
अनिष्ट ग्रह उपचार
सभी द्वादश भावों में शुभ व अशुभ प्रभाव के योग दिए हैं। इसके बाद उपचार संबंधी मंत्र, स्तोत्र व कवच दिए हैं। पुस्तक का आरंभिक उपाय के उपयोग दृष्टिने वाले पाँच उदाहरणों से हुआ है। इसके बाद ग्रहों पर नक्षत्रों का प्रभाव तथा उपचार के सिद्धान्त पर चर्चा हुई है। अध्याय 4 में अनिष्ट ग्रह गोचर में वैदिक मंत्र का उपयोग तथा अध्याय 5 में कुछ सरल व सटीक उपचारों पर चर्चा हुई है
| Category: | Alpha |
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व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान
₹320.00कलिकाल के वर्तमान चक्र के विकृत एवं विरूपित स्वरूप में निमग्न होते जा रहे समाज के मध्य व्रत संपादन की लोकप्रियता, उपयोगिता तथा उसके विलक्षण प्रभाव की महिमा को ‘व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति के मधुरिम मधुवन के महकते प्रांगण में संबंधित जातकों के सम्मुख प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। यह कृति नौ पृथक पृथक अध्यायों में व्याख्यायित है जिन्हें अग्रांकित शीर्षकों से स्थिर किया गया है-
1. मंत्र : सत्यान्तिक विश्लेषण, 2. वैवाहिक विलम्ब एवं ग्रहयोग : ज्योतिषीय
विश्लेषण, 3. वैवाहिक विलम्ब कुछ अनुभूत मंत्र, स्तोत्र एवं प्रयोग, 4. व्रत परिज्ञानः प्रविधि एवं प्रावधान, 5. वैवाहिक समस्याओं का सुगम समाधान व्रत विधान, 6. विशिष्ट व्रत का अनुसरण : वैवाहिक विसंगतियाँ, वैधव्य, पार्थक्य का शमन, 7. संतति सुगम : परिहार प्रावधान, 8. सर्वश्रेष्ठ अनुष्ठान व्रत विधान तथा 9. प्रमुख पुत्र सुगम व्रत एवं विधान
विविध व्रत विधान, विवाह एवं सन्तान से संबंधित अनेक सुगम समाधान इस कृति में अनुमान किए गए हैं। प्रायः व्रत और उपवास की भिन्नता से अनभिज्ञ जन-सामान्य व्रत को अनुष्ठान के रूप में उपयोग करने तथा उसके चमत्कृत कर देने वाले प्रभाव से भिन्न है। इस वास्तविकता की सम्यक् व्याख्या ‘व्रत विधान विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति में आविष्ठित है। वैवाहिक विलम्ब एवं विघटन का सुगम समाधान है- मंत्रजप, स्तोत्र पाठ, व्रत और दान। इसी प्रकार से संततिहीनता को संतति सुख में रूपांतरित करने हेतु विविध विधान मंत्र प्रयोग तथा अनेक व्रत और उनका अद्भुत एवं अनुभूत व्यावहारिक पक्ष इस कृति में अनुमान किया गया है
वैवाहिक विलम्ब, विघटन, संततिहीनता अथवा शाप से ग्रसित अनेक ऐसे जातक हैं जो संस्कृत के मंत्र, स्तोत्र तथा अनुष्ठान का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं हैं तथा न ही वह योग्य आचार्यों द्वारा संबंधित अनुष्ठानों का प्रतिपादन कराने में सक्षम हैं। विवाह एवं सन्तान सुख हेतु आतुर एवं प्रतीक्षारत जातकों के लिए सर्वोच्च सुगम मार्ग है, उपयुक्त व्रत का चयन तथा विधि विधान सहित उसका अनुकरण, आरंभ एवं उद्यापन आदि, जो इस कृति का सर्वस्व है।
इस कृति में अनेक पुत्रप्रदाता व्रत एवं संतति सुख की कामना की संसिद्धि हेतु विविध व्रत एवं विधान दार्शनिक किए गए हैं, जो अद्भुत और अनुभूत हैं जिनमें से कात्यायनी व्रत, पुंसवन व्रत, पयोव्रत, श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत, षष्ठी देवी व्रत आदि प्रमुख हैं तथा वैवाहिक विलम्ब के समाधान हेतु विविध वारों से संबंधित व्रतविधान और वैवाहिक संकट एवं प्रशासन के परिहार हेतु मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि के साथ-साथ उसके विधान भी इस कृति में सत्रिहित हैं
यह कृति अपनी सारगर्भिता, सार्वभौमिकता तथा उपयोगिता के कारण समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए अत्यन्त हितकर और लाभप्रद सिद्ध होगी, इसमें किंचित सन्देह नहीं।₹350.00 -
योग पारिजातराजयोग
₹360.00योग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
समृद्धि सूत्रVol 2
समृद्धि सूत्र’ ज्योतिष की मात्र सामान्य संरचना न होकर समृद्धि से सम्बन्धित प्रथम शास्त्रानुमोदित विस्तृत शोध प्रबन्ध है; कालांतर में जिसकी प्रशंसा, प्रतिष्ठा, परिचर्चा तथा गणना ज्योतिष के श्रेष्ठ शास्त्रों में सम्मिलित की जायेगी। समृद्धि से सम्बन्धित यह कृति स्वर्णिम शोध प्रस्तुत करने वाला माता लक्ष्मी का प्रसादामृत है जिसमें समृद्धि से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान सन्निहित है। ऐसे शोध प्रबन्ध की अनिवार्यता ने, जिसमें जन्मांग में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोगों के अध्ययन, अनुसंधान और अनुभूति के आधार पर जातक की समृद्धि एवं सम्पन्नता की परिसीमा का सशक्त संज्ञान एवं सटीक अनुमान उपलब्ध हो सके तथा समृद्धि पथ के आरोह अवरोह, उन्नति अवनति, स्थिरता अथवा अस्थिरता के पूर्णतः स्पष्ट एवं सम्यक् संज्ञान का सारस्वत, शाश्वत सूत्र स्थापित हो सके, उसके निमित्त शास्त्रानुकूल वेदविहित समग्र ग्रन्थगर्भित सूत्रों का सतत्, सतर्क, सघन, सबल अध्ययन और अनुसंधान का अनुकरण करके, उस विशुद्ध प्रतिष्ठित, प्रामाणिक, प्रशंसित प्राञ्जल प्रारूप को ‘समृद्धि सूत्र’ से शीर्षांकित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध जिज्ञासुओं, शोध छोत्रों तथा शास्त्रान्वेषियों के संसुप्त संज्ञान की जागृति हेतु अभिनव अभियान के पावन पथ के सुदृढ़ एवं सुरुचिपूर्ण सेतु का निर्माण सम्पन्न किया गया है, जो अनेक वर्षों की सघन साधना के उपरान्त अब आपके कर कमलों में सुशोभित है।
‘समृद्धि सूत्र’ का आधार स्तम्भ ज्योतिष के सारगर्भित शास्त्र हैं जिनमें ऋषि-महर्षि ने अपनी अन्तर्दृष्टि को एकाग्र करके, मानव के अर्थ कल्याण को ध्यान में रखते हुए धन, वैभव, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संपूर्ण स्वर्णिम सिद्धांत सूत्र के स्पष्ट वर्णन की है तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वृहत्पादक, मानसागरी, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, पूर्वकलामृत, ज्योतिष पारिजात, सारावली, ज्योतिषमार्ग, होरारत्न, जातितत्त्वम्, ज्योतिषतत्त्वम्, जातकाभरणम्, जातकालंकार, सर्वार्थ चिंतामणि, खेटकौतुकम्, वृद्धयवनजातक, जातक भूषणम्, होरासार, भृगुसूत्र, भावकौतुहलम्, जातकसारदीप, शम्भुहोराशास्त्र, फलमार्तण्ड, सत्यजातकम्, वृहद्द्योतिषसार, भावार्थ रत्नाकर तथा वृहदरत्नाकर आदि की संरचना। सभी ग्रंथों में धन, ऐश्वर्य, वैभव, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से लेकर सन्दर्भित मंदिरों तक 1100 टुकड़े, नौ खंड और दो खंडों में भंडारित और प्राचीन बताकर उनके दर्शन एवं प्रखर सुरुचिपूर्ण विवेचन, व्याख्या, विश्लेषण एवं विभाजन का वर्णन किया गया है।
‘समृद्धि सूत्र’ की व्याख्या जिन नौ खण्डों में की गई है, वे अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित हैं:- 1. लाभ भाव (एकादश भाव) 2. धन भाव (द्वितीय भाव) 3. भाग्य भाव (नवम भाव) 4. व्यय भाव (द्वादश भाव) 5. पूर्व पुण्य भाव (पंचम भाव) 6. धनयोग 7. निर्धन योग 8. सुख समृद्धि से संदर्भित शोध साधना एवं सम्बन्धित जन्मांगों की विस्तृत व्याख्या 9. धन, समृद्धि एवं सम्पन्नता से सम्बन्धित समय संज्ञान की प्रविधि।
समृद्धिशाली अथवा विपन्न होने के सन्दर्भ में सहस्राधिक सूत्रों को स्मरण रखना सामान्य पाठक के लिए संभव नहीं है। ‘समृद्धि सूत्र’ में अर्थवान् अथवा अर्थहीन बनने से सम्बन्धित विभिन्न ग्रन्थों में व्याख्यायित सहस्त्रों सूत्रों के विकल्प के रूप में एक शोध सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसके अनवरत अगाध अनुसंधान में लेखकद्वय का तीस वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हुआ। यह शोध सिद्धान्त, ‘समृद्धि सूत्र’ का सर्वस्व है। -
ज्योतिष विज्ञानसिद्धांत शिरोमणि
₹240.00जातक सारावली-दशम भाव आकाशीय पिंडों के अध्ययन एवं ज्योतिष शास्त्र के शोध सिद्धांतों से आलोकित व्यवसाय पक्ष का प्रज्वलित प्रकाश पुंज है। व्यवसाय और कर्म के अधिष्ठाता महाप्रभु की परमपावन पुनीत पदरज का मंगल तिलक है जातक सारावली-दशम भाव। व्यवसाय अर्थात् जीविकोपार्जन का माध्यम, समस्त मानव जाति की गति, मति, प्रगति, उन्नति की सम्यक् स्थिति का सक्रिय अभिनव अंग है। व्यवसाय का गौरव ही नर-नारियों की प्रभुता व सत्ता, अधिकार व कर्तव्य, कर्म व दायित्व की त्रिवेणी है और यही जीवन की विविध व्यवस्थाओं और पारिस्थितिक से अलंकृत कर्म का ऐसा सिंधु है, जिसमें अनवरत, अनंत, अविरल, निर्मल, कोमल मधु एवं दुग्ध स्तंभ का समायोजन एवं निरंतर प्रवाह होता रहता है। मनोनुकूल व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता होती है। व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन अधिकांश ग्रंथों की प्रामाणिकता संदिग्ध है
किसी कुशल ज्योतिर्विद् से पूछे जाने वाली प्रमुख जिज्ञासाओं में जातक/जातिका के व्यवसाय से संबंधित प्रश्न को समेकित किया जा सकता है। वह नौकरी करेगा या व्यापार में सफलता प्राप्त करेगा, उद्योगपति बनेगा या उद्योग बनकर धनार्जन करेगा। यदि उद्योगपति बनेगा तो किस स्तर का होगा, क्या देश के प्रतिष्ठित और यशस्वी उद्योगपतियों में उसके नाम की गणना होगी या फिर कोई साधारण नौकरी करके मात्र जीवनयापन कर सकेगा। ऐसे कई प्रश्न अभिभावकगण प्रायः पूछते रहते हैं और यह स्वाभाविक होने के साथ ही अनिवार्य भी है। जातक सारावली-दशम भाव का वैशिष्ट्य है, नवांश चक्र द्वारा उपयुक्त व्यवसाय को समेकित करना। नवांश चक्र के अध्ययन के अभाव में किसी भी जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान करना लगभग उसी प्रकार है, जैसे किसी व्यक्ति का चित्र देखकर संबंधित व्याधियों का रेखांकन करना। अस्तु, नवांश चक्र का तलस्पर्शी मर्म तथा ऐसे अनेक विषयों के प्रामाणिक व परिक्षित शोधसूत्र, इस कृति में समाहित हैं जो इसे व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित एक असाधारण कृति के रूप में संतुलित करते हैं
कृति को विषय के विस्तृत धरातल के आधार पर 19 शोधपरक एवं ज्ञानवर्द्धक अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है। इस कृति के अंतर्गत श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अपने पूर्व 40 वर्षों के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान के पावन प्रांजल पीयूष का अनुसरण किया है। समस्त जिज्ञासु पाठकों एवं ज्योतिष प्रेमियों के लिए जातक सारावली-दशम भाव पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय है जिसमें सन्निहित सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से व्यवसाय पक्ष से परिप्रेक्ष्य भविष्य कथन करने का अपूर्व कौशल और सामर्थ्य प्राप्त होना संभव है₹300.00 -
शक्ति कुंज’
₹320.00शक्ति कुंज’ भक्ति भावना का त्रिभुवन मोहन, भव्य भुवन है जो भगवान पराम्बा, जगतजननी, जगदम्बा के परम पावन पदपंकज के प्रसादामृत से परिपूर्ण प्रेरणा प्रार्थना प्रभूथ प्रार्थना पथ एवं प्रांजल प्राशीष है। ‘शक्ति’ भाव और भक्ति, साधना और शक्ति, प्रार्थना और आराधना से पवित्र प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र से सुशोभित भव्य त्रिभुवन मोहन, दिव्य सौन्दर्य से आश्रम, सुगठित, संयोजन, सु साधन, अविद्या, सारस्वत, शाश्वत साधना का स्वर्णिम शक्ति सेतु है, जो स्तुति मणिमण्डित स्तम्भों पर आधारित है, सात सौ रत्नजड़ित स्वर्ण सोपानों से निर्मित है, जिसमें आदिशक्ति, महाशक्ति, पराम्बा, भगवान, कुव्वरी, आदि शामिल हैं। जगतजननी के परम पावन पवित्र प्रांजल चरित्र का दर्शन, विपुल अनुकंपा के निमित्त सिद्धांत सु नियोजित आक्षेप के साथ जाने वाले, विशिष्ट अनुष्ठान का सम्यक विश्लेषण, विवेचन का आख्यान, व्याख्यान विधि-विधान सहित शास्त्र आविष्ठित है।
‘शक्ति कुञ्ज’ 16 अध्यायों में विवेचित एवं व्याख्यायित है जिसे मोक्ष-प्रदायिनी श्री दुर्गासप्तशती के प्रसाद-प्रबन्ध की विस्तृत के साथ-साथ नैमित्तिक साधनाओं के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित किया गया है। श्री दुर्गासप्तशती भू-लोकवासियों की मनोकामनाओं एवं सम्यक् अभिलाषाओं की संपूर्ति एवं संसिद्धि हेतु माता जगदम्बा का अनुपम वरदान है, जो मानव समाज को प्रसादामृत रूप उपलब्ध है।
*भक्ति पुंज: शक्ति कुंज-श्री दुर्गासप्तशती शक्ति रहस्य शक्ति साधनाः संस्कार अनुष्ठान दुर्गाभुवन कामनापरक श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान अनुष्ठान अनुष्ठान और नवार्ण मंत्र एक पूजन शतचंडी एवं दुर्गापाठ विधान श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान-अष्ट सिद्धि उपदेश श्री दुर्गासप्तशती : व्यापक प्रवचन सप्तशती स्थित प्रसिद्ध सम्पुटित मंत्र अन्य मंत्रों की संसिद्धि कथा श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप साधना के सामान्य सूत्र श्री देव्यथर्वशीर्ष और महत्वपूर्ण चंडिका मंगलमंत्र का प्रयोग संपूर्ण मंत्रों की संसिद्धि के लिए ‘सिद्धकुंजिका स्तोत्र’ और ‘बीसा यंत्र’ प्रयोग शक्ति साधना: कतिपय चमत्कार कर देने वालेअंतरंग आभास।
इन अतिरिक्त अन्यान्य प्रस्तावों की संसिद्धि के लिए श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप विधान, ‘शक्ति कुंज’ की दुर्लभ वैशिष्ट्य है जिसमें व्याहतों से संयुक्त संपुट मंत्रों का जप विधान, विनियोग, संख्या और प्रविधि आदि सिद्धांत शामिल हैं।
श्री दुर्गासप्तशती आस्तिकों की आस्था का ललाट है। माता दुर्गा के अनुपम अनुराग एवं शक्ति साधना की सौरभ सुधा-धारा ‘शक्ति कुञ्ज’ में अविरल गति से प्रवाहित, प्रसारित हो रही है। भक्ति भावना के भव्य भुवन में त्रिभुवन मोहिनी, महाशक्ति पराम्बा की अवर्णनीय अनुरागपूर्ण आस्था, आराधना, अर्चना, अभ्यर्थना के स्वर्णिम संकल्प का हीरक हस्ताक्षर है- ‘शक्ति कुञ्ज’, जिसका पठन और पारायण शक्ति के भक्तों, साधकों, आराधकों, उपासकों तथा जिज्ञासुओं हेतु अपरिहार्य है।₹400.00 -
चद्र दशा फलदीपिका
₹400.00चन्द्रमा अनादि काल से सौन्दर्य का प्रतीक स्वीकारा गया है। चन्द्रमा के दर्शन मात्र से जीवन की अनेक क्लिष्ट स्थितियों के समाधान का पथ प्रशस्त होता है। दर्शन करने में चन्द्रमा जितना निर्मल कोमल और स्वच्छ प्रतीत होता है, वास्तव में देह उतना ही जटिल है। चन्द्रमा के महत्व को समझना सुगम है परंतु उसके वास्तविक फलाफल का सटीक विवेचन अधिक दुःसाध्य है। पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करने वाला चन्द्रमा, पृथ्वीवासियों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है इसीलिए चन्द्रमा को जन्मांग का प्राप्ण घोषित किया गया है। चन्द्रमा का बलाबल और स्थिति ही जन्मांग की प्रबलता या निर्बलता का आधार है। चन्द्रमा की विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित अनुकूल-प्रतिकूल फलाफल का तलस्पर्शी अध्ययन और उसके क्रियान्वयन हेतु अनेक शोधपरक सिद्धान्तों तथा विशिष्ट सूत्रों का उपयुक्त समायोजन चन्द्र दशाफल दीपिका में किया गया है ताकि चन्द्रमा की दशान्तर्दशा के अन्तर्गत होने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं का सटीक आकलन किया जाना संभव हो सके।
इस कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है जिनके अध्ययन से चन्द्रमा की महादशा व अंतर्दशा के विषय में सम्यक् संज्ञान प्राप्त करके सटीक भविष्यकथन किया जा सकता है: 1. ग्रहस्थिति एवं फलकथन, 2. भावगत दशाफल विवेचन, 3. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रग्रह का महत्व, 4. विविध भावगत चन्द्रमा की दशा का फल, 5. बारह जन्म राशियों का फल. 6. बारह राशियों में चन्द्रमा का फल, 7. लग्न फल, 8. विविध लग्नों के लिए भावगत चन्द्रमा का फल. 9. चन्द्रमा की महादशा का संभावित फलाफल, 10. चन्द्रमा की महादशा का फल, 11. चन्द्रमा की महादशा के मध्य अंतर्दशाओं का फल, तथा 12. चन्द्र पीड़ा परिहार विधान।
यह एक व्यावहारिक और ज्योतिष शास्त्र पर केन्द्रित शताधिक शोध प्रबन्धों के रचनाकार ज्योतिर्विदों का प्रथम प्रयास है कि विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित प्रत्येक ग्रह की महादशा और अंतर्दशाओं का इतना वृहद, संपुष्ट और अनुभूत फलकथन दशाफल दीपिका की श्रृंखला के अंतर्गत किया जाना संभव हो सका। सर्वविदित है-कि विश्व में सबसे अधिक उपयोग विंशोत्तरी दशाओं का ही होता है इसलिए इस दशाफल दीपिका श्रृंखला को विंशोत्तरी दशाओं तक ही सीमित रखा गया है। विश्वास है कि विंशोत्तरी दशाफल से सम्बन्धित कृति के अध्ययन की आंकाक्षा व समस्त दशाओं की संरचना के परिणाम से सम्बन्धित जिज्ञासा का सशक्त सारभूत व सारगर्भित समाधान है चन्द्र दशाफल दीपिका जो प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रो व ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹500.00 -
योग पारिजातधन योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
समृद्धि सूत्रVol 1
₹400.00समृद्धि सूत्र’ ज्योतिष की मात्र सामान्य संरचना न होकर समृद्धि से सम्बन्धित प्रथम शास्त्रानुमोदित विस्तृत शोध प्रबन्ध है; कालांतर में जिसकी प्रशंसा, प्रतिष्ठा, परिचर्चा तथा गणना ज्योतिष के श्रेष्ठ शास्त्रों में सम्मिलित की जायेगी। समृद्धि से सम्बन्धित यह कृति स्वर्णिम शोध प्रस्तुत करने वाला माता लक्ष्मी का प्रसादामृत है जिसमें समृद्धि से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान सन्निहित है। ऐसे शोध प्रबन्ध की अनिवार्यता ने, जिसमें जन्मांग में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोगों के अध्ययन, अनुसंधान और अनुभूति के आधार पर जातक की समृद्धि एवं सम्पन्नता की परिसीमा का सशक्त संज्ञान एवं सटीक अनुमान उपलब्ध हो सके तथा समृद्धि पथ के आरोह अवरोह, उन्नति अवनति, स्थिरता अथवा अस्थिरता के पूर्णतः स्पष्ट एवं सम्यक् संज्ञान का सारस्वत, शाश्वत सूत्र स्थापित हो सके, उसके निमित्त शास्त्रानुकूल वेदविहित समग्र ग्रन्थगर्भित सूत्रों का सतत्, सतर्क, सघन, सबल अध्ययन और अनुसंधान का अनुकरण करके, उस विशुद्ध प्रतिष्ठित, प्रामाणिक, प्रशंसित प्राञ्जल प्रारूप को ‘समृद्धि सूत्र’ से शीर्षांकित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध जिज्ञासुओं, शोध छोत्रों तथा शास्त्रान्वेषियों के संसुप्त संज्ञान की जागृति हेतु अभिनव अभियान के पावन पथ के सुदृढ़ एवं सुरुचिपूर्ण सेतु का निर्माण सम्पन्न किया गया है, जो अनेक वर्षों की सघन साधना के उपरान्त अब आपके कर कमलों में सुशोभित है।
‘समृद्धि सूत्र’ का आधार स्तम्भ ज्योतिष के सारगर्भित शास्त्र हैं जिनमें ऋषि-महर्षि ने अपनी अन्तर्दृष्टि को एकाग्र करके, मानव के अर्थ कल्याण को ध्यान में रखते हुए धन, वैभव, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संपूर्ण स्वर्णिम सिद्धांत सूत्र के स्पष्ट वर्णन की है तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वृहत्पादक, मानसागरी, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, पूर्वकलामृत, ज्योतिष पारिजात, सारावली, ज्योतिषमार्ग, होरारत्न, जातितत्त्वम्, ज्योतिषतत्त्वम्, जातकाभरणम्, जातकालंकार, सर्वार्थ चिंतामणि, खेटकौतुकम्, वृद्धयवनजातक, जातक भूषणम्, होरासार, भृगुसूत्र, भावकौतुहलम्, जातकसारदीप, शम्भुहोराशास्त्र, फलमार्तण्ड, सत्यजातकम्, वृहद्द्योतिषसार, भावार्थ रत्नाकर तथा वृहदरत्नाकर आदि की संरचना। सभी ग्रंथों में धन, ऐश्वर्य, वैभव, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से लेकर सन्दर्भित मंदिरों तक 1100 टुकड़े, नौ खंड और दो खंडों में भंडारित और प्राचीन बताकर उनके दर्शन एवं प्रखर सुरुचिपूर्ण विवेचन, व्याख्या, विश्लेषण एवं विभाजन का वर्णन किया गया है।
‘समृद्धि सूत्र’ की व्याख्या जिन नौ खण्डों में की गई है, वे अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित हैं:- 1. लाभ भाव (एकादश भाव) 2. धन भाव (द्वितीय भाव) 3. भाग्य भाव (नवम भाव) 4. व्यय भाव (द्वादश भाव) 5. पूर्व पुण्य भाव (पंचम भाव) 6. धनयोग 7. निर्धन योग 8. सुख समृद्धि से संदर्भित शोध साधना एवं सम्बन्धित जन्मांगों की विस्तृत व्याख्या 9. धन, समृद्धि एवं सम्पन्नता से सम्बन्धित समय संज्ञान की प्रविधि।
समृद्धिशाली अथवा विपन्न होने के सन्दर्भ में सहस्राधिक सूत्रों को स्मरण रखना सामान्य पाठक के लिए संभव नहीं है। ‘समृद्धि सूत्र’ में अर्थवान् अथवा अर्थहीन बनने से सम्बन्धित विभिन्न ग्रन्थों में व्याख्यायित सहस्त्रों सूत्रों के विकल्प के रूप में एक शोध सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसके अनवरत अगाध अनुसंधान में लेखकद्वय का तीस वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हुआ। यह शोध सिद्धान्त, ‘समृद्धि सूत्र’ का सर्वस्व है।₹475.00








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