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  • ज्योतिषीय गणित एवं खगोल शास्त्र

    पूरी पुस्तक पर लेखक के ज्ञान की पकड़ और भाषा की सहजता का सरस प्रवाह बहुत प्रभावशाली है। विषयों का चयन और उनका प्रस्तुतीकरण भी वैज्ञानिक ढंग से उचित है। विशेष रूप से ग्रहों का वक्रत्व, तारों के उदयास्त तथा उपग्रहों के बारे में लिखे गये अध्याय इस पुस्तक की विशेषता है। उदाहरणों के कारण पुस्तक की विश्वसनीयता बढ़ गयी है। कम्प्यूटरीकरण के इस युग में ज्योतिष शास्त्र के कुशल ज्योतिषी का प्रायः लोप हो रहा है। गणित के प्रति अभिरुचि में कमी आई है। कम्प्यूटर की गणना मुझे निर्जीव प्रतीत होती है। वहीं अपने हाथ से बनायी कुण्डली की विश्वसनीयता के प्रति मैं आश्वस्त रहता हूँ। मेरे जैसे अनेक ज्योतिषप्रेमियों की आस्था में यह पुस्तक अकल्पनीक योगदान देगी, इस विश्वास के साथ श्री जैन को अनेक आशीर्वाद।

    240.00300.00
  • ताजिकशास्त्र

    वैदिक ज्योतिष शास्त्र की तीन पद्धतियों- पाराशरी, जैमिनी और ताजिक में से ज्योतिष शास्त्र के होरा स्कंध में ताजिक ज्योतिष का समावेश होता है। जातक की पूर्ण आयु में प्रत्येक वर्ष के वर्ष प्रवेश समय को जानकर वर्ष कुण्डली द्वारा वर्ष पर्यन्त जातक के प्रत्येक मास, दिन व दिनार्घ से भी सूक्ष्म समय का शुभाशुभ फलों का ज्ञान कराना फलित ज्योतिष-ताजिक शास्त्र का काम है। इसीलिए वर्ष कुण्डली का जन्म कुण्डली से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस संदर्भ में हिन्दू मनीषियों और ज्योतिर्विदों द्वारा की गई रचनाएं मुख्यता ताजिक नीलकण्ठी, हायन् रत्न और केशव द्वारा रचित ताजिक शास्त्र आदि अत्यन्त अनूठे ग्रंथ हैं। आचार्य नीलकण्ठ सोलहवीं शताब्दी में ताजिक नीलकण्ठी की रचना तीन तन्त्रों- संज्ञातन्त्र, वर्षतन्त्र, प्रश्नतन्त्र में की थी। संज्ञातन्त्र अन्य दोनों तन्त्रों का आधार है। इस तन्त्र द्वारा वर्ष प्रवेश का ज्ञान, गणित-गणना, वलाबल दृष्टि विचार, सहम, मुंथा और 16 योगों का विचार किया जाता है।

    छात्र और शिक्षक के बीच जो सम्बन्ध है वह एक दूसरे के पूर्वक है। इस सम्बन्ध को भलीभांति जानते हुए और एक आचार्य शिक्षक की हैसियत से ज्योतिष प्रेमियों और विद्यार्थियों के लिए Tajikashastra: A Guide to Annual Horoscope or Varshphala की रचना अंग्रेजी भाषा में सन् 1998 में की थी जिसकी लोकप्रियता और मांग इतनी बढ़ गई है कि आज उसका हिन्दी संस्करण “ताजिक शास्त्र : वर्षफल की एकमात्र संदर्शिका” निकालना पड़ा ताकि हिन्दी भाषी ताजिक की कड़ियों को भलीभांति समझ सके और इस अनूठे विज्ञान से वंचित न रह सकें। यह ग्रंथ न केवल शिक्षकों के लिए (Trainers Manual) हैं बल्कि इच्छुक ज्योतिष प्रेमियों के लिए एक सरल संदर्शिका भी है। आशा करते है कि यह पुस्तिका विद्यार्थियों एवं ज्योतिर्विदों की आशा के अनुरूप लाभप्रद होगी।

    140.00150.00
  • त्रिक भाव और चन्द्रमा

    पूर्व प्रकाशित ‘आयु अरिष्ट’ और ‘अष्टम चन्द्र’ सम्भवतया पाठकों को उपयोगी लगी हों परन्तु बार-बार मन में यह अहसास हो रहा था कि त्रिकस्थ चन्द्र का कार्य शायद पूरा नहीं हो पाया है। चूंकि सर्वाधिक गुद-गुह्य तथा असमंजस एवं भय के चक्रव्यूह में घेरने वाले अष्टमस्थ चन्द्र पर तो पूर्व पुस्तक के माध्यम से ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए कुछ मार्गदर्शन हो पाया हो परन्तु अन्य दो त्रिक-षष्ठस्थ व द्वादशस्थ चन्द्र पर तो अभी रहस्य बना हुआ है। अष्टम के समान न सही, इससे कुछ कमतर षष्ठस्थ एवं द्वादशस्थ चन्द्र को देखते ही ज्योतिर्विद के माथे पर बल पड़ जाते हैं कि आखिर जातक के अरिष्ट का आकलन कैसे किया जाए। अपने प्रकाशन के माध्यम से ज्योतिष जगत् की सेवा में लगे एल्फा पब्लिकेशन के स्वामी श्री ए. एल. जैन जी का भी बार-बार आग्रह था कि मैं षष्ठ, अष्टम एवं द्वादशस्थ चन्द्र के शुभाशुभ फलों के संदर्भ में एक सारगर्भित आलेख दूँ ताकि ज्योतिष जिज्ञासु अष्टम के साथ षष्ठस्थ एवं द्वादशस्थ चन्द्र के शुभाशुभ फलों विशेषतया अनिष्टकारिता पर एक सही निष्कर्ष तक पहुँच सकें। आपके आग्रह को स्वीकार करते हुए मैंने श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी की सहायता से यह कार्य सम्पन्न करने का निश्चय किया। चूंकि पूर्व प्रकाशित ‘आयु निर्णय’ तथा ‘कालचक्र दशा से फलित’ नामक पुस्तक में श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी का अतुलनीय योगदान रहा है अतः उनकी सहायता के बिना वे कार्य सम्भवतया पूर्ण नहीं हो सकते थे। इसी कारण मुझे श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी की विद्वत्ता पर लेश-मात्र भी शंका न थी। मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी ने इस पुस्तक के लेखन में भी अपना अभूतपूर्व सहयोग दिया है। यहाँ भरसक प्रयास किया गया है कि त्रिकस्थ चन्द्र की अनिष्टकारिता के रहस्यमय बिंब में झाँका जा सके तथा ज्योतिर्विद फलकथन हेतु सुगमता से सत्यता के निकटतम बिन्दु तक निर्णय ले सकें। आशा है, पाठक इस प्रयास से लाभान्वित हो सकेंगे। सम्भवतया त्रिकस्थ चन्द्र पर यह प्रथम शोध परक आलेख होगा जिसे भावी पीढ़ी के ज्यातिर्विद और अधिक शोधपरक व सुस्पष्ट कर ज्योतिष जगत् को लाभान्वित कर सकेंगे।

    120.00130.00
  • दशा क्रम

    दशा क्रम तथा दशाओं का जातक के जीवन पर प्रभाव ही यहाँ मुख्य लक्ष्य हैं। कुंडली देकर किसी दशा व मुक्ति के विषय में प्रश्न किए जाते हैं तो कभी विशिष्ट भाव यथा 4H भू संपदा, 5H संतान, 10H आजीविका या 7H से विवाह संबंधी प्रश्न किए जाते हैं। पहले 8 पृष्ठ में दशा-गोचर से संबंधी महत्त्वपूर्ण प्रश्न संकलित हुए हैं।

    200.00250.00
  • दशा फल विचार

    दशाफल विचार के कपितय सूत्र दशा का प्रभाव जानने में उपयोगी ह
    सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु व शुक्र की दशाओं और अन्र्त्तदशाओं पर विचार किया गया है। इन ग्रहों के राशि प्रभाव पर भी चर्चा हुई है।
    ग्रह दशा विशिष्ट फलम् में उच्च राशि, मूल त्रिकोण, स्वराशि या मित्र राशि में स्थित ग्रह की दशा के विशेष फल के बाद भावेश फल पर विचार हुआ है। वक्री ग्रह की दशा के दुष्परिणाम से बचने के लिए सुझाव दिए हैं।
    गोचर स्कंध में सूर्य से केतु पर्यन्त सभी नौ ग्रहों का गोचर फल बताया गया है।
    नक्षत्र वेध और शनि की ढैय्या और साढ़ेसाती पर विस्तार से चर्चा हुई है।
    महत्त्वपूर्ण ग्रहों का गोचर फल में दशमेश का गोचर आजीविका को कैसे प्रभवित करता है तथा कारक ग्रह कारक भाव में आने पर कैसे शुभत्व बढ़ाता है, इसकी चर्चा हुई है। अष्टग वर्ग का उपयोग में छोटी व महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान देकर सुख समृद्धि बढ़ाने पर विचार हुआ है
    योगिनी दशा और उसके प्रयोग में योगिनी दशा के फल और उसके उपयोग पर विस्तार से चर्चा हुई है।
    योगिनी और विंशोत्तरी का जन्म कुण्डली, वर्ग कुण्डली तथा वर्ष कुण्डली में प्रयोग कर घटना की पुष्टि करें इस पर विचार हुआ है।
    राशि दशा फल में शुभ या अशुभ समय की पहचान पर जानकारी दी गई है।
    घटना का समय और स्वरूप निर्धारण के लिए कुण्डली में छिपी संभावना, क्षमता व सामर्थ्य दशा क्रम तथा गोचर का प्रयोग कैसे करें, इस पर उदाहरण सहित चर्चा हुई है।
    अशुभ दशा के उपचार में मंत्र व दान बताने के बाद विद्वानों के अनुभूत प्रयोगों पर चर्चा हुई है।
    (इस पुस्तक में लगभग 50 कुण्डलियों पर विचार हुआ है।)

  • दसाध्यायी

    जन्मकुण्डली के आधार पर फलाफल विवेचन करने में ग्रहों के षड्वर्ग तथा षड्वल की विशेष उपयोगिता होती है। वक्री ग्रहों की भी षड्बल में विशेष उपयोगिता है। पुस्तक के प्रथम आठ अध्यायों में विद्वान लेखक ने वृद्धयवन (मीनराज), कल्याणवर्मा, वाराहमिहिर, मानसागरी, पराशर, वैद्यनाथ आदि के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करके अपने उपयोगी विचार दिये हैं अध्याय में वक्री ग्रहों के सम्बन्ध में जो विवेचना प्रस्तुत है अथवा नवम अध्याय में भाव-भावेश के सन्द श्री गई है वह एक नवीनतम शोध होने के साथ ही साथ पाठकों के लिये लाभदायक मार्गदर्शक भी में वर्णित रत्नों की उपयोगिता उपचारीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह एक अत्यन्त

    130.00150.00
  • दैवज्ञ मंत्रेश्वरकृत फलदीपिकाज्योतिष की महान धरोहरभाग-1

    ज्योतिष के अविनाशी महत्व को जाति, पन्थ, समाज, राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठकर इसकी सार्वभौमिक प्रयोज्यता के माध्यम से ही सराहा जा सकता है। यह तत्वमीमांसा और नैतिकता से एक साथ संबंधित है। बाह्य स्तर पर इसके दायरे में भौतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को शामिल करने के लिए सब कुछ है और गूढ़ स्तर पर यह आत्मा के गुप्त पक्ष, इसकी अलौकिकता, अविनाशिता और अलौकिक स्थानान्तरण के चक्र से संबंधित है। यह हमें अनदेखे अतीत में दबे कार्य-कारण के बीजों की गहराई तक जाने में सक्षम बनाता है और हमें छिपी हुई उच्च संभावनाओं की चमक में जीवन के अर्थ को सुलझाने में मदद करता है। अतीत के कार्यों से प्रेरित होकर भविष्य की घटनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ज्योतिष हमसे सही एवं मर्यादित कर्मों के अनुसरण की माँग करता है और हृदय परिवर्तन के माध्यम से हमारी आदतों को सुधारने के लिए प्रेरित करता है ताकि जीवन की पहेलियों को अनपरत किया जा सके और भविष्य को प्रभावी ढंग से आकार दिया जा सके।

    फलदीपिका ज्योतिष का एक महान ग्रन्थ और विद्वत्तापूर्ण कार्य है जिसमें कुल 28 अध्याय हैं। इसे दो खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरे खण्ड में 12 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में किसी विशिष्ट विषय पर कई उदाहरणों और दृष्टांतों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है। हर अध्याय में ज्योतिष विषयक किसी न किसी सन्दर्भ में विस्तार से उदाहरण सहित व्याख्या की गई है जो ज्योतिष के शिक्षार्थियों को आसानी से समझ में आ सके।

    300.00350.00
  • दैवज्ञ मंत्रेश्वरकृत फलदीपिकाज्योतिष की महान धरोहरभाग-2

    ज्योतिष के अविनाशी महत्व को जाति, पन्थ, समाज, राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठकर इसकी सार्वभौमिक प्रयोज्यता के माध्यम से ही सराहा जा सकता है। यह तत्वमीमांसा और नैतिकता से एक साथ संबंधित है। बाह्य स्तर पर इसके दायरे में भौतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को शामिल करने के लिए सब कुछ है और गूढ़ स्तर पर यह आत्मा के गुप्त पक्ष, इसकी अलौकिकता, अविनाशिता और अलौकिक स्थानान्तरण के चक्र से संबंधित है। यह हमें अनदेखे अतीत में दबे कार्य-कारण के बीजों की गहराई तक जाने में सक्षम बनाता है और हमें छिपी हुई उच्च संभावनाओं की चमक में जीवन के अर्थ को सुलझाने में मदद करता है। अतीत के कार्यों से प्रेरित होकर भविष्य की घटनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ज्योतिष हमसे सही एवं मर्यादित कर्मों के अनुसरण की माँग करता है और हृदय परिवर्तन के माध्यम से हमारी आदतों को सुधारने के लिए प्रेरित करता है ताकि जीवन की पहेलियों को अनपरत किया जा सके और भविष्य को प्रभावी ढंग से आकार दिया जा सके।

    फलदीपिका ज्योतिष का एक महान ग्रन्थ और विद्वत्तापूर्ण कार्य है जिसमें कुल 28 अध्याय हैं। इसे दो खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरे खण्ड में 12 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में किसी विशिष्ट विषय पर कई उदाहरणों और दृष्टांतों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है। हर अध्याय में ज्योतिष विषयक किसी न किसी सन्दर्भ में विस्तार से उदाहरण सहित व्याख्या की गई है जो ज्योतिष के शिक्षार्थियों को आसानी से समझ में आ सके।

    320.00380.00
  • पँच जातकम्

    फलित ज्योतिष के पाँच दुर्लभ जातक ग्रन्थ क्रमशः लग्न जातक गौरी-जातक, शिवजातक, योगिनी-जातक तथा मूलयवन जातक का यह संग्रह जो विद्वतापूर्ण टिप्पणियों से परिपूर्ण है, पाठकों को फलादेश करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हो सकता है।

    120.00
  • पंच पक्षी शास्त्र के रहस्य

    पञ्चपक्षी शास्त्र का उद्भव भारत के तमिलनाडु प्रांत के सिद्ध संतों के कर-कमलों द्वारा हुआ। प्राचीन काल में यह पद्धति काफी प्रचलित थी तथा इसके द्वारा काफी सटीक भविष्यवाणियां की जाती थीं। कालांतर में यह विद्या लुप्तप्राय हो गयी। इस विद्या से संबंधित किसी प्रामाणिक ग्रंथ की रचना भी नहीं की गयी तथा इस विद्या का सीमित प्रसार गुरु शिष्य परंपरा के तहत मौखिक रूप से ही हो पाया। कुछ छिट-पुट सामग्रियां इधर-उधर बिखरी हुई ही प्राप्त हो पाती हैं। लेखक ने अथक प्रयास एवं वर्षों के मेहनत से तमिल संतों के इस अनमोल धरोहर को पुनर्जीवन प्रदान करने का एक प्रयास किया है ताकि यह विद्या देश के कोने-कोने तक पहुंच पाए तथा लोग इसका लाभउठाकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकें। पञ्चपक्षी सिद्धांत के अनुसार हममें से सभी जातकों का कोई न कोई जन्मपक्षी निर्धारित है। ये पक्षी पांच प्रकार के होते हैं। शुक्लपक्ष अथवा कृष्णपक्ष में अपने जन्म नक्षत्र के आधार पर जन्मपक्षी का निर्धारण होता है। सभी लोगों के कौआ, मुर्गा, उल्लू, गिद्ध एवं मयूर में से कोई न कोई जन्मपक्षी होता है। ये सभी पक्षी दिन एवं रात्रि के विभिन्न यम काल में अलग-अलग गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। ये पक्षी शासन करना, खाना, घूमना, सोना एवं मरना नामक पांच भिन्न गतिविधियां अलग-अलग समय में संपादित करते हैं। इनमें शासन करना सर्वश्रेष्ठ गतिविधि है तथा खाना श्रेष्ठ गतिविधि, घूमना सामान्य गतिविधि, सोना निम्न गतिविधि तथा मरना अति निम्न गतिविधि के अंतर्गत आता है। यदि हम किसी विशेष कार्य का निष्पादन करने जा रहे हैं तो निःसंदेह हमें अपने जन्मपक्षी के शासन करने की गतिविधि का चयन करना चाहिए क्योंकि इस काल में किया गया कोई कार्य पूर्ण रूप से सफल होगा इसकी संभावना काफी पुष्ट होती है।

    210.00250.00
  • परमायु दशा फलादेश की लुप्त हो चुकी एक चमत्कारी विधा

    पुस्तक के बारे में

    परमायु दशा महर्षि पाराशर की अन्य नक्षत्र दशाओं की भांति एक नक्षत्र दशा है। दूसरे रूप में आनुपातिक विंशोत्तरी दशा है। दशाफल विंशोत्तरीवत् ही है, परन्तु दशामान विंशोत्तरीवत् निश्चित नहीं होता। इस पुस्तक में दशा, अंतरदशा तथा प्रति- अंतरदशा ज्ञात करने हेतु यथाशक्ति सरलीकृत तालिकायें दी गई हैं। विगत दो दशकों से सैकड़ों परमायु दशा युक्त जन्मपत्र देखने को मिले, जिनमें विंशोत्तरी की अपेक्षा परमायु दशा को ही फलादेश की सत्यता के अधिक निकट पाया।

    प्राचीन भारतीय ज्योतिष शास्त्र की लुप्त हो चुकी फलादेश की यह प्रभावी विधा लेखक को वर्षों की कड़ी मेहनत, प्राचीन पाण्डुलिपियों के आलोड़न व हिमालय तथा नेपाल के अनेक महर्षियों से विशद संवाद के उपरान्त उपलब्ध हुई है। इसे जन-सामान्य के लिए इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

    सम्पूर्ण मानव जीवन पर ग्रह अपना गुणात्मक प्रभाव डालते हैं। अरिष्ट ग्रहों का शमन कर जीवन में चमत्कारिक उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। इन अरिष्ट ग्रहों की शान्ति व विभिन्न मनोकामनाओं की सम्पूर्ति हेतु शास्त्रों में विविध प्रकार के अनुष्ठान निर्देशित हैं।

  • परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा

    सृष्टि का प्रत्येक निमिष विशिष्ट और विचित्र होने के साथ-साथ अमूल्य है। कर्म संकुल जीवन में यह अनिवार्य है कि कालदेवता के अंश क्षण का उचित अभिज्ञान हो। इसी विचारधारा के आधार पर ऋषिकल्प व्यक्तियों ने प्रत्येक कार्य के सम्पादन हेतु विशिष्ट क्षण निश्चित किया है। इस क्षणवैशिष्ट्य को मुहूर्त की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। विवाह सदृश अतिमहत्त्वपूर्ण संस्कार हेतु मुहूर्त माहात्म्य सर्वविदित है। सिद्धान्त, संहिता, होरा का सूचक त्रिस्कन्ध ज्योतिष है। मुहूर्त ज्योतिष संहिता के अन्तर्गत विवेच्य है। 1600 ईस्वी में राम दैवज्ञ ने मुहूर्तचिन्तामणि नामक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की संरचना की। वर्तमान में इसी के आधार पर विवाह, द्विरागमन आदि संस्कारों के मुहूर्त रेखांकित किए जाने की प्रथा है।

    परिणय परम्परा, जिसके लिए प्राणीमात्र प्रतीक्षारत रहता है और जिसमें पल्लवित व पुष्पित होने वाले प्रणय का परिमाण व प्रमाण अनेक ज्ञात-अज्ञात तत्त्वों पर आश्रित होता है. जिससे कदाचित वर-वधू पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं। विवाह संस्कार के प्रतिपादन और संपादन हेतु उपयुक्त मुहूर्त का चयन भी एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा से परिणय सुख का परिणाम, उसका विकृत होता हुआ प्रारूप और उसमें उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ, विषमताएँ और विघटनकारी स्थितियाँ होती हैं। विवाह हेतु उपयुक्त मुहूर्त के अभाव में सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना का ऋतुराज, उत्तरोत्तर ऋतुपात में रूपांतरित होने लगता है। उपयुक्त मुहूर्त में किसी भी कार्य का संपादन अथवा प्रतिपादन सफलता की संसिद्धि करता है, इसमें किंचित संदेह नहीं।

    मुहूर्त जैसे जटिल विषय पर केन्द्रित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु कोई भी ऐसा ग्रन्थ नहीं है जिसमें परिणय सम्बन्धी समस्त मुहूर्त प्रणाली का क्रमबद्ध विवेचन आविष्ठित हो। ज्योतिष शास्त्र की इस आवश्यकता की अभिपूर्ति के उद्देश्य से विश्वविख्यात लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने ‘परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा’ की संरचना की। उपयुक्त वर-वधू तथा विवाह हेतु तर्कसम्मत मुहूर्त का सम्यक् संज्ञान इस कृति में वर्णित है। कृति को अग्रांकित नौ अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है ताकि पाठकगण इसके अध्ययन में किंचित भी भ्रमित न हों 1. विवाह संस्कार एवं प्रकार; 2. परिणय निर्णय : प्रमुख सूत्र; 3. विवाह निर्णय ज्ञातव्य सिद्धान्त; 4. मुहूर्त मीमांसा; 5. गुरु-शुक्र अस्त विचार; 6. विवाह विचार एवं प्रश्न मार्ग; 7. जन्म समय एवं अशुभ काल : ज्ञातव्य सूत्र; 8. गण्डान्त एवं मूल शान्ति विधान, तथा 9. विवाह प्रतिपादन पद्धति।

    यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, प्रशंसनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।

    320.00400.00
  • परिणय निर्णयमंगली दोषः सन्निहित यथार्थ

    वर-वधू के जन्मांगों में विद्यमान मंगली दोष के संतुलन की अनिवार्यता के साथ-साथ आवश्यकता है, मंगली दोष के वास्तविक रहस्य के तलस्पर्शी संज्ञान और अनुभव की, जिसे मंगली दोषः सन्निहित यथार्थ नामक इस कृति में व्यावहारिक जन्मांगों तथा शास्त्रीय सूत्रों और लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनवरत अनुसंधान और अभ्यास के आधार पर नीर-क्षीर विवेचनोपरान्त प्रस्तुत किया गया है।

    जन्मांग में मंगल ग्रह की कतिपय विशिष्ट स्थितियाँ ही वैवाहिक सुख में प्रायः विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं जिसे मंगली दोष से रेखांकित किया जाता है। मंगली दोष के सन्निहित यथार्थ से प्रायः अनभिज्ञ ज्योतिष प्रेमी एवं तथाकथित ज्योतिर्विद वर-वधू के जन्मांगों में, मंगली दोष का मिलान करते समय भारी भूल कर बैठते हैं, जिसका वास्तविक कारण विषय की अज्ञानता एवं अल्पज्ञता ही होता है।

    वस्तुतः मंगल ग्रह ही वैवाहिक विच्छेद, विसंगतियों, विषमताओं व वैधव्य के अतिरिक्त विवाह के विघटन की विविध अप्रिय परिस्थितियों का सूत्रपात करता है और मंगल ही अनाचार, दुराचार, अत्याचार, बलात्कार और हिंसा का हेतु निर्मित करने वाला ग्रह है परन्तु अनिवार्यता है मंगल ग्रह के प्रभाव के गहन अध्ययन तथा विश्लेषण के उपरान्त उसके वास्तविक परिणाम के उपयुक्त और सटीक आकलन की।

    यह कृति अग्रांकित 11 अध्यायों में विभाजित है- 1. मंगल ग्रह ज्ञातव्य तथ्य 2. मंगली दोष: सन्निहित यथार्थ 3. लग्नगत मंगल का फल 4. द्वितीय भावगत मंगल का फल 5. चतुर्थ भावगत मंगल का फल 6. महिलाओं हेतु पंचम भावगत मंगल का फल 7. सप्तम भावगत मंगल का फल 8. अष्टम भावगत मंगल का फल 9. द्वादश भावगत मंगल का फल 10. असंतुलित मंगली दोष के आश्चर्यजनक परिणाम, तथा 11. मंगल ग्रहः दशा दिग्दर्शन।

    मंगल ग्रह व मंगली दोष के ज्ञातव्य तथ्य के विषय में अन्यान्य सत्य तथा मिथ्या विचारों की व्याख्या, विश्लेषण व विवेचन, असंतुलित मंगलीदोष के आश्चर्यजनक परिणाम एवं मंगल ग्रह: दशा दिग्दर्शन आदि की शोधपरक च्याख्या, कृति का वैशिष्ट्य है। विविध लग्नों के लिए मंगली दोष का परिवर्तित होता हुआ स्वरूप ही शोध संज्ञान और अनुसंधान है जो वर्तमान युग की अनिवार्यता है। जिज्ञासुओं व ज्योतिष प्रेमियों की अभिलाषा, आकांक्षा और अपेक्षा की सारगर्भिता एवं सत्यता ही उनके अखंडित विश्वास का सेतु निर्मित करती है। रचनाकारद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व टी.पी. त्रिवेदी ने बारहों लग्नों के लिए, विविध प्रकार के मंगली दोष का मर्म और अनुसंधान प्रस्तुत करके, दीर्घकाल से प्रतीक्षित प्रबुद्ध पाठकों के आग्रह को साकार आकार प्रदान किया है।

    320.00400.00
  • परिणय निर्णयमंगली योगः विविध संयोग

    वस्तुतः मंगली योग की विभिन्न सकारात्मक, नकारात्मक एवं अपवादपरक स्थितियों से प्रायः पाठकगण ही नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिर्विद भी अनभिज्ञ हैं जो त्रुटिपूर्ण जन्मांग मिलान का हेतु है। मंगली योग से संदर्भित अज्ञानता इस तथ्य से ही परिलक्षित होती है कि अनेक अवसरों पर मंगली कन्या का विवाह अमंगली युवक के साथ सम्पन्न होता है परन्तु उनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धिशाली होता है। जबकि मंगलीदोष के सटीक मिलान के पश्चात् संपादित किए जाने वाले अनेक विवाह प्रायः असफल हो जाते हैं और करुणापूर्ण तथा भयावह विकृति, वैधव्य अथवा विवाह विच्छेद का आधार निर्मित करते हैं। सत्यता यह है कि मंगली दोष के विषय में भारी भ्रांति और भ्रमपूर्ण तथ्य समाज में प्रचलित और प्रतिष्ठित हैं जिनका तलस्पर्शी विश्लेषण, विवेचन कदाचित मंगली दोष सन्निहित यथार्थ एवं मंगली योग: विविध संयोग नामक कृतियों के अतिरिक्त अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। मंगली दोष के विषय की अनभिज्ञता ने ही भारतवर्ष के बहुप्रशंसित, 85 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों के रचनाकार श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने इस विषय की अनिवार्यता को समझा और इन दोनों कृतियों के अन्तर्गत शताधिक जन्मांगों के माध्यम से समस्त ज्योतिष प्रेमियों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। इस कृति को अग्रांकित 11 भिन्न-भिन्न अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित किया गया है –
    1. मंगली योग : विविध संयोग; 2. मंगली दोष पर सूर्य का प्रभाव शोध संज्ञान; 3. मंगली दोष पर चन्द्रमा का प्रभाव शोध संज्ञान; 4. मंगली दोष पर बुध का प्रभाव : शोध संज्ञान; 5. मंगली दोष पर बृहस्पति का प्रभाव शोध संज्ञान; 6. मंगली दोष पर शुक्र का प्रभाव : शोध संज्ञान; 7. मंगली दोष पर शनि का प्रभाव शोध संज्ञान; 8. मंगली दोष पर राहु का प्रभाव शोध संज्ञान; 9. मंगली दोष पर केतु का प्रभाव : शोध संज्ञान; 10. महिलाओं हेतु अष्टम भावस्थ मंगल अशुभ परिणाम, तथा 11. मंगलीदोष से रक्षार्थ परिहार विधान।
    उल्लेखनीय है कि मंगली दोष के शुभ अथवा अशुभ फल में विविध ग्रहयोगों के कारण वृद्धि अथवा न्यूनता उत्पन्न होती है तथा इस संदर्भ में कदाचित संपुष्ट शोध प्रस्तुत किए जाने का यह प्रथम अवसर है। मंगली दोष पर विविध ग्रहों के प्रभाव से वैवाहिक सुख की स्थिति पूर्णतः रूपांतरित, परिवर्तित अथवा परिमार्जित हो जाती है। इस मर्म को अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मंगली योगः विविध संयोग शीर्षांकित इस कृति में प्रस्तुत किया गया है। मंगली दोष के शमन हेतु अद्भुत एवं अनुभूत मंत्रप्रयोग तथा परिहार विधान कृति का अतिरिक्त आकर्षण है जिसके अनुसरण से लाखों मंगली जातक / जातिकाएं लाभान्वित हुए हैं।
    समस्त ज्योतिष प्रेमियों के संज्ञान संवर्द्धन हेतु तथा मंगली दोष के निहितार्थ के तलस्पर्शी अध्ययन हेतु यह कृति पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।

    320.00400.00
  • परिणय निर्णयविपुल वैवाहिक सुख का आधार : उपयुक्त परिहार

    परंपरागतगत विवाह समाज और विधि द्वारा परिवार की पूर्णता तथा निरन्तरता का सुरमित मधुवन है, जिसे व्यक्ति का मिथ्याभिमान तथा स्वार्थपरता के विषैले दंश, अपमान, कुण्ठा, कटुता, करुणा की कालिमा से कलंकित करके प्रायः विसंगतिपूर्ण स्वरूप प्रदान कर देते हैं तथा जिसके कारण विधाता द्वारा प्रदत्त वैवाहिक सुख, विवाह विच्छेद की विकृति से अभिशप्त हो विकृत है

    ग्रहों का नकारात्मक स्पंदन, प्रायः नवविवाहिता के जीवन का करुण क्रन्दन बनकर उसके दुर्भाग्य के दुर्दमनी दारुण दुःख के प्रकम्पित कर देने वाले समीकरणों की संरचना कर देता है जिसका सतर्क, वैवाहिक सुख की रक्षा कर सकता है। इसके लिए आवश्यकता है, उपयुक्त परिहार के परिज्ञान और उसके सविधि अनुसरण की, जो इस कृति का वैशिष्ट्य है। इस प्रकार की वैवाहिक विसंगति, विवाह विच्छेद एवं वैधव्य प्रदान करने वाले विविध नकारात्मक ग्रहों का अनुभूत और अद्भुत समाधान, जो भारतवर्ष की प्राचीन ऋषि चेतना, द्वारा हमें समय-समय पर प्राप्त होता रहा है, वह विपुल वैवाहिक सुख का आधार : उपयुक्त परिहार शीर्षांकित इस कृति में अनुमान किया गया है। इन परिहारों का सविधि-सतर्क अनुसरण, समस्त जिज्ञासुओं तथा इनके अनुपालन परिष्कृत का वैवाहिक जीवन, विपुल वैवाहिक सुख से अभिरंजित अभिगुंजित कर देगा

    विविध वैवाहिक विसंगतियों की व्यापक विचारों का सुगम एवं सटीक समाधान प्रदान करने वाला यह ग्रन्थ अन्य ग्रहों के अतिरिक्त प्रबल मंगली दोष से आक्रान्त जातक-जातिकाओं के सुखी, पूर्ण एवं समृद्ध वैवाहिक जीवन की उपलब्धि हेतु अन्यान्य अनुभूत परिहार प्रावधान भी प्रस्तुत करता है।

    कृति को विभिन्न वैवाहिक विसंगतियों के आधार पर अग्रांकित पाँच अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित किया गया है: 1. परिहार परिज्ञान एवं मंत्र आराधना; 2. वैवाहिक विच्छेद एवं वैधव्य से रक्षार्थ मंत्र उपासना; 3. वैवाहिक विसंगतियों के समाधान हेतु विविध स्तोत्र; 4. मंगली दोष के अभंगलकारी परिणाम हेतु परिहार विधान, तथा 5, व्रत का अनुसरण : वैवाहिक विसंगतियों का शमन

    यह कृति समस्त दम्पत्तियों के अतिरिक्त, वरिष्ठ पाठकों, जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमियों, ज्योतिषशास्त्र के अध्येतों व विद्यार्थियों के लिए पठनीय, अनुकरणीय तथा संग्रहणीय ग्रन्थ है जिसमें सन्निहित समस्त परिहार वेदविहित, पुराणगर्मित, आचार्य और शास्त्रानुमोदित होने के साथ-साथ अनुभूत हैं जिनके अनुकरण से वैवाहिक सुख के पार्श्व आलोक से साधकों का वैवाहिक जीवन जगमगा उठेगा और उनके परिणय और प्रणय में प्रेम की सुरभित सुगन्ध सदा महकती रहेगी।

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  • परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान

    समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
    * परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
    अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

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  • परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ

    कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।

    किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं

    कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र

    कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना ​​भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।

    350.00430.00
  • प्रश्न नवनीत

    इस रचना का आरंभ दैवज्ञ शब्द से हुआ है “दैव + ज्ञ” भविष्य या विधि के विधान को जानने वाला दैवज्ञ है। अपने भविष्य को जानने की इच्छा मनुष्य मात्र को हुआ करती है। उस समय तात्कालिक गोचर, पृच्छक की नाम राशि, स्वर या शकुन से भविष्य का फलादेश करने में ज्योतिषी समर्थ होता है। सुना जाता है कि एक बार स्वयं सृष्टिकर्ता और सर्वशास्त्रवेत्ता ब्रह्माजी भी अपना भविष्य जानने के लिए संसार के पालनकर्ता और विश्व के आधार विष्णु भगवान के पास गए थे। शायद आचार्य नीलकंठ बताना चाहते हैं कि प्रश्न शास्त्र के रचयिता स्वयं भगवान विष्णु हैं जिन्होंने इसका उपदेश ब्रह्माजी को लोकोपकार हेतु किया था।

    250.00300.00
  • प्रश्न रहस्य

    श्नतंत्र आचार्य नीलकंठ ने अपने बहुमूल्य ग्रंथ ताजिक नीलकंठी में वर्ष तंत्र के साथ इसे समाहित किया है। यह लगभग 1587 ई० की रचना हैं इस पर डाक्टर बी०वी०रमण की टीका उपलब्ध है
    प्रश्न शिरोमणि श्री वाल्मीकि त्रिपाठी के सुयोग्य पुत्र आचार्य रुद्रमणि द्वारा 18वीं शताब्दी के अंत में लिखा रचना है।

    125.00150.00