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  • ग्रहफल विचारप्लूटो नेपच्यून व यूरेनस सहित

    पुस्तक एक दृष्टि में
    बहुधा ग्रह अपने नैसर्गिक कारकत्व के साथ, जिस भाव में बैठें या जिस भाव के स्वामी हों उनका फल देते हैं। अतः पुस्तक का आरंभ व समापन भाव विवेचन से हुआ है। देखें पृष्ठ 1-18 व परिशिष्ट पृष्ठ 275-278।
    अध्याय दो में भाव विचार के नियम (भाव संबंधी शुभता-अशुभता का बोध) तो परिशिष्ट 2, में भावेश की भाव गत स्थिति का फल दिया है। देखें पृष्ठ 19-30, तथा पृष्ठ 279-295।

    250.00300.00
  • चद्र दशा फलदीपिका

    चन्द्रमा अनादि काल से सौन्दर्य का प्रतीक स्वीकारा गया है। चन्द्रमा के दर्शन मात्र से जीवन की अनेक क्लिष्ट स्थितियों के समाधान का पथ प्रशस्त होता है। दर्शन करने में चन्द्रमा जितना निर्मल कोमल और स्वच्छ प्रतीत होता है, वास्तव में देह उतना ही जटिल है। चन्द्रमा के महत्व को समझना सुगम है परंतु उसके वास्तविक फलाफल का सटीक विवेचन अधिक दुःसाध्य है। पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करने वाला चन्द्रमा, पृथ्वीवासियों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है इसीलिए चन्द्रमा को जन्मांग का प्राप्ण घोषित किया गया है। चन्द्रमा का बलाबल और स्थिति ही जन्मांग की प्रबलता या निर्बलता का आधार है। चन्द्रमा की विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित अनुकूल-प्रतिकूल फलाफल का तलस्पर्शी अध्ययन और उसके क्रियान्वयन हेतु अनेक शोधपरक सिद्धान्तों तथा विशिष्ट सूत्रों का उपयुक्त समायोजन चन्द्र दशाफल दीपिका में किया गया है ताकि चन्द्रमा की दशान्तर्दशा के अन्तर्गत होने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं का सटीक आकलन किया जाना संभव हो सके।

    इस कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है जिनके अध्ययन से चन्द्रमा की महादशा व अंतर्दशा के विषय में सम्यक् संज्ञान प्राप्त करके सटीक भविष्यकथन किया जा सकता है: 1. ग्रहस्थिति एवं फलकथन, 2. भावगत दशाफल विवेचन, 3. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रग्रह का महत्व, 4. विविध भावगत चन्द्रमा की दशा का फल, 5. बारह जन्म राशियों का फल. 6. बारह राशियों में चन्द्रमा का फल, 7. लग्न फल, 8. विविध लग्नों के लिए भावगत चन्द्रमा का फल. 9. चन्द्रमा की महादशा का संभावित फलाफल, 10. चन्द्रमा की महादशा का फल, 11. चन्द्रमा की महादशा के मध्य अंतर्दशाओं का फल, तथा 12. चन्द्र पीड़ा परिहार विधान।

    यह एक व्यावहारिक और ज्योतिष शास्त्र पर केन्द्रित शताधिक शोध प्रबन्धों के रचनाकार ज्योतिर्विदों का प्रथम प्रयास है कि विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित प्रत्येक ग्रह की महादशा और अंतर्दशाओं का इतना वृहद, संपुष्ट और अनुभूत फलकथन दशाफल दीपिका की श्रृंखला के अंतर्गत किया जाना संभव हो सका। सर्वविदित है-कि विश्व में सबसे अधिक उपयोग विंशोत्तरी दशाओं का ही होता है इसलिए इस दशाफल दीपिका श्रृंखला को विंशोत्तरी दशाओं तक ही सीमित रखा गया है। विश्वास है कि विंशोत्तरी दशाफल से सम्बन्धित कृति के अध्ययन की आंकाक्षा व समस्त दशाओं की संरचना के परिणाम से सम्बन्धित जिज्ञासा का सशक्त सारभूत व सारगर्भित समाधान है चन्द्र दशाफल दीपिका जो प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रो व ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    400.00500.00
  • चिकित्सा ज्योतिष

    जैसा कि अन्य प्राचीन ज्योतिषियों ने अपने गहन अनुभव व अध्ययन से ग्रह राशि व नक्षत्र से अवयव व रोग पर विचार किया है। उसी परंपरा को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए यहाँ रोग के मूल कारण वात, पित्त, कफ पर चर्चा करने के बाद वैकल्पिक चिकित्सा प्रणाली यथा सप्तचक्र, नाड़ी शोधन, योग मुद्राएँ व सटीक बिंदु दबाव पर चर्चा हुई है। इस पुस्तक का उद्देश्य संभावित रोगों की जानकारी देना है व उनसे बचाव के रोग निवारण के सरल व सर्व सुलभ उपायों की खोज

    210.00250.00
  • जातक सारावली नवम् भव

    ग्रन्थ-परिचय

    ज्योतिष सारावली-दशम भाव आकाशीय पिंडों का अध्ययन एवं ज्योतिष शास्त्र के शोध सिद्धांतों से लोकहित व्यवसाय पक्ष का प्रकाश पुंज है। व्यवसाय और कर्म की अधिष्ठाता महाप्रभु की परमपावन पुण्य पदराज का मंगल तिलक है जातक सारावलि-दशम भाव। व्यवसाय अर्थात् जीविकोपार्जन का माध्यम, समस्त मानव जाति की गति, मति, प्रगति, विकास की सम्यक् स्थिति का नवोदित अंग है। व्यवसाय का गौरव ही नर-नारियों की प्रभुता और सत्ता, अधिकार और कर्तव्य, कर्म और दायित्व की त्रिवेणी है और यही जीवन के विविध मिश्रण और साम्राज्य से अलंकृत कर्म का ऐसा सिंधु है, जिसमें अस्तित्व, अनंत, अविरल, निर्मल, कोमल मधु और तरल पदार्थों का समावेश और निरंतर प्रवाह होता है। मनोनुकूल व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता होती है। व्यवसाय पक्ष पर कई ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन अधिकांश ग्रंथों की सत्यता संदिग्ध है।

    किसी कुशल ज्योतिर्विद से पूछे जाने वाली प्रमुख जिज्ञासाओं में जातक /जातिका के व्यवसाय से सम्बन्धित प्रश्न को रेखांकित किया जा सकता है। वह नौकरी करेगा या व्यापार में सफलता प्राप्त करेगा, उद्योगपति बनेगा या परामर्शदाता बनकर धनार्जन करेगा। यदि उद्योगपति बनेगा तो किस स्तर का होगा, क्या देश के प्रतिष्ठित और यशस्वी उद्योगपतियों में उसके नाम की गणना होगी या फिर कोई साधारण नौकरी करके मात्र जीवनयापन कर सकेगा। ऐसे कई प्रश्न अभिभावकगण प्रायः पूछते रहते हैं और यह स्वाभाविक होने के साथ ही अनिवार्य भी है। जातक सारावली-दशम भाव का वैशिष्ट्य है, नवांश चक्र द्वारा उपयुक्त व्यवसाय को रेखांकित करना। नवांश चक्र के अध्ययन के अभाव में किसी भी जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान करना लगभग उसी प्रकार है, जैसे किसी व्यक्ति का चित्र देखकर सम्बन्धित व्याधियों का रेखांकन करना। अस्तु, नवांश चक्र का तलस्पर्शी मर्म तथा ऐसे अनेक विषयों के प्रामाणिक व परीक्षित शोधसूत्र, इस कृति में समाहित हैं जो इसे व्यवसाय पक्ष पर केन्द्रित एक असाधारण कृति के रूप में परिलक्षित करते हैं।

    कृति को विषय के विस्तृत धरातल के आधार पर 19 शोधपरक एवं ज्ञानवर्द्धक अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है। इस कृति के अंतर्गत श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अपने पूर्व 40 वर्षों के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान के पावन प्रांजल पीयूष का संचरण किया है। समस्त जिज्ञासु पाठकों एवं ज्योतिष प्रेमियों के लिए जातक सारावली-दशम भाव पठनीय, अनुकरणीय व संग्रहणीय है जिसमें सन्निहित सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से व्यवसाय पक्ष से संदर्भित भविष्य कथन करने का अपूर्व कौशल और सामर्थ्य प्राप्त होना संभव है।

    450.00550.00
  • जातक सारावलीदशम भाव

    जातक सारावली-दशम भाव आकाशीय पिंडों का अध्ययन एवं ज्योतिष शास्त्र के शोध सिद्धांतों से लोकहित व्यवसाय पक्ष का प्रकाश पुंज है। व्यवसाय और कर्म की अधिष्ठाता महाप्रभु की परमपावन पुण्य पदराज का मंगल तिलक है जातक सारावलि-दशम भाव। अर्थात व्यवसाय जीविकोपार्जन का माध्यम, समस्त मानव जाति की गति, मति, प्रगति, विकास की सम्यक स्थिति का नवोदित अंग है। व्यवसाय का गौरव ही नर-नारियों की प्रभुता और सत्ता, अधिकार और कर्तव्य, कर्म और दायित्व की त्रिवेणी है और यही जीवन के विविध मिश्रण और साम्राज्य से अलंकृत कर्म का ऐसा सिंधु है, जिसमें अस्तित्व, अनंत, अविरल, निर्मल, कोमल मधु और तरल पदार्थों का समावेश और निरंतर प्रवाह होता है। मनोनुकूल व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता होती है। व्यवसाय पक्ष पर कई ग्रंथ उपलब्ध हैं परतु अधिकांश ग्रंथों की सत्यता संदिग्ध है।

    किसी कुशल ज्योतिर्विद् से पूछे जाने वाली प्रमुख जिज्ञासाओं में जातक /जातिका के व्यवसाय से सम्बन्धित प्रश्न को रेखांकित किया जा सकता है। वह नौकरी करेगा या व्यापार में सफलता प्राप्त करेगा, उद्योगपति बनेगा या परामर्शदाता बनकर धनार्जन करेगा। यदि उद्योगपति बनेगा तो किस स्तर का होगा, क्या देश के प्रतिष्ठित और यशस्वी उद्योगपतियों में उसके नाम की गणना होगी या फिर कोई साधारण नौकरी करके मात्र जीवनयापन कर सकेगा। ऐसे कई प्रश्न अभिभावकगण प्रायः पूछते रहते हैं और यह स्वाभाविक होने के साथ ही अनिवार्य भी है। जातक सारावली-दशम भाव का वैशिष्ट्य है, नवांश चक्र द्वारा उपयुक्त व्यवसाय को रेखांकित करना। नवांश चक्र के अध्ययन के अभाव में किसी भी जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान करना लगभग उसी प्रकार है, जैसे किसी व्यक्ति का चित्र देखकर सम्बन्धित व्याधियों का रेखांकन करना। अस्तु, नवांश चक्र का तलस्पर्शी मर्म तथा ऐसे अनेक विषयों के प्रामाणिक व परीक्षित शोधसूत्र, इस कृति में समाहित हैं जो इसे व्यवसाय पक्ष पर केन्द्रित एक असाधारण कृति के रूप में परिलक्षित करते हैं।

    कृति को विषय के विस्तृत धरातल के आधार पर 19 शोधपरक एवं ज्ञानवर्द्धक अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है। इस कृति के अंतर्गत श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अपने पूर्व 40 वर्षों के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान के पावन प्रांजल पीयूष का संचरण किया है। समस्त जिज्ञासु पाठकों एवं ज्योतिष प्रेमियों के लिए जातक सारावली-दशम भाव पठनीय, अनुकरणीय व संग्रहणीय है जिसमें सन्निहित सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से व्यवसाय पक्ष से संदर्भित भविष्य कथन करने का अपूर्व कौशल और सामर्थ्य प्राप्त होना संभव है।

    360.00450.00
  • जातक सारावलीषष्ठम भाव

    जाति सारावली–षष्ठ भाव वह जनसमुदाय के सन्ताप को नष्ट करने की मूल प्रेरणा से शब्दांकित है जो भय, आतंक, अनाचार, विनाश, वैर की पंचाग्नि में तप रहा है। समकालीन समाज में साम्यवादी प्रखर प्रतिद्वन्द्विता ने सामंजस्यपूर्ण-संतोष-साहिष्णुता को हतप्रभ कर दिया है। फलतः अत्यंत सामान्य एवं उपेक्षणीय विषय-संदर्भों को लेकर भी लोगों में भीषण शत्रुता का सूत्रपात होता है। ज्योतिषी के अनुभव से यह प्रमाणित होता है कि विवाह एवं संतान के प्रश्न, जिज्ञासाओं के उपांतर शत्रुता की विभीषिका ज्योतिषी से दग्धा ज्योतिष ही भविष्यवेत्ताओं की शरण ग्रहण करते हैं।

    लब्धप्रतिष्ठ मंत्रविशारद आचार्य गोविन्द शात्री ने एक विचार-विमर्श में इस कटु सत्य को रेखांकित किया कि पारस्परिक सहयोग पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का यह दुर्भाग्य है कि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की शत्रुता के व्यामोह में आबद्ध है। इसीलिए सकारात्मक प्रवृत्तियाँ उदात्त चेतना-धरातल का परित्याग कर विनाश को आमंत्रित कर रही हैं।

    400.00500.00
  • जातकसारावलीअष्टम भाव

    इस संसार का सर्वाधिक प्रबल पक्ष है मृत्यु। जिसको जीवन मिला है, उसकी मृत्यु होना सुनिश्चित है। प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य से अवगत है कि कभी न कभी काल के कराल कर उसके जीवन को ध्वस्त कर देंगे। किसी का जीवन पल मात्र का होता है और किसी का जीवन सौ वर्ष से भी अधिक होता है। इस सत्य को सभी को भलीभांति समझने का प्रयास करना चाहिए कि हमें विधाता ने जितने दिन भी जीने को दिए हैं, उसे हमें एक पराक्रमी, साहसी, निर्भीक, परिश्रमी और आनन्द की समस्त विधाओं को गले लगाने और दूसरों में खुशियाँ बाँटने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है और उसी क्षण आनी है, जिस क्षण विधाता ने लिखी है। जीवन के इस वास्तविक सत्य को सभी को सदा आत्मसात करना चाहिए।

    राजा परीक्षित ने आचार्य शुकदेव जी से श्रीमद्भागवतपुराण खूब मन लगाकर सुना। अन्त में शुकदेव महाराज ने राजा परीक्षित से प्रश्न किया है- हे राजन् ! मैंने तुम्हें श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया। अब एक प्रश्न मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ। राजा परीक्षित बोले- जी, अवश्य पूछिए । आचार्य शुकदेव ने पूछा कि क्या तुम मरोगे? राजा परीक्षित ने कहा कि मैं कभी नहीं मरूँगा और यही जीवन का यथार्थ है।

    450.00550.00
  • जातकसारावलीद्वितीय भाव

    धनार्जन, धन संचय तथा धन संवर्द्धन के विविध विधान के अन्यान्य अलौकिक शोध सिद्धान्तों से आलोकित ग्रहयोगों तथा उपयुक्त उदाहरणों से अलंकृत, आचार्यानुमोदित, शास्त्र संदर्भित ग्रन्थ जातक सारावली–द्वितीय भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी।

    जातक के भाग्य पर विचार करने के साथ-साथ द्वितीय भाव का प्रबल होना भी अपेक्षित है। धनागमन का स्रोत ज्ञात हो, तो उसी के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। धन भाव की प्रबलता या निर्बलता का अनुमान करन क लिए षष्ठ च स्थान पान का अध्ययन भी अनिवार्य है क्योंकि षष्ठ भाव, द्वितीय भाव से पंचमस्थ फलेवा है बीर दास भाव द्वितीय भाव से नवमस्थ होता है। इन तीनों भावों में परस्पर विरामेपास्याश अम्वन्ध का अध्ययन ही जातक के धनवान हाने की वास्तविक स्थिति का परिचालन प्रधान करता है।

    लिलीय चाचयता ग्रहों की विस्तृत व्याख्या और उनसे सम्बन्धित अन्यान्य शास्त्रीय प्रष्चों में विलमान सामग्री के साथ लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान और अम्पास का सारांश सटीक उदाहरणों के साथ इस कृति में समायाजित किया गया है। द्वितीय भाव में संस्थित ग्रहों के अतिरिक्त द्वितीयश की विभिन्न भाव में संस्थिति का फल, विभिन्न भावों के अधिपतियों के द्वितीय भावगत होने का फल एवं द्वितीय भाव म दो या दो से अधिक ग्रहों की युति का फल आदि का इतना संपुष्ट और सघन विश्लेषण प्रथम बार इस कृति में आविष्ठित है।

    जातक सारावली–द्वितीय भाव को अग्रांकित शीर्षकों में विभाजित करक कृति के आधार के शोध सिद्धांतों को प्रबल धरातल प्रदान किया गया है: 1. द्वितीय भाव : विविध पक्ष, 2. द्वितीय भावगत ग्रहों का फल, 3. द्वितीय भावगत विभिन्न राशियों एवं ग्रहों की दृष्टि का फल, 4. द्वितीय भावगत विभिन्न ग्रह युतियों का फल, 5. द्वितीयेश के विभिन्न भावगत होने का फल, 6. विभिन्न भावेशों के द्वितीय भावगत होने का फल, 7. ग्रहों का संतुलन एवं समृद्धि का संवर्द्धन, 8. धन योग : ग्रहों का संयोग, तथा 9. विपुल वित्तार्जन: विविध समीकरण।

    जातक सारावली–द्वितीय भाव, धनार्जन, धनसंचय, धनीक्ष्याम, धन संवर्द्धन तथा विपुल धन के विस्तार और प्रसार के साथ आय के स्रोत के अनुमान, चामी से फाई मुखमंडल के सोन्दर्य, नेत्रों की ज्योति तथा परिवार के पठन के अध्ययन हेतु पृछ प्रामाणिक ओर परीक्षित ग्रन्थ है जो सभी ज्योतिष प्रेमियों के लिए उदरणीय पहनीर अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    320.00400.00
  • जातकसारावलीपंचम भाव

    ग्रन्य-परिचय

    संतति-सुख के अभाव में, दाम्पत्य सुख की सम्पूर्णता सदा ही संदिग्ध रहती है।

    सन्तान भविष्य की नियामक होने के साथ-साथ, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के मध्य निर्मित होने वाले सुन्दर समीकरण का स्वर्णिम सुदीप है। संतति-सुख के विविध पक्षों की शास्त्रानुमोदित व्याख्या तथा फलादेश के प्रमाणित, परीक्षित तथा प्रतिष्ठित सूत्रों के संतुलित समायोजन के साथ-साथ, पंचम भावगत नवग्रहों के फलाफल का विस्तृत विवेचन एवं संदर्भित सूत्रों की प्रामाणिकता को विविध जन्मांगों की व्याख्या द्वारा इस कृति में सिद्ध किया गया है। पुत्र और पुत्रियों की संख्या, संततिहीनता अथवा दत्तक संतति सम्बन्धी ग्रहयोगों को विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

    पंचम भाव से बुद्धि की प्रखरता, ज्ञान की दिशा, रचनात्मकता, कलात्मकता, बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति, शिक्षा, विद्वत्ता, बौद्धिक कौशल, प्रेम सम्बन्धों की सफलता अथवा विफलता तथा संतति सुख का उल्लास एवं संततिहीनता के संत्रास आदि के अनुमान से संदर्भित विविध दुर्लभ सूत्र, जातक सारावली-पंचम भाव का वैशिष्ट्य है।

    जातक सारावली-पंचम भाव अग्रांकित अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित है-1. पंचम भावगत राशियाँ, तथ्य एवं तत्त्व आदि; 2. पंचमेश की विभिन्न भावस्थिति के अनुसार फल; 3. विभिन्न भावेशों के पंचम भावगत होने तथा ग्रहों की दृष्टि का समीकरण; 4. पंचम भाव से सम्बद्ध विशिष्ट शोध सिद्धान्त; 5. पंचम भावगत सूर्य का फल; 6. पंचम भावगत चन्द्रमा का फल; 7. पंचम भावगत मंगल का फल; 8. पंचम भावगत बुध का फल; 9. पंचम भावगत बृहस्पति का फल; 10. पंचम भावगत शुक्र का फल; 11. पंचम भावगत शनि का फल; 12. पंचम भावगत राहु का फल; 13. पंचम भावगत केतु का फल; 14. पंचम भाव बौद्धिक प्रखरता एवं शिक्षा; 15 पंचम भाव से संदर्भित कतिपय विशेष ग्रहयोग; 16 पुत्र सुखः परिज्ञान एवं परिणाम; 17. मुख्यतः कन्याओं के जन्म हेतु ग्रहयोग; 18. सन्तानहीनता एक अभिशाप; 19. दत्तक पुत्र हेतु ग्रहीय आयाम तथा 20. पंचमेश की महादशा का फल।

    जातक सारावली-पंचम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने ‘गागर में सागर’ भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    370.00450.00
  • जातकसारावलीप्रथम भाव

    ग्रन्थ-परिचय

    ज्योतिष शास्त्र के अभिनव अभिज्ञान के अन्यान्य शोध सिद्धान्तों के अभ्युदय के इस अभियान के रत्नमण्डित सोपान के प्रथम सुरमित सूत्र परिज्ञान को जातक सारावली-प्रथम *भाव से शीषांकित किया गया है। इसके अंतर्गत समस्त ज्योतिष शास्त्रों के सौरभूत सिद्धांतों एवं शोध सूत्रों के सम्यक् संकलन की अनिवार्यता सभी ज्योतिष प्रेमी अनादि काल से अनुभव करते रहे हैं जिसका आचार्यानुमोदित समाधान कृति की संरचना का सार्वभौमिक, सार्वलौकिक प्रयोजन है।

    भारतवर्ष के बहुप्रतिष्ठित ज्योतिर्विद श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने विविध ग्रन्थों एवं ज्योतिष शास्त्रों से स्वर्णिम सिद्धान्तों का सतर्कतापूर्वक चयन एवं संकलन करके इस कृति में सुंदर स्वरूप में सुव्यवस्थित व समायोजित किया है ताकि प्रखर जिज्ञासुओं व समस्त ज्योतिष प्रेमियों को एक ही स्थल पर अधिकाधिक ज्योतिष शास्त्र का तलस्पर्शी संज्ञान उपलब्ध हो सके और सत्य व सटीक भविष्यकथन करने में सफलता प्राप्त हो।

    ग्रहों की विविध भाव स्थिति, भावाधिपति की पृथक् पृथक् भाव स्थिति का फल, विभिन्न भावों के स्वामियों के लग्नगत होने का परिणाम, लग्नगत ग्रहों के साथ अन्य ग्रहों की युति तथा दृष्टि आदि का सम्यक् विवेचन इस कृति का वैशिष्ट्य है।

    कृति को बारह अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण भागों में विभाजित, व्याख्यायित तथा अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित किया गया है- 1. ग्रहीय आयाम एवं राशि चक्र, 2. ज्योतिष शास्त्र के सारभूत सूत्र, 3. फलित ज्योतिष के स्वर्णिम सिद्धान्त, 4. नवांश : सन्निहित यथार्थ, 5. प्रथम भाव फल निर्णय, 6. समय संज्ञान एवं समीक्षा, 7. शनि-शुक्र अथवा शुक्र-बृहस्पति की दशान्तर्दशा, 8. लग्न में नवग्रहों की स्थिति के अनुसार फलाफल, 9. लग्नगत विभिन्न राशियों का फलाफल, 10. लग्नेश के भिन्न-भिन्न भावगत होने का फलाफल, 11. लग्न में विभिन्न ग्रह युति फल, तथा 12. प्रमाणित, प्रतिष्ठित एवं परीक्षित प्रयोग।

    जातक सारावली-प्रथम भाव के अन्तिम अध्याय में ज्योतिष शास्त्र के सौ से अधिक ऐसे ज्ञातव्य शोध सूत्रों को प्रस्तुत किया गया है जो कदाचित अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। यह सिद्धान्त सूत्र, भविष्यकथन में आश्चर्यजनक सत्यता, सूक्ष्मता, सतर्कता, सहज ही परिलक्षित करते हैं।

    जातक सारावली-प्रथम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने गागर में सागर भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। जातक सारावली-प्रथम भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।

    320.00400.00
  • ज्योतिष सर्वस्व आधुनिक समय में एक ज्योतिषी य विवेचना भाग-1

    पुस्तक परिचय

    ‘भविष्यवाणी ज्योतिष की उन्नत तकनीकें आधुनिक समय में एक वैदिक ग्रंथ (तीन खंड)’ भविष्यवाणी तकनीकों पर ध्यान देने के साथ वैदिक ज्योतिष संहिता गणित होरा के सभी तीन मुख्य उप-विभाजनों को शामिल करता है। यह 21 अनुलग्नकों के साथ विभिन्न अध्यायों में वर्णित है। कुछ चुनींदा अंश हैं:

    कुंडली निर्णय में कुंडली के निर्णय के सिद्धांत, डिविजनल चार्ट और समय सुधार के सिद्धांतों की केस व्याख्या और केस अध्ययन शमिल हैं।

    चिकित्सा ज्योतिष में चिकित्सा ज्योतिष के सिंद्धांत और दीर्घायु, स्वास्थ्य और रोगों की व्याख्या और केस स्टडी शमिल हैं।
    प्रेम, संबंध, विवाह और संतान में स्वीजातक स्वी राशिफल, प्रेम, रिश्ते और विवाह में मुदे, विवाह पैरामीटर्स, विवाह और संबंधों के लिए अनुकूलता, विवाह मुहुर्त, केस अध्ययन प्रेम, रिश्ते, विवाह सिद्धांत और विभिन्न पहलुओं पर केस अध्ययन शमिल हैं।

    पारगमन और अष्टकवर्ग में पारगमन और अष्टवर्ग की व्याख्या, एक राशि में ग्रह के प्रवेश के लिए राशि-वार पूर्वानुमान ओर अलग-अलग जन्म लेने वाले व्यक्तियों के लिए मासिक पूर्वानुमान शामिल है

    वार्षिक चार्ट में वार्षिक चार्ट की व्याख्या के सिद्धांत और केस अध्ययन शामिल हैं।

    जैमिनी शास्व में जैमिनी सूत्र एक सारांश, केस, अध्ययन शामिल हैं-चर, मंडूक और विंशोत्तरी दशा प्रणालीय दीर्घायु के लिए शूल, नवमांश, स्थिर और ब्रहा दशांए और सह-जन्म और संतान की संख्या, लिंग और क्रम पर विवरण है।

    प्रश्न शास्व में प्रश्न चार्ट की व्याख्या के लिए मूल बातें, प्रश्न चार्ट की व्याख्या के घर-वार सिद्धांत, केस अध्ययन-स्वास्थ्य मुदों, धन, संपत्ति और पारिवारिक खुशी, संतान, उच्च शिक्षा और प्रेम संबंधों से संबंधित प्रश्नों की व्याख्या शामिल है।, ऋण, कानूनी विवाद और दुर्घटनाएं, विवाह और वैवाहिक जीवन, विरासत, मृत्यु का कारण, यात्राएं और माता-पिता, व्यवसाय, लाभ, सफलता और मोक्ष और चोरी और गुमशुदा व्यक्ति पर विवरण है।

    चक्र भविष्यवाणी में सर्वतोभद, सिंहासन, छत्र, राहु कालानल, कोट, संघठा राशि, संघट्टा नक्षत्र, सुरदर्शन, मातृका चक्र, कूर्म और अन्य चक्रों की व्याख्या और केस अध्ययन शामिल हैं। एलओजे केकेएल (स्वर शास्त्र)।

    संहिता खगोल-मौसम विज्ञान में खगोल-मौसम विज्ञान, लघु, मध्यम और दीर्घकालिक भविष्यवाणी, केस अध्ययन-मौसम, बारिश और फसलों की भविष्यवाणी के सिद्धांत शामिल हैं।

    संहिता मुंडन में सांसारिक ज्योतिष के सिद्धांत और केस अध्ययन शामिल हैं-कमोडिटी मूल्य रूझान और केस स्टडीज।

    यह पुस्तक बहुत व्यापक है और वैदिक ज्योतिष पर मौजूदा साहित्य में एक शानदार कड़ी है। यह पुस्तक न केवल उन्नत पूर्वानुमान तकनीकों का एक संग्रह है, बल्कि उनकी प्रयोज्यता दिखाने के लिए बड़ी संख्या में वास्तविक जीवन के मामले के अध्ययन भी शामिल हैं। यह ज्योतिषियों के पूर्वानुमान कौशल को समग्र रूप से उन्नत करने में बहुत उपयोगी होगा।

  • ज्योतिष और रोगकारण और निवारणभाग 1

    रोग क्या है, स्वस्थ कौन, ज्योतिष में स्वास्थ्य विचार, लग्नबल-लग्नेशबल-शुभ कर्तरी योग-निष्पाप चंद्रमा, शुभ ग्रह शुभस्थान में तथा पापग्रह दुःस्थान में, लग्न व लग्नेश का राशि बल, त्रिकेश का त्रिक बंधन शुभ है, अष्टमेश बली या शनि अष्टमस्थ, बली लग्न से बेहतर स्वास्थ्य, रुग्ण देह या निर्बल शरीर, लग्न व लग्नेश की दुर्बलता, चंद्रमा का पापत्व, त्रिषडाय में ग्रह का अभाव, केन्द्र/त्रिकोण में क्रूर ग्रह की स्थिति, अष्टमेश की निर्बलता आरोग्य लाभ या रोग से मुक्ति, उदाहरण कुंडलियां अधोभाग की दुर्बलता, मांसपेशियों की बढ़ती दुर्बलता, दुर्बल मांसपेशियां, मांसपेशियों की कमजोरी, विवेचन व समीक्षा।

    400.00500.00
  • ज्योतिष के झरोखों सेबद्धि विद्या विचार

    “बुद्धि विद्या” पर कोई लघु पुस्तिका बने जो माता-पिता को अपने बच्चे में छिपी क्षमता, योग्यता तथा विशिष्ट गुणों की पहचान कर उसे एक गुणी, सक्षम व धनी मानी व्यक्ति बनाने की राह सुझाए। उनका तर्क था कि प्रतिवर्ष लाखों बल्कि शायद करोड़ों किशोर शिक्षा के किस क्षेत्र का चयन करें इस समस्या से गुजरते हैं उनकी मदद करना ज्योतिषियों का कर्त्तव्य ही नहीं शायद एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।

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  • ज्योतिष प्रवेशिका

    विज्ञ पाठकों के सन्मुख पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। पूरी पुस्तक प्रायः आद्योपान्त संशोधित एवं परिमार्जित रूप में फिर से लिखी गयी है।

    यह पुस्तक अपने वर्तमान स्वरूप में श्री कृष्णन राजू नायर (ज्योतिषाचार्य, भारतीय विद्या भवन) के अथक प्रयत्नों तथा जिज्ञासाओं के कारण संभव हुई है। श्री राजू ज्योतिष शास्त्र के गम्भीर शोधकर्ता तो हैं ही, कम्पयूटर पर उनकी अद्भुत दक्षता तथा मातृभाषा न होने पर भी उनका हिन्दी का ज्ञान स्पृहणीय तथा अनुकरणीय है। श्री राजू ने वर्त्तमान संशोधित संस्करण के टंकण का दुष्कर कार्य स्वेच्छा से किया है। इस क्रम में उन्होने जिज्ञासु विद्यार्थी की अतुलनीय भूमिका निबाहते हुए भारतीय संस्कृति तथा ज्योतिष शास्त्र के अन्योन्याश्रय सम्बन्धों के विषय में अनेक शंकाएँ सामने रखीं। मुख्यतः ये प्रश्न दैनिक जीवन में पंचांग की भूमिका, षोडश संस्कार, मंगल दोष का औचित्य, विवाह, व्रत, पर्व और उत्सव, वर्षा विज्ञान आदि विषयों से सम्बन्धित थे। हमने उनके प्रश्नों के यथासंभव उत्तर दिये जिन्हें उन्होंने इस पुस्तक में सम्मिलित करने का विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह किया। यह मानते हुए कि उनकी शंकाएँ ज्योतिष शास्त्र के सामान्य ही नहीं अपितु कुशाग्र विद्यार्थियों की भी होंगी, हमने इस पुस्तक में उन सभी विषयों का संक्षेप में समावेश किया है। इस क्रम में पुस्तक का कलेवर अपेक्षाकृत वृहद हो गया है।

    हमें यह स्वीकारते भी तनिक संकोच नहीं होता कि पिछले संस्करण में कुछ भाषागत अशुद्धियाँ रह गयी थीं किन्तु सरस्वती स्वरूपा सुश्री विमा बिष्ट ने अत्यन्त सावधानीपूर्वक सारी अशुद्धियों से मुक्ति दिला कर हमें कृतार्थ किया है। सुश्री विभा सम्प्रति सी.डॉट की राजभाषा अधिकारी है तथा दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के समाचार प्रभाग से सक्रिय रूप से जुड़ी हैं।

    हम इस पुस्तक में मौलिक चिन्तन का दम्म नहीं भरते किन्तु आर्ष सूत्रों को समसामायिक परिपेक्ष्य में देखने और दिखाने का हमारा यह निष्कपट प्रयास श्री राजू तथा उन जैसे शोधार्थियों के लिये किञ्चित भी उपयोगी सिद्ध हो तो हम विघ्नेश्वर श्री गणेश की कृपा ही समझेंगे।विज्ञ पाठकों के सन्मुख पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। पूरी पुस्तक प्रायः आद्योपान्त संशोधित एवं परिमार्जित रूप में फिर से लिखी गयी है।

    यह पुस्तक अपने वर्तमान स्वरूप में श्री कृष्णन राजू नायर (ज्योतिषाचार्य, भारतीय विद्या भवन) के अथक प्रयत्नों तथा जिज्ञासाओं के कारण संभव हुई है। श्री राजू ज्योतिष शास्त्र के गम्भीर शोधकर्ता तो हैं ही, कम्पयूटर पर उनकी अद्भुत दक्षता तथा मातृभाषा न होने पर भी उनका हिन्दी का ज्ञान स्पृहणीय तथा अनुकरणीय है। श्री राजू ने वर्त्तमान संशोधित संस्करण के टंकण का दुष्कर कार्य स्वेच्छा से किया है। इस क्रम में उन्होने जिज्ञासु विद्यार्थी की अतुलनीय भूमिका निबाहते हुए भारतीय संस्कृति तथा ज्योतिष शास्त्र के अन्योन्याश्रय सम्बन्धों के विषय में अनेक शंकाएँ सामने रखीं। मुख्यतः ये प्रश्न दैनिक जीवन में पंचांग की भूमिका, षोडश संस्कार, मंगल दोष का औचित्य, विवाह, व्रत, पर्व और उत्सव, वर्षा विज्ञान आदि विषयों से सम्बन्धित थे। हमने उनके प्रश्नों के यथासंभव उत्तर दिये जिन्हें उन्होंने इस पुस्तक में सम्मिलित करने का विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह किया। यह मानते हुए कि उनकी शंकाएँ ज्योतिष शास्त्र के सामान्य ही नहीं अपितु कुशाग्र विद्यार्थियों की भी होंगी, हमने इस पुस्तक में उन सभी विषयों का संक्षेप में समावेश किया है। इस क्रम में पुस्तक का कलेवर अपेक्षाकृत वृहद हो गया है।

    हमें यह स्वीकारते भी तनिक संकोच नहीं होता कि पिछले संस्करण में कुछ भाषागत अशुद्धियाँ रह गयी थीं किन्तु सरस्वती स्वरूपा सुश्री विमा बिष्ट ने अत्यन्त सावधानीपूर्वक सारी अशुद्धियों से मुक्ति दिला कर हमें कृतार्थ किया है। सुश्री विभा सम्प्रति सी.डॉट की राजभाषा अधिकारी है तथा दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के समाचार प्रभाग से सक्रिय रूप से जुड़ी हैं।

    हम इस पुस्तक में मौलिक चिन्तन का दम्म नहीं भरते किन्तु आर्ष सूत्रों को समसामायिक परिपेक्ष्य में देखने और दिखाने का हमारा यह निष्कपट प्रयास श्री राजू तथा उन जैसे शोधार्थियों के लिये किञ्चित भी उपयोगी सिद्ध हो तो हम विघ्नेश्वर श्री गणेश की कृपा ही समझेंगे।

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  • ज्योतिष में नवांश का महत्व

    इस पुस्तक की विशेषता सूत्र ही नहीं, उनसे सम्बधित उदाहरण भी हैं। इससे यह पुस्तक सूखा मरुस्थल नहीं, पहाड़ों की सुरभित वादी है, जो पाठकों का मनमोह लेगी।
    मैं इस पुस्तक के लिए श्री कृष्ण कुमार को साधुवाद देता हूँ और शुभकामना है कि इनकी लेखनी से ज्योतिष साहित्य की अजस्र धारा सदैव इसी प्रकार बहती रहे।

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  • ज्योतिष विज्ञानसिद्धांत शिरोमणि

    जातक सारावली-दशम भाव आकाशीय पिंडों के अध्ययन एवं ज्योतिष शास्त्र के शोध सिद्धांतों से आलोकित व्यवसाय पक्ष का प्रज्वलित प्रकाश पुंज है। व्यवसाय और कर्म के अधिष्ठाता महाप्रभु की परमपावन पुनीत पदरज का मंगल तिलक है जातक सारावली-दशम भाव। व्यवसाय अर्थात् जीविकोपार्जन का माध्यम, समस्त मानव जाति की गति, मति, प्रगति, उन्नति की सम्यक् स्थिति का सक्रिय अभिनव अंग है। व्यवसाय का गौरव ही नर-नारियों की प्रभुता व सत्ता, अधिकार व कर्तव्य, कर्म व दायित्व की त्रिवेणी है और यही जीवन की विविध व्यवस्थाओं और पारिस्थितिक से अलंकृत कर्म का ऐसा सिंधु है, जिसमें अनवरत, अनंत, अविरल, निर्मल, कोमल मधु एवं दुग्ध स्तंभ का समायोजन एवं निरंतर प्रवाह होता रहता है। मनोनुकूल व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता होती है। व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन अधिकांश ग्रंथों की प्रामाणिकता संदिग्ध है
    किसी कुशल ज्योतिर्विद् से पूछे जाने वाली प्रमुख जिज्ञासाओं में जातक/जातिका के व्यवसाय से संबंधित प्रश्न को समेकित किया जा सकता है। वह नौकरी करेगा या व्यापार में सफलता प्राप्त करेगा, उद्योगपति बनेगा या उद्योग बनकर धनार्जन करेगा। यदि उद्योगपति बनेगा तो किस स्तर का होगा, क्या देश के प्रतिष्ठित और यशस्वी उद्योगपतियों में उसके नाम की गणना होगी या फिर कोई साधारण नौकरी करके मात्र जीवनयापन कर सकेगा। ऐसे कई प्रश्न अभिभावकगण प्रायः पूछते रहते हैं और यह स्वाभाविक होने के साथ ही अनिवार्य भी है। जातक सारावली-दशम भाव का वैशिष्ट्य है, नवांश चक्र द्वारा उपयुक्त व्यवसाय को समेकित करना। नवांश चक्र के अध्ययन के अभाव में किसी भी जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान करना लगभग उसी प्रकार है, जैसे किसी व्यक्ति का चित्र देखकर संबंधित व्याधियों का रेखांकन करना। अस्तु, नवांश चक्र का तलस्पर्शी मर्म तथा ऐसे अनेक विषयों के प्रामाणिक व परिक्षित शोधसूत्र, इस कृति में समाहित हैं जो इसे व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित एक असाधारण कृति के रूप में संतुलित करते हैं
    कृति को विषय के विस्तृत धरातल के आधार पर 19 शोधपरक एवं ज्ञानवर्द्धक अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है। इस कृति के अंतर्गत श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अपने पूर्व 40 वर्षों के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान के पावन प्रांजल पीयूष का अनुसरण किया है। समस्त जिज्ञासु पाठकों एवं ज्योतिष प्रेमियों के लिए जातक सारावली-दशम भाव पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय है जिसमें सन्निहित सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से व्यवसाय पक्ष से परिप्रेक्ष्य भविष्य कथन करने का अपूर्व कौशल और सामर्थ्य प्राप्त होना संभव है

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  • ज्योतिष शास्त्र से भविष्य कथन

    फलित ज्योतिष में एक कुण्डली होती हैं और उसमें बारह भाव, बारह राशियाँ, नौ ग्रह, सत्ताइस नक्षत्र होते हैं और बस उसी आधार पर पूरी एक भाषा है जिसमें सब कुछ पढ़ना है तो यदि विस्तार से भाव, राशि, ग्रह नक्षत्र का ज्ञान है तो ज्योतिष शास्त्र से एक भविष्य कथन आसानी से कर सकते है। तो प्रस्तुत पुस्तक में कुण्डली के भाव, राशि, ग्रह को अत्यधिक विस्तार से समझाने का प्रयास किया गया है। अन्त में मैं उन सभी शास्त्रकारों, विद्वानों तथा अन्य सहयोगियों एवं विभिन्न वाचनालयों की आभारी हूँ, जिनकी सहायता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक रूप से मुझे प्राप्त हुई।

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  • ज्योतिषऔर दांपत्य जीवन

    पुस्तक के आरंभ में भारतीय संस्कृति में विवाह तथा गृहस्थ जीवन पर चर्चा हुई है। उसके बाद विवाह का अर्थ “एक ऐसा संबंध जिसे विशेष सावधानी के साथ बिगड़ने या बिखरने से बचाना ही व्यक्ति का धर्म व सामाजिक दायित्व है” स्पष्ट किया गया है।

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