दसाध्यायी
₹130.00₹150.00
जन्मकुण्डली के आधार पर फलाफल विवेचन करने में ग्रहों के षड्वर्ग तथा षड्वल की विशेष उपयोगिता होती है। वक्री ग्रहों की भी षड्बल में विशेष उपयोगिता है। पुस्तक के प्रथम आठ अध्यायों में विद्वान लेखक ने वृद्धयवन (मीनराज), कल्याणवर्मा, वाराहमिहिर, मानसागरी, पराशर, वैद्यनाथ आदि के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करके अपने उपयोगी विचार दिये हैं अध्याय में वक्री ग्रहों के सम्बन्ध में जो विवेचना प्रस्तुत है अथवा नवम अध्याय में भाव-भावेश के सन्द श्री गई है वह एक नवीनतम शोध होने के साथ ही साथ पाठकों के लिये लाभदायक मार्गदर्शक भी में वर्णित रत्नों की उपयोगिता उपचारीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह एक अत्यन्त
जन्मकुण्डली के आधार पर फलाफल विवेचन करने में ग्रहों के षड्वर्ग तथा षड्वल की विशेष उपयोगिता होती है। वक्री ग्रहों की भी षड्बल में विशेष उपयोगिता है। पुस्तक के प्रथम आठ अध्यायों में विद्वान लेखक ने वृद्धयवन (मीनराज), कल्याणवर्मा, वाराहमिहिर, मानसागरी, पराशर, वैद्यनाथ आदि के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करके अपने उपयोगी विचार दिये हैं अध्याय में वक्री ग्रहों के सम्बन्ध में जो विवेचना प्रस्तुत है अथवा नवम अध्याय में भाव-भावेश के सन्द श्री गई है वह एक नवीनतम शोध होने के साथ ही साथ पाठकों के लिये लाभदायक मार्गदर्शक भी में वर्णित रत्नों की उपयोगिता उपचारीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कुल मिलाकर यह एक अत्यन्त
| Category: | Alpha |
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मंत्र मंदाकिनी
₹320.00मंत्र मंदाकिनी में समस्त सामान्य समस्याओं के सुगम समाधान का शास्त्रसंगत उल्लेख किया गया है जिसमें शताधिक मंत्रों में से, स्वयं के लिए अनुकूल मंत्र चयन की दुष्कर प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। प्रत्येक अभीष्ट की संसिद्धि हेतु पूर्ण परिहार प्रदान करने हेतु पृथक् पृथक् परामर्श प्रपत्र का प्रबल पथ मंत्र मंदाकिनी में प्रस्तुत किया गया है। ये सभी परिहार, अनुष्ठान अथवा प्रयोग दीर्घकाल से लेखकद्वय द्वारा परीक्षित हैं तथा सहस्राधिक अवसरों पर अभिशंसित, प्रशंसित और चर्चित हुए हैं जिनसे प्राप्त परिणाम के प्रमाण और परिमाण से साधक व पाठकगण निरन्तर प्रेरित, आनन्दित, आह्ह्लादित, हर्षित और उल्लसित हुए हैं।
मंदाकिनी मंत्र के 19 अध्यायों में विभाजित है जिसमें मंत्र शक्ति के अद्भुत प्रभाव का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है-1. मंत्रः वैज्ञानिक व्याख्या; 2. मंत्र विज्ञानः विविध विभाग, 3. ग्रह शांतिः 4. विवाहसंबंधी समस्याएं एवं समाधान; 5. संतति सुखः परिहार परिज्ञान; 6. निकृष्ट ग्रह योग कृत निषेध शमन, 7. प्रचुर धनप्राप्ति अनुभूत साधनाएँ: 8. शत्रु शमन तथा प्रतिद्वंदी शमन; 9. व्याधि शमनः स्वास्थ्यवर्धन; 10. परीक्षा और प्रतियोगिता में सर्वोच्च सफलता; 11. सभी दोस्तों को निर्मूल मन की संस्तुति; 12. इलेक्ट्रोइलेक्ट्रॉनिक वृत्तान्तः 13. विस्तृत व्रतविधान; 14. दान अनुष्ठानः श्रेष्ठ परिहार प्रार्थनाएँ: 15. श्रीदुर्गासप्तशती सन्निहित उपासनाएँ: अभीष्ट संसिद्धि साधनाएँ: 16. अन्यान्य प्रार्थनाओं के समाधान जिज्ञासा एवं सुगमता साकेतिक साधनाएँ: 17. सुखद दाम्पत्य उपासना उपासना साकेतिक साधनाएँ: 18. मानस मंत्र साधना; 19. षट्कर्म प्रयोग। ज्योतिष एवं मंत्र विज्ञान के गूढ़ रहस्य सभी ज्योतिष प्रेमी एवं मंत्र अध्येताओं के अध्ययन एवं अनुसंधान के निमित्त मंत्र मंदाकिनी एक अमूल्य निधि है।
₹400.00 -
गीता मंत्र गंगोत्री
₹290.00श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियों के लिए प्रार्थना पथ नहीं, बल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमद्भगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायः अधिकांश भक्तजन, साधक, आराधक, पाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एवं उसकी व्याख्या, गीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप में सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामों से शीर्षांकित किया गया है:
₹350.00 -
परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान
₹350.00समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
* परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।₹430.00 -
परिणय निर्णयमंगली दोषः सन्निहित यथार्थ
₹320.00वर-वधू के जन्मांगों में विद्यमान मंगली दोष के संतुलन की अनिवार्यता के साथ-साथ आवश्यकता है, मंगली दोष के वास्तविक रहस्य के तलस्पर्शी संज्ञान और अनुभव की, जिसे मंगली दोषः सन्निहित यथार्थ नामक इस कृति में व्यावहारिक जन्मांगों तथा शास्त्रीय सूत्रों और लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनवरत अनुसंधान और अभ्यास के आधार पर नीर-क्षीर विवेचनोपरान्त प्रस्तुत किया गया है।
जन्मांग में मंगल ग्रह की कतिपय विशिष्ट स्थितियाँ ही वैवाहिक सुख में प्रायः विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं जिसे मंगली दोष से रेखांकित किया जाता है। मंगली दोष के सन्निहित यथार्थ से प्रायः अनभिज्ञ ज्योतिष प्रेमी एवं तथाकथित ज्योतिर्विद वर-वधू के जन्मांगों में, मंगली दोष का मिलान करते समय भारी भूल कर बैठते हैं, जिसका वास्तविक कारण विषय की अज्ञानता एवं अल्पज्ञता ही होता है।
वस्तुतः मंगल ग्रह ही वैवाहिक विच्छेद, विसंगतियों, विषमताओं व वैधव्य के अतिरिक्त विवाह के विघटन की विविध अप्रिय परिस्थितियों का सूत्रपात करता है और मंगल ही अनाचार, दुराचार, अत्याचार, बलात्कार और हिंसा का हेतु निर्मित करने वाला ग्रह है परन्तु अनिवार्यता है मंगल ग्रह के प्रभाव के गहन अध्ययन तथा विश्लेषण के उपरान्त उसके वास्तविक परिणाम के उपयुक्त और सटीक आकलन की।
यह कृति अग्रांकित 11 अध्यायों में विभाजित है- 1. मंगल ग्रह ज्ञातव्य तथ्य 2. मंगली दोष: सन्निहित यथार्थ 3. लग्नगत मंगल का फल 4. द्वितीय भावगत मंगल का फल 5. चतुर्थ भावगत मंगल का फल 6. महिलाओं हेतु पंचम भावगत मंगल का फल 7. सप्तम भावगत मंगल का फल 8. अष्टम भावगत मंगल का फल 9. द्वादश भावगत मंगल का फल 10. असंतुलित मंगली दोष के आश्चर्यजनक परिणाम, तथा 11. मंगल ग्रहः दशा दिग्दर्शन।
मंगल ग्रह व मंगली दोष के ज्ञातव्य तथ्य के विषय में अन्यान्य सत्य तथा मिथ्या विचारों की व्याख्या, विश्लेषण व विवेचन, असंतुलित मंगलीदोष के आश्चर्यजनक परिणाम एवं मंगल ग्रह: दशा दिग्दर्शन आदि की शोधपरक च्याख्या, कृति का वैशिष्ट्य है। विविध लग्नों के लिए मंगली दोष का परिवर्तित होता हुआ स्वरूप ही शोध संज्ञान और अनुसंधान है जो वर्तमान युग की अनिवार्यता है। जिज्ञासुओं व ज्योतिष प्रेमियों की अभिलाषा, आकांक्षा और अपेक्षा की सारगर्भिता एवं सत्यता ही उनके अखंडित विश्वास का सेतु निर्मित करती है। रचनाकारद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व टी.पी. त्रिवेदी ने बारहों लग्नों के लिए, विविध प्रकार के मंगली दोष का मर्म और अनुसंधान प्रस्तुत करके, दीर्घकाल से प्रतीक्षित प्रबुद्ध पाठकों के आग्रह को साकार आकार प्रदान किया है।
₹400.00 -
व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान
₹320.00कलिकाल के वर्तमान चक्र के विकृत एवं विरूपित स्वरूप में निमग्न होते जा रहे समाज के मध्य व्रत संपादन की लोकप्रियता, उपयोगिता तथा उसके विलक्षण प्रभाव की महिमा को ‘व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति के मधुरिम मधुवन के महकते प्रांगण में संबंधित जातकों के सम्मुख प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। यह कृति नौ पृथक पृथक अध्यायों में व्याख्यायित है जिन्हें अग्रांकित शीर्षकों से स्थिर किया गया है-
1. मंत्र : सत्यान्तिक विश्लेषण, 2. वैवाहिक विलम्ब एवं ग्रहयोग : ज्योतिषीय
विश्लेषण, 3. वैवाहिक विलम्ब कुछ अनुभूत मंत्र, स्तोत्र एवं प्रयोग, 4. व्रत परिज्ञानः प्रविधि एवं प्रावधान, 5. वैवाहिक समस्याओं का सुगम समाधान व्रत विधान, 6. विशिष्ट व्रत का अनुसरण : वैवाहिक विसंगतियाँ, वैधव्य, पार्थक्य का शमन, 7. संतति सुगम : परिहार प्रावधान, 8. सर्वश्रेष्ठ अनुष्ठान व्रत विधान तथा 9. प्रमुख पुत्र सुगम व्रत एवं विधान
विविध व्रत विधान, विवाह एवं सन्तान से संबंधित अनेक सुगम समाधान इस कृति में अनुमान किए गए हैं। प्रायः व्रत और उपवास की भिन्नता से अनभिज्ञ जन-सामान्य व्रत को अनुष्ठान के रूप में उपयोग करने तथा उसके चमत्कृत कर देने वाले प्रभाव से भिन्न है। इस वास्तविकता की सम्यक् व्याख्या ‘व्रत विधान विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति में आविष्ठित है। वैवाहिक विलम्ब एवं विघटन का सुगम समाधान है- मंत्रजप, स्तोत्र पाठ, व्रत और दान। इसी प्रकार से संततिहीनता को संतति सुख में रूपांतरित करने हेतु विविध विधान मंत्र प्रयोग तथा अनेक व्रत और उनका अद्भुत एवं अनुभूत व्यावहारिक पक्ष इस कृति में अनुमान किया गया है
वैवाहिक विलम्ब, विघटन, संततिहीनता अथवा शाप से ग्रसित अनेक ऐसे जातक हैं जो संस्कृत के मंत्र, स्तोत्र तथा अनुष्ठान का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं हैं तथा न ही वह योग्य आचार्यों द्वारा संबंधित अनुष्ठानों का प्रतिपादन कराने में सक्षम हैं। विवाह एवं सन्तान सुख हेतु आतुर एवं प्रतीक्षारत जातकों के लिए सर्वोच्च सुगम मार्ग है, उपयुक्त व्रत का चयन तथा विधि विधान सहित उसका अनुकरण, आरंभ एवं उद्यापन आदि, जो इस कृति का सर्वस्व है।
इस कृति में अनेक पुत्रप्रदाता व्रत एवं संतति सुख की कामना की संसिद्धि हेतु विविध व्रत एवं विधान दार्शनिक किए गए हैं, जो अद्भुत और अनुभूत हैं जिनमें से कात्यायनी व्रत, पुंसवन व्रत, पयोव्रत, श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत, षष्ठी देवी व्रत आदि प्रमुख हैं तथा वैवाहिक विलम्ब के समाधान हेतु विविध वारों से संबंधित व्रतविधान और वैवाहिक संकट एवं प्रशासन के परिहार हेतु मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि के साथ-साथ उसके विधान भी इस कृति में सत्रिहित हैं
यह कृति अपनी सारगर्भिता, सार्वभौमिकता तथा उपयोगिता के कारण समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए अत्यन्त हितकर और लाभप्रद सिद्ध होगी, इसमें किंचित सन्देह नहीं।₹350.00 -
शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
योग पारिजातभाग्य योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
शनि संहिता
शनि शक्ति के संत्रास तथा त्रासदी से आतंकित, व्यथित, पीड़ित, भयाक्रान्त, मानव की विपुल वेदना, विपत्ति, विकृति, विनाश, व्याधि, विषमता, विघटन, विसंगतिपूर्ण विपरीत स्थितियों, परिस्थितियों के अवांछित, अनापेक्षित, अनावश्यक सम्भावनाओं के विषैले दंश और कैटीले पथ की पीड़ा प्रदायक चुभन के अन्तरंग आभास के अवलोकन और अवगाहन करने के उपरान्त पापाक्रान्त शनि की साढ़ेसाती, अष्टम शनि और शनि की लघु कल्याणी वैया आदि से संतप्त जीवन को विमुक्त करने के निमित्त ‘शनि संहिता’ का प्रसादामृत प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें सन्निहित, अनुभूत, अद्भुत, अमोघ एवं दुर्लभ साधना परिहार परिज्ञान, सम्पादन विधान एवं सुगम साधना प्रावधान का अवलोकन, अध्ययन, अनुसरण और अभ्यास शनि संतप्त जातक-जातिकाओं के जीवन को अलौकिक आलोक से आनन्दित और आहह्लादित करने हेतु, नैमित्तिक साधनाओं का परम पावन, प्रांजल पीयूष है।
‘शनि संहिता’ उन सशक्त, शाश्वत, संकल्पों का सुरभित सेतु है, जिसकी संरचना, शनि ग्रह सन्दर्भित परिहार परिज्ञान पर प्रमाणित शास्त्रसंगत सघन सामग्री के अभाव में अंकुरित और प्रस्फुटित हुई है। ‘शनि संहिता’ अभीष्ट संसिद्धि के संसुप्त संज्ञान की जागृति का अभिनव अनुसंधान है जिसमें शनि सन्दर्भित अन्यान्य अरिष्टों, अनिष्टों, अवरोधों, अप्रत्याशित आतंक, विविध व्यथाओं, विपत्ति प्रदायक व्याधियों से आक्रान्त जातक-जातिकाओं के दुर्दमनीय दारूण दुःखों और दुर्गति का शास्त्रानुमोदित सुगम समाधान तथा अनुकूल विधान, अखण्डित आस्थाओं को अविचलित आधार प्रदान कर देने वाले परिहार परिज्ञान, दुर्लभ स्तोत्र तथा साधनाएँ, मंत्र प्रयोग और साधना विधान, शनि दान : दिव्य अनुष्ठान के अतिरिक्त शताधिक सुगम सांकेतिक साधनाएँ और उनके प्रतिपादन के विधिविधान आदि अट्ठाइस अध्यायों में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में सुव्यवस्थित किए गए हैं।
‘शनि संहिता’ के परिशिष्ट में ‘दस महाविद्या स्तोत्र’, ‘कर्मज व्याधिनाशन ऋग्वेदीय मंत्र’, ‘सुदर्शन चक्र मंत्र साधना’ और ‘मृत्युंजय मंत्र: विभिन्न प्रकार’ के समिचीन आधिवांट ने इस कृति की व्याख्या और महत्ता में वृद्धि की है। ‘शनि संहिता’ के लिए सभी वैज्ञानिक ज्योतिष प्रेमियों के लिए विद्वान, संग्रहकर्ता और ज्योतिषी शोध प्रबंध हैं।










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