लघु पाराशरी
₹160.00₹200.00
सम्भव है, स्वयं महर्षि पाराशर या उनके किसी सुयोग्य शिष्य ने इस लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो। पंडित मुकुन्द वल्लभ दैवज्ञ की ‘उडुदाय प्रदीप’ तथा डॉ. सुरेश चन्द्र मिश्र की ‘लघु पाराशरी’ से मुझे पर्याप्त सहायता मिली-मैं इनका हृदय से आभारी हूँ।
सम्भव है, स्वयं महर्षि पाराशर या उनके किसी सुयोग्य शिष्य ने इस लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो। पंडित मुकुन्द वल्लभ दैवज्ञ की ‘उडुदाय प्रदीप’ तथा डॉ. सुरेश चन्द्र मिश्र की ‘लघु पाराशरी’ से मुझे पर्याप्त सहायता मिली-मैं इनका हृदय से आभारी हूँ।
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Secrets of Vaastu Vol. II
₹230.00
Vastu Shastra is an ancient Vidya of structure, which taught the users the art of harmo-nious living with the nature’s field of energy (Jal, Prithvi, Agni, Vayu and Akash). The energies generated by the great elements of Panch Bhootas follow the straight path and the experience of feeling the energy reflection depends upon the shape of the object i e. the Plot On physical level dimension is a measurement of length, breadth and height /depth in con-ventional design. Dimension lines are used to scale and preparation design elements prop-erly
The square is the best shape and thereafter the rectangular with certain restriction on the dimensions. It is not that the other shapes of the plot or the building are unfit for the use or the west or the south directions will bring hardships. The shapes are largely link to generation of energy field. The irregular shapes like triangle, pentagon, circular, etc. will create imbalance in the creation and dispersal of energies. Having a square or rectangular plot/building without proportion to length, breadth and height will be of no use, it is as bad as any other profile because such plot will not generate the adequate energies or vibrations. The volume of space generated and material consumed must be in harmony with the plot/building dimensions. From design perspective if the diinension of the bed/sofa are greater than the dimension of the space, the bed/sofa is too big. The condition is obviously out of balance and may cause much dimensional problems. When an individual is comfortable at physical & emotional level then & then only the spiritual aspects of the individual can be awakened & explored. The more conscious you are about the spiritual aspects of yourself, the greater the experience on the other level. Even without spiritual consciousness when you enhance the energy of a space your sub-conscious mind still recognizes the benefit. Therefore the dimension at physical plain suggest many layers of experience we human beings have like all rounder, self satisfied personality, etc.
₹250.00 -
परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ
₹350.00कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।
किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं
कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र
कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।
₹430.00 -
जातकसारावलीद्वितीय भाव
₹320.00धनार्जन, धन संचय तथा धन संवर्द्धन के विविध विधान के अन्यान्य अलौकिक शोध सिद्धान्तों से आलोकित ग्रहयोगों तथा उपयुक्त उदाहरणों से अलंकृत, आचार्यानुमोदित, शास्त्र संदर्भित ग्रन्थ जातक सारावली–द्वितीय भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी।
जातक के भाग्य पर विचार करने के साथ-साथ द्वितीय भाव का प्रबल होना भी अपेक्षित है। धनागमन का स्रोत ज्ञात हो, तो उसी के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। धन भाव की प्रबलता या निर्बलता का अनुमान करन क लिए षष्ठ च स्थान पान का अध्ययन भी अनिवार्य है क्योंकि षष्ठ भाव, द्वितीय भाव से पंचमस्थ फलेवा है बीर दास भाव द्वितीय भाव से नवमस्थ होता है। इन तीनों भावों में परस्पर विरामेपास्याश अम्वन्ध का अध्ययन ही जातक के धनवान हाने की वास्तविक स्थिति का परिचालन प्रधान करता है।
लिलीय चाचयता ग्रहों की विस्तृत व्याख्या और उनसे सम्बन्धित अन्यान्य शास्त्रीय प्रष्चों में विलमान सामग्री के साथ लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान और अम्पास का सारांश सटीक उदाहरणों के साथ इस कृति में समायाजित किया गया है। द्वितीय भाव में संस्थित ग्रहों के अतिरिक्त द्वितीयश की विभिन्न भाव में संस्थिति का फल, विभिन्न भावों के अधिपतियों के द्वितीय भावगत होने का फल एवं द्वितीय भाव म दो या दो से अधिक ग्रहों की युति का फल आदि का इतना संपुष्ट और सघन विश्लेषण प्रथम बार इस कृति में आविष्ठित है।
जातक सारावली–द्वितीय भाव को अग्रांकित शीर्षकों में विभाजित करक कृति के आधार के शोध सिद्धांतों को प्रबल धरातल प्रदान किया गया है: 1. द्वितीय भाव : विविध पक्ष, 2. द्वितीय भावगत ग्रहों का फल, 3. द्वितीय भावगत विभिन्न राशियों एवं ग्रहों की दृष्टि का फल, 4. द्वितीय भावगत विभिन्न ग्रह युतियों का फल, 5. द्वितीयेश के विभिन्न भावगत होने का फल, 6. विभिन्न भावेशों के द्वितीय भावगत होने का फल, 7. ग्रहों का संतुलन एवं समृद्धि का संवर्द्धन, 8. धन योग : ग्रहों का संयोग, तथा 9. विपुल वित्तार्जन: विविध समीकरण।
जातक सारावली–द्वितीय भाव, धनार्जन, धनसंचय, धनीक्ष्याम, धन संवर्द्धन तथा विपुल धन के विस्तार और प्रसार के साथ आय के स्रोत के अनुमान, चामी से फाई मुखमंडल के सोन्दर्य, नेत्रों की ज्योति तथा परिवार के पठन के अध्ययन हेतु पृछ प्रामाणिक ओर परीक्षित ग्रन्थ है जो सभी ज्योतिष प्रेमियों के लिए उदरणीय पहनीर अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
समृद्धि सूत्रVol 2
समृद्धि सूत्र’ ज्योतिष की मात्र सामान्य संरचना न होकर समृद्धि से सम्बन्धित प्रथम शास्त्रानुमोदित विस्तृत शोध प्रबन्ध है; कालांतर में जिसकी प्रशंसा, प्रतिष्ठा, परिचर्चा तथा गणना ज्योतिष के श्रेष्ठ शास्त्रों में सम्मिलित की जायेगी। समृद्धि से सम्बन्धित यह कृति स्वर्णिम शोध प्रस्तुत करने वाला माता लक्ष्मी का प्रसादामृत है जिसमें समृद्धि से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान सन्निहित है। ऐसे शोध प्रबन्ध की अनिवार्यता ने, जिसमें जन्मांग में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोगों के अध्ययन, अनुसंधान और अनुभूति के आधार पर जातक की समृद्धि एवं सम्पन्नता की परिसीमा का सशक्त संज्ञान एवं सटीक अनुमान उपलब्ध हो सके तथा समृद्धि पथ के आरोह अवरोह, उन्नति अवनति, स्थिरता अथवा अस्थिरता के पूर्णतः स्पष्ट एवं सम्यक् संज्ञान का सारस्वत, शाश्वत सूत्र स्थापित हो सके, उसके निमित्त शास्त्रानुकूल वेदविहित समग्र ग्रन्थगर्भित सूत्रों का सतत्, सतर्क, सघन, सबल अध्ययन और अनुसंधान का अनुकरण करके, उस विशुद्ध प्रतिष्ठित, प्रामाणिक, प्रशंसित प्राञ्जल प्रारूप को ‘समृद्धि सूत्र’ से शीर्षांकित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध जिज्ञासुओं, शोध छोत्रों तथा शास्त्रान्वेषियों के संसुप्त संज्ञान की जागृति हेतु अभिनव अभियान के पावन पथ के सुदृढ़ एवं सुरुचिपूर्ण सेतु का निर्माण सम्पन्न किया गया है, जो अनेक वर्षों की सघन साधना के उपरान्त अब आपके कर कमलों में सुशोभित है।
‘समृद्धि सूत्र’ का आधार स्तम्भ ज्योतिष के सारगर्भित शास्त्र हैं जिनमें ऋषि-महर्षि ने अपनी अन्तर्दृष्टि को एकाग्र करके, मानव के अर्थ कल्याण को ध्यान में रखते हुए धन, वैभव, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संपूर्ण स्वर्णिम सिद्धांत सूत्र के स्पष्ट वर्णन की है तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वृहत्पादक, मानसागरी, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, पूर्वकलामृत, ज्योतिष पारिजात, सारावली, ज्योतिषमार्ग, होरारत्न, जातितत्त्वम्, ज्योतिषतत्त्वम्, जातकाभरणम्, जातकालंकार, सर्वार्थ चिंतामणि, खेटकौतुकम्, वृद्धयवनजातक, जातक भूषणम्, होरासार, भृगुसूत्र, भावकौतुहलम्, जातकसारदीप, शम्भुहोराशास्त्र, फलमार्तण्ड, सत्यजातकम्, वृहद्द्योतिषसार, भावार्थ रत्नाकर तथा वृहदरत्नाकर आदि की संरचना। सभी ग्रंथों में धन, ऐश्वर्य, वैभव, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से लेकर सन्दर्भित मंदिरों तक 1100 टुकड़े, नौ खंड और दो खंडों में भंडारित और प्राचीन बताकर उनके दर्शन एवं प्रखर सुरुचिपूर्ण विवेचन, व्याख्या, विश्लेषण एवं विभाजन का वर्णन किया गया है।
‘समृद्धि सूत्र’ की व्याख्या जिन नौ खण्डों में की गई है, वे अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित हैं:- 1. लाभ भाव (एकादश भाव) 2. धन भाव (द्वितीय भाव) 3. भाग्य भाव (नवम भाव) 4. व्यय भाव (द्वादश भाव) 5. पूर्व पुण्य भाव (पंचम भाव) 6. धनयोग 7. निर्धन योग 8. सुख समृद्धि से संदर्भित शोध साधना एवं सम्बन्धित जन्मांगों की विस्तृत व्याख्या 9. धन, समृद्धि एवं सम्पन्नता से सम्बन्धित समय संज्ञान की प्रविधि।
समृद्धिशाली अथवा विपन्न होने के सन्दर्भ में सहस्राधिक सूत्रों को स्मरण रखना सामान्य पाठक के लिए संभव नहीं है। ‘समृद्धि सूत्र’ में अर्थवान् अथवा अर्थहीन बनने से सम्बन्धित विभिन्न ग्रन्थों में व्याख्यायित सहस्त्रों सूत्रों के विकल्प के रूप में एक शोध सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसके अनवरत अगाध अनुसंधान में लेखकद्वय का तीस वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हुआ। यह शोध सिद्धान्त, ‘समृद्धि सूत्र’ का सर्वस्व है। -
परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान
₹350.00समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
* परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।₹430.00 -
संतति संहिता
₹360.00संतति संहिता उन समस्त सबल, सशक्त, सारस्वत, शाश्वत संकल्पों का साकार स्वरूप है, जो सन्तान सम्बन्धी प्रामाणिक सामग्री से सन्निहित संरचनाओं के अभाव के कारण रचनाकार के मन मस्तिष्क के पटल पर अंकित और अंकुरित हुए। संततिहीनता से त्रस्त, संतति वियोग से व्याकुल, पुत्र अथवा पुत्रियों के जन्म की अत्यधिक आतुर आकांक्षा और अभिलाषा की विफलता से संतप्त, दत्तक संतति की चिन्ता से आक्रान्त, परजात शिशु के संशय से व्यथित, विकृत अथवा विकलांग संतति की संभावना से प्रकम्पित, संतति जन्म के अनुमानित समय संज्ञान हेतु जिज्ञासारत, नालवेष्टित शिशु की आशंका से ग्रस्त, युगल सन्तान जन्म की संभावना, संततिहीनता का कारण विविध शापों से अभिशप्त जातक, पत्नी के गर्भधारण करने की क्षमता, सन्तान संख्या तथा अपनी संतति के साथ संभावित सम्बन्धों की मधुरता अथवा कटुता, शत्रुता अथवा आत्मीयता के बोधतुल्य अनेक ऐसे प्रकरण हैं, जिनके विश्लेषण और व्याख्या के उपरान्त तलस्पर्शी अनुसंधान की अनिवार्यता असंदिग्ध है जिन पर किसी भी सामयिक ज्योतिर्विद् अथवा लेखक ने प्रामाणिक शोध सूत्र, जिज्ञासु और प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की चेष्टा नहीं की।
संतान सम्बन्धी अन्यान्य पक्षों पर शोध साधना में अवगाहन करने हेतु विविध सत्य एवं प्रामाणिक तथ्यों ने देश के प्रसिद्ध लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी को आंदोलित व व्यथित किया। उनकी शोध यात्रा का सर्वाधिक सुरभित सुमन है संतति संहिता, जिसका प्रत्येक पृष्ठ समस्त शास्त्रीय ग्रंथों के सबल प्रमाणों से अभिसिंचित है। कृति को अग्रांकित 21 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित व विश्लेषित किया गया है।
1. पंचम भावगत ग्रहों का फल, 2. पंचम भावगत विभिन्न राशियों का फल, 3. द्वादश भाव के स्वामियों की पंचम भावस्थ स्थिति का फल, 4. पंचम भाव में ग्रहों की दृष्टि का फल, 5. पंचमेश की विभिन्न भावों में स्थिति के अनुसार फल, 6. संतति जन्म प्रकार और प्रसंग, 7. नालवेष्टित शिशु एक भयावह स्थिति, 8. युगल संतान सम्बन्धित संज्ञान, 9. विभिन्न शाप एवं संतति संताप, 10. नारी और गर्भधारण करने की क्षमता, 11. संतान संख्या: संज्ञान सिद्धांत, 12. संततिहीनता का विकल्प दत्तक संतान, 13. संतति और समय की सत्ता, 14. संतान जन्म का समय गणना के विभिन्न आधार, 15. प्रसवकाल संज्ञान, 16. संतति सुख हेतु प्रभूत प्रयत्न एवं प्रतीक्षा, 17. गर्भवती युवती की मृत्यु, 18. शिशु के माता-पिता की मृत्यु सम्बन्धी ग्रहयोग, 19. माता अथवा पिता से त्यक्त संतान हेतु ग्रह ज्ञान, 20. ऋतुकाल एवं गर्भकाल ज्ञातव्य सूत्र, 21. ग्रह स्थितियाँ तथा शिशु के सम्बन्धी ।
संतति संहिता सन्तान पक्ष की एक ऐसी आधारशिला है जिसमें समस्त शास्त्रीय ग्रंथों के प्रामाणिक सूत्रों की संसिद्धि हेतु विविध व्यावहारिक जन्मांगों में विद्यमान ग्रहयोगों की सत्यता को परिलक्षित व प्रदर्शित किया गया है। संतति संहिता सन्तान पक्ष पर केन्द्रित एक अद्भुत ग्रन्थ है जो अनुभूत सूत्रों पर आधारित है और जिसका अध्ययन, अनुगमन, अनुसरण समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध पाठकों और जिज्ञासु छात₹450.00 -
शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
शनि दशा फलदीपिका
₹400.00शनि दशाफल दीपिका’ हमारे शीर्षस्थ ज्योतिर्विद् श्री टी.पी. त्रिवेदी के सुदीर्घ, सघन मंथन का नवनीत है। उन्होंने लक्षाधिक जातकों के जन्मांगों का अनुशीलन और प्रायोगिक अन्वेषण करके इस वृहत् ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा इसके माध्यम से एक नव्य सैद्धान्तिकी निर्मित की है।
इसके पूर्व भी श्री त्रिवेदी ‘सैटर्न: द टाइमर’, ‘शनि शमन’, ‘शनि संहिता’ आदि प्रस्थान-ग्रन्थों और शत-सहस्राधिक शोध आलेखों के माध्यम से शनि की अन्तर्दशाओं, उसकी द्वादश राशिगत स्थितियों, उसकी विभिन्न आकृतियों-प्रवृत्तियों, उसके वर्ण, वाहन, दृष्टिफल, गोत्रोत्पत्ति और कारक तत्वों पर सतर्त विमर्श करते रहे हैं।
इस ग्रन्थ की विशिष्टता, बल्कि अनन्यता यह है कि यह जितना शास्त्रानुमोदित है, उतना ही व्यावहारिक अनुभवों, दैनंदिन अभ्यासों और अनुसंधानों पर आधारित है। यह श्री त्रिवेदी की चार दशकों की साधना का सुफल है। निस्संदेह यह उनके बहुआयामी चिंतन-अनुचिंतन से निस्सृत है। इसमें दशाफल निर्धारण, सिद्धान्त का निर्वचन ही नहीं किया गया है, प्रत्युत् जातक की महादशा एवं अन्तर्दशा के शुभाशुभफलों की अनुप्रयोगात्मक संसिद्धि (फलश्रुति) भी अन्तर्घटित की गयी है।
शनि अन्यानेक दुर्भेद्य रहस्यों का पुंज है। इससे संबंधित भौतिक प्रपंच के कोटि-कोटि जातक उपकृत या संत्रस्त हैं। ज्योतिषी जी ने अष्टोत्तरी, विंशोत्तरी महादशा, योगिनी एवं गोचर दशा के शास्त्रीय शनि विषयक अनेक गूढ़, दुःसाध्य तथा जटिल समस्याओं का निदान-समाधान यहां प्रस्तुत किया है। उनके विशिष्ट तथा नितांत निजी स्थान शनि के केंद्रगत, त्रिकोणस्थ, उपचय स्थानगत, त्रिभावस्थ भाव से तथा उनके इष्ट-अनिष्ट प्रतिफल से जुड़े हुए हैं।
₹500.00










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