    ‘शनि संहिता’ के परिशिष्ट में ‘दस महाविद्या स्तोत्र’, ‘कर्मज व्याधिनाशन ऋग्वेदीय मंत्र’, ‘सुदर्शन चक्र मंत्र साधना’ और ‘मृत्युंजय मंत्र: विभिन्न प्रकार’ के समिचीन आधिवांट ने इस कृति की व्याख्या और महत्ता में वृद्धि की है। ‘शनि संहिता’ के लिए सभी वैज्ञानिक ज्योतिष प्रेमियों के लिए विद्वान, संग्रहकर्ता और ज्योतिषी शोध प्रबंध हैं।

  • शनि कीसाढ़ेसाती से छुटकारा

    शनि ग्रह की संपूर्ण जानकारी यह किसे शुभ है, किसे अशुभ किस राशि को कब साढ़ेसाती शुरु होती है ? शनि के स्थानगत फल, शनि दशा अंतर्दशा के फल, अन्य ग्रहों पर से शनि भ्रमण के फल, आपका हाथ और शनि, शनि का राशि गोचर भ्रमण, शनि का नक्षत्र गोचर, साढ़ेसाती और आप, साढ़ेसाती के प्रभाव देखने की एक और पद्धति, शनिपाद के फल, शनि का वाहन एवं उसके फल, शनि साढ़ेसाती एक विवेचन, शनि एवं आरोग्य, साढ़ेसाती से डरे नहीं, साढ़ेसाती के अनिष्ट शनि के लिए उपासना शनि स्तोत्र एवं मंत्र, शनि यंत्र साधना, शनिरत्न, अनिष्ट शनि एवं साढ़ेसाती बर्दाशत हो इसके लिए टोटके आदि, शनि से सम्बंधित हर पहलू का ज्योतिष विज्ञान से समाधान करने वाली हिंदी भाषा में प्रकाशित एक बेजोड़ किताब

    40.00
  • शनि दशा फलदीपिका

    शनि दशाफल दीपिका’ हमारे शीर्षस्थ ज्योतिर्विद् श्री टी.पी. त्रिवेदी के सुदीर्घ, सघन मंथन का नवनीत है। उन्होंने लक्षाधिक जातकों के जन्मांगों का अनुशीलन और प्रायोगिक अन्वेषण करके इस वृहत् ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा इसके माध्यम से एक नव्य सैद्धान्तिकी निर्मित की है।

    इसके पूर्व भी श्री त्रिवेदी ‘सैटर्न: द टाइमर’, ‘शनि शमन’, ‘शनि संहिता’ आदि प्रस्थान-ग्रन्थों और शत-सहस्राधिक शोध आलेखों के माध्यम से शनि की अन्तर्दशाओं, उसकी द्वादश राशिगत स्थितियों, उसकी विभिन्न आकृतियों-प्रवृत्तियों, उसके वर्ण, वाहन, दृष्टिफल, गोत्रोत्पत्ति और कारक तत्वों पर सतर्त विमर्श करते रहे हैं।

    इस ग्रन्थ की विशिष्टता, बल्कि अनन्यता यह है कि यह जितना शास्त्रानुमोदित है, उतना ही व्यावहारिक अनुभवों, दैनंदिन अभ्यासों और अनुसंधानों पर आधारित है। यह श्री त्रिवेदी की चार दशकों की साधना का सुफल है। निस्संदेह यह उनके बहुआयामी चिंतन-अनुचिंतन से निस्सृत है। इसमें दशाफल निर्धारण, सिद्धान्त का निर्वचन ही नहीं किया गया है, प्रत्युत् जातक की महादशा एवं अन्तर्दशा के शुभाशुभफलों की अनुप्रयोगात्मक संसिद्धि (फलश्रुति) भी अन्तर्घटित की गयी है।

    शनि अन्यानेक दुर्भेद्य रहस्यों का पुंज है। इससे संबंधित भौतिक प्रपंच के कोटि-कोटि जातक उपकृत या संत्रस्त हैं। ज्योतिषी जी ने अष्टोत्तरी, विंशोत्तरी महादशा, योगिनी एवं गोचर दशा के शास्त्रीय शनि विषयक अनेक गूढ़, दुःसाध्य तथा जटिल समस्याओं का निदान-समाधान यहां प्रस्तुत किया है। उनके विशिष्ट तथा नितांत निजी स्थान शनि के केंद्रगत, त्रिकोणस्थ, उपचय स्थानगत, त्रिभावस्थ भाव से तथा उनके इष्ट-अनिष्ट प्रतिफल से जुड़े हुए हैं।

    400.00500.00
  • शनि संहिता

    ग्रन्थ-परिचय

    शनि शक्ति के संत्रास तथा त्रासदी से आतंकित, व्यथित, पीड़ित, भयाक्रान्त, मानव की विपुल वेदना, विपत्ति, विकृति, विनाश, व्याधि, विषमता, विघटन, विसंगतिपूर्ण विपरीत स्थितियों, परिस्थितियों के अवांछित, अनापेक्षित, अनावश्यक सम्भावनाओं के विषैले दंश और कँटीले पथ की पीड़ा प्रदायक चुभन के अन्तरंग आभास के अवलोकन और अवगाहन करने के उपरान्त पापाक्रान्त शनि की साढ़ेसाती, अष्टम शनि और शनि की लघु कल्याणी ढैया आदि से संतप्त जीवन को विमुक्त करने के निमित्त ‘शनि संहिता’ का प्रसादामृत प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें सन्निहित, अनुभूत, अद्भुत, अमोघ एवं दुर्लभ साधना परिहार परिज्ञान, सम्पादन विधान एवं सुगम साधना प्रावधान का अवलोकन, अध्ययन, अनुसरण और अभ्यास शनि संतप्त जातक-जातिकाओं के जीवन को अलौकिक आलोक से आनन्दित और आह्लादित करने हेतु, नैमित्तिक साधनाओं का परम पावन, प्रांजल पीयूष है।

    ‘शनि संहिता’ उन सशक्त, शाश्वत, संकल्पों का सुरभित सेतु है, जिसकी संरचना, शनि ग्रह सन्दर्भित परिहार परिज्ञान पर प्रमाणित शास्त्रसंगत सघन सामग्री के अभाव में अंकुरित और प्रस्फुटित हुई है। ‘शनि संहिता’ अभीष्ट संसिद्धि के संसुप्त संज्ञान की जागृति का अभिनव अनुसंधान है जिसमें शनि सन्दर्भित अन्यान्य अरिष्टों, अनिष्टों, अवरोधों, अप्रत्याशित आतंक, विविध व्यथाओं, विपत्ति प्रदायक व्याधियों से आक्रान्त जातक-जातिकाओं के दुर्दमनीय दारूण दुःखों और दुर्गति का शास्त्रानुमोदित सुगम समाधान तथा अनुकूल विधान, अखण्डित आस्थाओं को अविचलित आधार प्रदान कर देने वाले परिहार परिज्ञान, दुर्लभ स्तोत्र तथा साधनाएँ, मंत्र प्रयोग और साधना विधान, शनि दानं : दिव्य अनुष्ठान के अतिरिक्त शताधिक सुगम सांकेतिक साधनाएँ और उनके प्रतिपादन के विधिविधान आदि अट्ठाइस अध्यायों में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में सुव्यवस्थित किए गए हैं।

    ‘शनि संहिता’ के परिशिष्ट में ‘दस महाविद्या स्तोत्र’, ‘कर्मज व्याधिनाशन ऋग्वेदीय मंत्र’, ‘सुदर्शन चक्र मंत्र साधना’ तथा ‘मृत्युंजय मंत्र विविध प्रकार’ के समिचीन आधिवक्ता ने इस कृति की उपयोगिता एवं महत्ता में वृद्धि की है। ‘शनि संहिता’ के लिए सभी वैज्ञानिक ज्योतिष प्रेमियों के लिए विद्वान, संग्रहकर्ता और ज्योतिषी शोध प्रबंध हैं।

    320.00400.00
  • शिशु चिन्तन

    शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
    सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
    1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
    शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।

    शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र

    360.00450.00