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भावार्थ रत्नाकर
₹160.00नई शताब्दी के आरम्भ में मेरा सम्पर्क ज्योतिष शोध मंडल के सदस्यों से हुआ। बातचीत के दौरान भावार्थ रत्नाकर व उसके महत्व पर भी चर्चा हुई। वर्ष 2006 में लगभग 8 माह तक इस श्रेष्ठ कृति का अध्ययन व अध्यापन चला।
आदरणीय डॉ. बी.वी. रमण ने अंग्रेज़ी में, तो श्री जगन्नाथ भसीन ने हिन्दी में इस ग्रन्थ पर टीका लिखी है। श्री गोपेश कुमार ओझा ने अपनी फलदीपिका में भावार्थ रत्नाकर के योगों₹200.00 -
भृगु नवनीतम्(भृगु सूत्र तथा भृगु संहिता पर आधारित)
₹80.00पुस्तक परिचय
भृगु के नाम पर ऐसी भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही है जिनका भृगुकालीन होना संदेहास्पद है। ‘भृगु-नवनीतम’ तथा ‘भृगु-सूत्रम्’ तथा ‘भृगु-संहितोक्त श्लोको’ को ही सम्मिलित किया है क्योंकि हजारों वर्षों से श्रुति-स्मृति के माध्यम से इन्हीं दोनों का देशव्यापी प्रचार होता रहा है। संस्कृत के सूत्रों तथा श्लोकों की बोधगम्य व्याख्या पाठकों को उल्लसित करेगी। देश-काल-पात्र-परिवर्तन के आलोक में लेखक ने सूत्रों तथा श्लोकों के सन्दर्भ में जो नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है उससे पाठक लाभन्वित होंगे। पुस्तक उपयोगी तथा स्वागत-योग्य है। -
मंगल दशा फलदीपिका
₹450.00अनादिकाल से मंगल ग्रह का रक्ताभ सौन्दर्य नवविवाहित दम्पत्तियों के लिए जिज्ञासा और कौतूहल का परम्परागत स्तम्भ रहा है। विवाह के परिपेक्ष्य में जन्मांग में मंगल की अप्रिय स्थिति वर-वधू के अभिभावकों को प्रकम्पित कर देती है। प्रायः मंगल को एक विध्वंसात्मक ग्रह के रूप में स्वीकार किया जाता है परन्तु मंगल दशाफल दीपिका का निहितार्थ इस आस्था को मिथ्या सिद्ध कर देने हेतु चेतना की जागृति का एक परिश्रमसाध्य अनुष्ठान है। मंगल दशाफल दीपिका में सन्निहित, संकलित, संयोजित सामग्री मंगल की दशान्तर्दशा के फलकथन के सन्दर्भ में अत्यधिक महत्वपूर्ण, उपयोगी, अद्भुत और अनुभूत है। प्रतिकूल मंगल की दशा का अत्यन्त अल्पज्ञता और अज्ञानतापूर्ण संज्ञान, दुर्घटना, कलह, आक्रमण, अपराध, अपहरण, आन्दोलन, अग्निकाण्ड, हिंसा, हत्या, दुर्भिक्ष, अतिऊष्मा, पराजय, सूखा, रक्तविकार, शल्यक्रिया, ट्यूमर, पेप्टिक अल्सर, असंतुलित रक्तचाप, विविध व्याधि, युद्ध आदि के रूप में प्रचलित है जबकि अनुकूल मंगल की स्थिति अन्तरंग आनन्द व प्रेम सम्बन्ध, आत्मीयता, प्रसिद्धि, धनधान्य, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, सम्पदा, समृद्धि, सम्मान, शासन-प्रशासन, सत्ता, राज्य प्राप्ति, अधिकार प्राप्ति एवं विजय, पराक्रम, पदोन्नति, पद-प्रतिष्ठा, प्रगति, उन्नति, साहस, निर्भीकता, भूमि, भूखण्ड, भवन के अतिरिक्त हर्षोल्लास, उमंग, उत्साह, ऊर्जा का अभिनव अभियान है।
मंगल दशाफल दीपिका को अग्रांकित 19 सुगम, सरल, सारगर्भित, सार्वभौमिक व सारस्वत अध्यायों तथा 600 पृष्ठों में अन्यान्य व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण के साथ विभाजित, व्याख्यायित एवं विश्लेषित किया गया है: 1. मंगल ग्रहः पौराणिक एवं वैज्ञानिक सत्य तथ्य; 2. दशाफल कथन रहस्य एवं सिद्धान्तः 3. बारह राशियों में मंगल की दशा का फल; 4. मंगल की महादशा का फल; अध्याय 5 से 16 तक विविध भावगत मंगल की दशान्तर्दशा का फल; 17. मंगल की महादशा में विविध ग्रहों की अन्तर्दशा का फल 18. मंगल की महादशा के मध्य प्रत्यंतर दशाओं का फल, तथा 19. मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान।
विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित मंगल दशाफल दीपिका इस श्रृंखला का हीरक हस्ताक्षर है जिसके अध्ययन, अनुभव, अनुसरण और अभ्यास से मंगल ग्रह के दशान्तर्दशा के सन्दर्भ में समस्त भय, भ्रम एवं भ्रांतियाँ ध्वस्त हो जायेंगी और हमारे प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों, गम्भीर अध्येताओं, भक्तों एवं साधकों को मंगल ग्रह के संदर्भ में अभिनव अभिज्ञान के साथ-साथ मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान अत्यन्त सम्पुष्ट साकार-आकार में मंगल दशाफल दीपिका के अन्तर्गत एक ही स्थल पर उपलब्ध व सम्भव हो सकेगा।
₹550.00 -
मुहूर्त मीमांसा
₹260.00जिस समय सभी ग्रह नक्षत्र शुभ फलदायक दशा में होते हैं उस समय को शुभ मुहूर्त कहते हैं। ग्रह नक्षत्र की शुभ चाल में नए या माङ्गलिक कार्य को सम्पन्न करना शुभमुहूर्त में कार्य संपन्न करना कहलाता है। माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में कार्य करने से शुभ फल मिलते हैं, काम सफल होता है और उसमें कोई रुकावट नहीं आती है। प्राचीन काल से ही हिंदू धर्म में मुहूर्त को महत्व दिया जाता रहा है। मुहूर्त को लेकर किए गए कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि, ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति की गणना करके ही मुहूर्त का निर्धारण किया जाता है। हिंदू समाज में लोग आज भी माङ्गलिक कार्यों के सफलतापूर्वक संपन्न होने की कामना के लिए शुभ घड़ी का इंतजार करते हैं। इसके अलावा हर महत्वपूर्ण और शुभ कार्य के दौरान यज्ञ और हवन करने की परंपरा है। भारतीय संस्कृति के षोडश संस्कारों में मुहूर्त के विषय में मुहूर्त शास्त्र में पृथक रूप से वर्णन प्राप्त होता है जिसमें यह बताया गया है कि तिथि, वार, नक्षत्र आदि के संयोग से भी मुहूर्त बनते हैं, जिनमें संस्कार एवं विशिष्ट कार्यों के अतिरिक्त अन्य कार्य भी किये जा सकते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक 12 अध्यायों में विभाजित है जिसमें वैदिक वाङ्गमय के सभी महत्वपूर्ण संस्कारों से सम्बन्धित मुहूर्तों के चयन हेतु सभी विशिष्ट अवयवों एवं मुहूर्त के विभिन्न घटकों की विस्तार से चर्चा की गयी है। ज्योतिष के शिक्षार्थियों को मुहूर्त विषय सन्दर्भ सीखने, उनके आधार पर सभी आवश्यक मुहूर्तों की गणना करने एवं उनके आधार पर संस्कारों को सम्पादित करने में महती सहायता मिलेगी। आशा है कि यह पुस्तक ज्योतिष विषय के जिज्ञासुओं के लिए मील का पत्थर साबित होगी
₹300.00 -
मुहूर्त विचार
₹35.00इस ‘मुहूर्त विचार’ में ‘मुहूर्तचिन्तामणि’, ‘शीघ्र बोध’, ‘बालबोध’, ‘मुहूर्त पारिजात’ आदि से लेकर सरल भाषा में लिखने का प्रयास किया गया है। अशुद्धि/कमी को विद्वान महानुभाव अपने बहुमूल्य विचारों द्वारा आशीर्वाद के रूप में अवगत कराकर कृतार्थ करेंगे।
मुहूर्त लिखने की प्रेरणा (ICAS) भारतीय ज्योतिष विज्ञान परिषद के विद्वानों के शुभाशीर्वाद से मिली। मैं विशेष रूप से दिल्ली चेप्टर-1 के सभी विद्वानों का आभार प्रकट कर संस्था के संस्थापक स्वर्गीय रमन जी के चरणों में इसे समर्पित करता हूँ।
₹40.00 -
मेदिनी ज्योतिष
₹320.00समय का ज्ञान, काल-चिन्तन ही ज्योतिष का कार्य क्षेत्र है। अच्छे समय में दूसरों की सेवा, सहायता करो, दानी व परापकारी बनो। बुरे समय में धैर्य मत छोडो, अधीर या निराश मत बनो। क्योंकि अच्छा व बुरा वक्त सभी के जीवन में आता-जाता है।
ज्योतिष अवसर को पहचानने की सशक्त विधा है। अवसर पहचान कर किया गया कार्य सुख व सफलता देता है। शायद यही ज्योतिष का उपयोग है।₹400.00 -
योग पारिजातअनुपम योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
योग पारिजातधन योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
योग पारिजातभाग्य योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
योग पारिजातराजयोग
₹360.00योग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
रहस्यावरण से मुक्तिवास्तु(जीने की कला और विज्ञान)
₹400.00पुस्तक के बारें में
वास्तुशास्त्र प्रसन्न और संतुष्ट दीर्घ जीवन जीने की कला और विज्ञान है। आजकल तेज भागती प्रौद्योगिकी के युग में रहन-सहन की गलत जीवन शैली के कारण बहुत सी बीमारियां पैदा को रही हैं। वास्तु के शास्त्रीय ग्रंथों में प्राचीन जीवन शैली का वर्णन मिलता है, जिसमें आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन होने चाहिए।
पुस्तुत पुस्तक ‘रहस्यावरण से मुक्ति, वास्तुः जीने की कला और विज्ञान वास्तुसम्मत रहन-सहन की प्राचीन पद्धति और गृह निर्माण व वास्तु-कला की आधुनिक प्रौद्योगिकी का सुबोध सम्मिश्रण है। वास्तुशास्त्र की तकनीकी और विधियों के मानकीकृत और व्यवस्थित रूप का पूर्ण परिचय इस पुस्तक में मिलता है।
पुस्तक तीन खंडों में विभाजित हैं। प्रथम खंड वास्तु की उन मूल अवधारणाओं, सिद्धांतों और शक्तियों की गहरी समझ के प्रति समर्पित हैं, जो किसी स्थान विशेष को प्रभावित करती हैं। पुस्तक का दुसरा खंड रहस्योद्घाटन करता है कि किस प्रकार हम इस घरा पर, अपने घर में ही, स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि किस प्रकार हम घर की बाहरी शांति की स्थापना द्वारा मन की आंतरिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। तृतीय खंड वास्तु के नित्यप्रति उपयोग से संबंधित हैं। एक अलग अध्याय में कार्यस्थल वास्तु की भी विस्तृत चर्चा की गई है, जो कई दृष्टियों से, रिहायशी वास्तु से अलग है।
यह पुस्तक वैदिक ज्योतिष से सुनिश्चित सिद्धांतों के अनुसार लिखी गई है। वैदिक ज्योतिष, वास्तुशास्त्र का अभिन्न अंग है। ज्योतिष यदि दशाओं पर निर्भर है, तो वास्तु दिशाओं पर। ज्योतिष मे कालपुरुष की आवधारणा है, तो वास्तु में वास्तुपुरुष की।
प्रस्तुत पुस्तक में वास्तुशास्त्र की प्राचीन प्रज्ञा की व्याख्या करने के लिए भवन निर्माण के वर्तमान ज्ञान को भी समहित किया गया है ताकि प्राचीन परंपराओं और आधुनिक सोच के बीच की दरार को पाटा जा सके। फेंगशुई तथा पिरामिडशास्त्र आदि अन्य समानांतर विद्याओं में अतिक्रमण करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। इन दोनों विद्याओं को पूर्णतः अलग अध्ययन अपेक्षित है। यह पुस्तक मुख्यतः उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो वास्तु को एकदम प्रारंभ से सीखना चाहते हैं, और इसके गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन का अनुसरण करना चाहते हैं। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए भी मील का पत्थर सिद्ध होगी जो वास्तुशास्त्र के अब तक अछूते पड़े क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहते हैं, उदाहरणतया विशिष्ट दिशाओं की उपयोगिता, वास्तुपुरुष के गुहा अर्थ, पैंतालीस देवता, दिकपाल, तीन प्रकार की ऊर्जाएं, पंचमहाभूत, वास्तुकला की सहायता से घर और इसमें रहने वालों का भाग्य बताना आदि।₹450.00 -
राहु केतु
₹210.00श्री कृष्ण कुमार द्वारा लिखित ज्योतिष और रोग पर यह ग्रन्थ मेरे हाथों में है। इसका विहंगम अध्ययन यह सिद्ध करने के लिये काफी है कि इसमें प्रयुक्त विभिन्न
सिद्धान्तों का संकलन भिन्न-भिन्न शास्त्रों से किया गया है तथा इसमें काफी प्रयत्न तया परिश्रम किया गया है।₹250.00 -
लघु पाराशरी
₹100.00लघुपाराशरी की लोकप्रियता इसीलिए इतनी बढ़ी, क्योंकि यह उपरोक्त तीन बिन्दुओं में से दूसरे बिन्दु पर केन्द्रित है। पहले बिंदु का विवरण तो लगभग सभी सामान्य शास्त्रों में दिया ही गया है। तीसरे बिंदु का महत्त्व भी षड्बल से स्पष्ट हो जाता है जिसका वर्णन भी सामान्यतः सभी शास्त्रों में मिल जाता है। दूसरे बिंदु पर व्याख्या और वैज्ञानिक सूत्रों का लघु रूप में एकत्रीकरण करके प्रस्तुत करना अद्वितीय था। सारावली में केवल भावेश के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा है कि बुद्धिमान ज्योतिषी को होराशास्त्र में वर्णित फलादेश का भावाधिपति के आधार पर ही विचार करना चाहिये क्योंकि भावेश के बिना इस फलित में एक भी कदम चलना असंभव है।
इस संपूर्ण पुस्तक को 5 अध्यायों में विभाजित किया गया है।
₹120.00 -
लघु पाराशरी
₹160.00सम्भव है, स्वयं महर्षि पाराशर या उनके किसी सुयोग्य शिष्य ने इस लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो। पंडित मुकुन्द वल्लभ दैवज्ञ की ‘उडुदाय प्रदीप’ तथा डॉ. सुरेश चन्द्र मिश्र की ‘लघु पाराशरी’ से मुझे पर्याप्त सहायता मिली-मैं इनका हृदय से आभारी हूँ।
₹200.00 -
विशोतरी दशफल तरंगिणी
₹160.00वर्तमान पुस्तक विशोतरी दशा पर सर्वोत्कृष्ट रचना है। लेखक ने ‘सत्य-जातंकम्’, ‘वृहत्पराशर होराशास्त्रा’, ‘फलदीपिका’, ‘भावार्थरत्नाकर’, तथा ‘उत्तरकालामृत’ में उपलब्ध एतत्संबंधी लाभदायक सामग्रियों को एक नए कलेवर के रूप में प्रस्तुत किया है। ग्रहों के भावेश के रूप में विभिन्न भावों में क्या दशाफल होंगे, जन्म लग्न से तथा दशानाथ से विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के दशाफल कैसे होंगे, नक्षत्राधिपत्य तथा राश्याधिपत्य के अनुसार ग्रहों के दशाफल कैसे होंगे आदि का विचार व्यापक रूप में इस पुस्तक में किया गया है। वैदिक त्रिकोणों के आलोक में लेखक ने भावेशों के दशाफल का जो पुनर्मूल्यांकन किया है, पुनः लेखक ने बाधक सिद्धान्त की कतिपय त्रुटियों के सुधार का जो प्रस्ताव दिया है वह सभी सामग्री पराशरी ज्योतिष में नये प्राण फूंकने का कार्य करेगी। प्रतिकूल फल देने वाली महादशाओं तथा अंतर्दशाओं की शान्ति हेतु प्रत्येक लग्न के लिए कैन-से देवताओं की उपासना की जाए। कौन से रत्न धारण किये जाएँ और कौन से रत्न धारण नहीं किये जाएँ, इसकी जितनी गहराई से इस पुस्तक में छान-बीन की गई है, वह अन्यत्रा किसी पुस्तक में आपको देखने को नहीं मिलेगी। ज्ञान तथा व्यवहारिक उपयोगिता की दृष्टि से विशोत्तरी दशा फल तरंगिणी महादशा पर यह एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है, जिसे पाठकों के विशेष अनुरोध पर लेखक ने लिखा है। आशा है, जिज्ञासु पाठक इसे सहृदय अपनाएँग
₹200.00 -
व्यवसाय रत्नाकर
₹400.00ग्रन्थ-परिचय
व्यक्तित्व के निर्माण में स्वस्थ शारीरिक संरचना, उत्तम आचरण के अतिरिक्त व्यवसाय की प्रकृति की उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती। व्यवसाय की दिशा, गति, मति और प्रगति ही व्यक्ति की पहचान होती है। व्यावसायिक गतिविधियों से ही व्यक्ति के सामाजिक स्तर का अनुमान लगाया जाता है। व्यवसाय का स्थायित्व जितना आवश्यक है, संप्रति वह उतना ही संदिग्ध भी है। व्यवसाय की परिवर्तनशील गति जीवन को अनेक स्तरों पर संदेह की परिधि में विभाजित कर देती है। व्यवसाय रत्नाकर में समृद्ध सूत्रों और जन्मांगों के गहन विश्लेषण के आधार पर, सटीक व्यवसाय के निर्धारण में सहायता प्रदान करने वाली शोधपरक प्रविधि प्रस्तुत की गई है जिसके अनुसरण से जातक / जातिका के व्यवसाय की दिशा का सही अनुमान लगाकर ज्योतिष शास्त्र की प्रामाणिकता तो प्रतिष्ठित होती ही है, साथ ही जातक का अबाधित जीवन सही दिशा की ओर तीव्रता से प्रगति पथ पर प्रशस्त होता है।
यदि व्यवसाय का चुनाव करने में त्रुटि हो जाए और प्रतिकूल दिशा की ओर व्यवसाय किया जाए, तो आर्थिक उन्नति तथा प्रगति भी अत्यन्त शिथिल और मन्द हो जाती है। जातक के जन्मांग के अनुरूप व्यवसाय करना, उसे अपार सफलता, प्रशंसा, धन आदि सभी कुछ प्रदान करता है। व्यवसाय और धन दोनों समानान्तर शब्द हैं। व्यवसाय के अभाव में धन नहीं आता और धन व्यवसाय द्वारा ही प्राप्त होता है, इसलिए अनुकूल व्यवसाय करना प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता होती है। प्रचुर अभ्यास के आधार पर उपलब्ध सूत्रों का जन्मांग पर क्रियान्वयन करने पर सटीक व्यवसाय का निर्णय करने में त्रुटि होने की संभावना नहीं होती है।
व्यवसाय रत्नाकर अग्रांकित संपुष्ट और संपूर्ण अध्यायों में व्याख्यायित हैः 1. भाग्य भवन और व्यवसाय व्यवस्था, 2. आत्माकारक ग्रह एवं व्यवसाय, 3. व्यापार: आजीविका का आचार, 4. व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय भाव की भूमिका, 5. षष्ठ भाव एवं नौकरी, 8. व्यवसाय निर्धारण में अष्टम भाव का महत्व, 7. प्रमुख ग्रहयोग, 8. बाधक ग्रह-सिद्धान्त एवं समाधान।
प्रमुख ग्रहयोगों से सम्बन्धित समृद्ध सामग्री व्यवसाय रत्नाकर का वैशिष्ट्य है। व्यवसाय निर्धारण में आत्माकारक ग्रह की विशिष्ट भूमिका का भी रेखांकन इस कृति में सन्निहित है। आत्माकारक ग्रह के आधार पर निर्मित जन्मांग द्वारा जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान सहज ही हो जाता है। इस अनुसंधानपरक प्रविधि का व्यवहारीकरण कृति में प्रचुर उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। व्यवसाय रत्नाकर शीषाकित यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों व श्रेष्ठ ज्यातिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
व्यवसाय विमर्श
₹400.00ग्रन्थ-परिचय
हमारे ऋषि मनीषियों ने भारतीय संस्कृति एवं संस्कार के अलौकिक आलोक में व्यवसाय की विस्तृत व्यवस्था को परम्परागत प्रतिभा, शिक्षा, योग्यता, विद्वता तथा कार्यकौशल के आधार पर श्रृंखलाबद्ध किया है। सम्प्रति, उपयुक्त व्यवसाय के चुनाव हेतु माता-पिता का प्रारम्भिक दायित्व है कि वे बालक की अभिरुचि के अनुसार उसके व्यवसाय की दिशा बाल्यकाल में ही सुनिश्चित करें और तदनुसार ही शिक्षा-दीक्षा का आधार निर्मित करें। उपयुक्त विषय के अध्ययन के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षा प्रतिष्ठान, योग्य, सुशिक्षित व अनुभवी शिक्षक, बालक के भविष्य के व्यवसाय के संदर्भ में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करते हैं। इस प्रकार जातक की अभिरुचि व ग्रहस्थिति के अनुसार उसकी शिक्षा के परिणाम भी अत्यन्त उज्ज्वल होंगे, जो उसके प्रबल व्यवसाय के निर्माण में अत्यन्त सहायक सिद्ध होंगे।
व्यवसाय विमर्श को अग्रांकित बारह अध्यायों में विभाजित किया गया है: 1. अनुभव सिद्ध शोध सूत्र, 2. न्याय संदर्भित निजी व्यवसाय अर्थात् अधिवक्ता बनने के ग्रहयोग, 3. पुलिस एवं रक्षा विभाग, 4. अध्यापन हेतु ग्रहयोग, 5. लेखाकार एक व्यवसाय, 6. पत्रकारिता : एक व्यवसाय, 7. विज्ञान एक व्यवसाय, 8. खेलकूद: एक व्यवसाय, 9. अभिनय: एक व्यवसाय, 10. सन्त, संन्यासी एवं महर्षि बनने के योग, 11. व्यवसाय का विचार: नवांश का आधार, 12. दशमांश चक्र और आजीविका।
उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव उतना ही आवश्यक है जितना कि अनुकूल शिक्षा का चुनाव। व्यवसाय पर केन्द्रित इस शोध प्रबन्ध के अध्ययन और अनुसरण के उपरान्त ज्योतिर्विदों की, आगंतुकों के व्यवसाय पथ प्रदर्शन हेतु दिशा-निर्देश करने की चेष्टा समाज के उत्सर्ग और उत्थान में अप्रतिम सहयोग प्रदान करेगी, यही हमारी मंगलाशा है।
व्यवसाय विमर्श शीर्षांकित इस कृति के अन्तर्गत कतिपय प्रमुख व्यवसाय हेतु उत्तरदायी ग्रहयोगों का समावेश किया गया है जिनके अध्ययन, अनुसरण और क्रियान्वयन द्वारा जातक के व्यवसाय को रेखांकित करने में सफलता प्राप्त होती है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी का ज्योतिष शास्त्र पर आधारित 40 वर्षों से भी अधिक का अनुभव और अनुसंधान, जो विशेष रूप से व्यवसाय पक्ष पर केन्द्रित है. का बहुआयामी विश्लेषण व्यवसाय विमर्श में समायोजित है।
सटीक व्यवसाय का निर्णय करने हेतु नवांश और दशमांश चक्र के अध्ययन की अनिवार्यता असंदिग्ध है। दशमांश चक्र के आधार पर जन्म समय का संशोधन करने की प्रविधि भी इस कृति के अन्तर्गत व्याख्यायित है जिसके आधार पर त्रुटिपूर्ण दशमांश, नवांश और जन्मांग का संशोधन करने के उपरान्त व्यवसाय सम्बन्धी सटीक भविष्यकथन करने में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त होती है। अतः व्यवसाय विमर्श समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अध्येताओं, जिज्ञासुओं, प्रबुद्ध पाठकों आदि के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
व्याधि विभावरी( रोगमुक्त जीवन )
₹320.00व्याधि विकार और विविध विकृतियों से विमुक्त होने हेतु किसी सघन और प्रमाणित सामग्री के अभाव ने ही देश के प्रतिष्ठित, विद्वान श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी को व्याधि पर केन्द्रित व्याधि विभावरी नामक शोध प्रबन्ध की संरचना हेतु प्रेरित व प्रोत्साहित किया। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक ऐसे मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं, जिनके नियमित एवं निरन्तर अनुसरण से कैंसर और एड्स जैसी कर्मज व्याधियों का भी शमन संभव है।
व्याधि विभावरी से तात्पर्य है व्याधिमुक्त करने वाली आनन्दप्रदायक सुखपूर्ण रात्रि। ज्योतिष शास्त्र में विविध वीभत्स व्याधियों के ग्रहयोगों के अनेकानेक विधान व्याख्यायित व विवेचित हैं। व्याधियों की चिकित्सा और निदान की अनिवार्यता भी असंदिग्ध है। किसी भी व्यक्ति के व्याधिग्रस्त होने पर प्रायः महामृत्युंजय जप का परामर्श प्रदान कर दिया जाता है। कब, कहाँ, किस स्थिति में मृत्युंजय मंत्र शीघ्र लाभप्रदायक सिद्ध होगा, इसकी अनिवार्यता असंदिग्ध है। क्या महामृत्युंजय के जप मात्र से कैंसर, एड्स, पक्षाघात, हृदयाघात, लीवर सिरोसिस, ब्रेन हैमरेज व पागलपन जैसी असाध्य व्याधियों की चिकित्सा के समय महामृत्युंजय मंत्रजप का अनुष्ठान करने से अपेक्षित सफलता उपलब्ध हो सकती है? ऐसी असाध्य व्याधियों से मुक्त होने हेतु अनेक विशिष्ट मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि का सविधि अनुष्ठान संपादन करने से व्याधिग्रस्त व्यक्ति का व्याधिमुक्त होना, अनेक अवसरों पर अनुभवसिद्ध है।
स्वास्थ्य रक्षा हेतु विविध असाध्य व्याधियों से मुक्ति हेतु अनेक दुर्लभ मंत्र अनुष्ठान, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान व्याधि विभावरी के अंतर्गत आविष्ठित हैं। कब, कहाँ, किन स्थितियों में किस मंत्र प्रयोग का अनुकरण करके साधक शीघ्र व्याधिमुक्त हो सकेगा, इसका विस्तृत विवेचन कृति के अग्रांकित अध्यायों में व्याख्यायित व विश्लेषित हैः 1. नवग्रहकृत परिहार, 2. विविध ग्रहकृत व्याधिविधान एवं समाधान, 3. बालरोग शमन साधना, 4. कर्मज व्याधि शमन विधान, 5. मंत्र शक्ति द्वारा व्याधिमुक्ति विधान, 6. ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म का संत्रास, 7. गण्डमूल में जन्म : अनिष्ट शमन, 8. अशुभ जन्म समय संज्ञान, 9. गंभीर व्याधि परिहार परिज्ञानः प्रबल मारकेश शमन विधान, 10. अथर्ववेद के अन्तर्गत व्याधि शमन विधान, 11. गुरु परम्परा : सिद्ध अनुष्ठान।
असाध्य व्याधि से आक्रांत व्यक्ति हेतु व्याधि विभावरी में सन्निहित मंत्र प्रयोग, अनुष्ठान आदि संजीवनी सिद्ध होंगे, इसमें किंचित सन्देह नहीं है। व्याधि विभावरी मात्र ज्योतिषियों अथवा ज्योतिष प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी व्यक्तियों के लिए पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय शोध प्रबन्ध है।
₹400.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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व्यावसायिका
₹400.00ग्रन्थ-परिचय
व्यावसायिका जीविकोपार्जन के सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोपयुक्त माध्यम का ज्योतिष सुलभ स्वर्णिम सिद्धान्त और सशक्त सूत्र तथा सारस्वत संज्ञान द्वारा धनार्जन के विधि-विधान व प्रावधान का पूर्वानुमान करके तदनुसार उपयुक्त शिक्षार्जन की ओर प्रशस्त व गतिशील होकर उपयुक्त व्यवसाय चयन हेतु गहन चिंतन-मनन की गणना का अलौकिक आधारस्तम्भ है। व्यवसाय का निर्धारण, जीविकोपार्जन की उपयुक्त दिशा और बालक की प्रतिभा की गति, मति, प्रगति एवं उन्नति आदि पर विचार करने में, सदा शीघ्रता करना अपेक्षित है और यही ज्योतिष शास्त्र की वास्तविक उपयोगिता है कि व्यवसाय की व्यवस्था, उचित वय में ही की जा सके। जन्मांग के आधार पर ग्रहों की स्थिति के अनुसार उपयुक्त व्यवसाय का सटीक निर्धारण करने हेतु ही व्यावसायिका की संरचना हुई है।
दशम भावगत ग्रह और दशमेश के नवांशाधिपति, दशम भाव पर दृष्टि निक्षेप करने वाले ग्रह तथा दशमेश से संयुक्त ग्रह आदि द्वारा व्यवसाय की दिशा का संकेत प्राप्त होता है। खेद का विषय है कि इस दिशा में किये गये शोध कार्यों से अधिकांश ज्योतिष प्रेमी अनभिज्ञ हैं। संप्रति व्यवसाय की अनगिनत शाखाओं ने, उसकी सीमा का इतना अधिक विस्तार किया है जिसे लिपिबद्ध किया जा सकना संभव नहीं है परन्तु व्यवसाय के चंचल, चटुल प्रवाह में अवगाहन करके कतिपय मूल्यवान रत्न खोजकर, उन्हें अनुभव के निकष पर संस्कारित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत करने का दुःसाध्य अनुसंधान, इस कृति के स्वच्छ, स्पष्ट एवं पावन पीयूष में संचित और संकलित है। व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय, तृतीय, अष्टम, नवम, दशम भाव, लग्न के अतिरिक्त विविध ग्रहयोगों की भूमिका की उपेक्षा करने से त्रुटिपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार अनेक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनका गहन आकलन इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
ज्योतिष शास्त्र के हिंदी पाठकों के निरंतर आग्रह ने यशस्वी ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व श्री टी.पी. त्रिवेदी को इस विषय पर प्रमाणित व सारगर्भित संरचना व्यावसायिका के लेखन हेतु विवश किया। यह कृति अन्यान्य शोधपरक अध्यायों में व्याख्यायित है जिनके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, अभियन्ता, अधिवक्ता, लेखाकार, कलाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, खिलाड़ी, बैंककर्मी, भविष्यवक्ता, वैज्ञानिक, पुलिस एवं रक्षा, प्रबंधन, अध्यापन, व्यापार, लेखक, कवि, संत, संन्यासी, महर्षि आदि विविध व्यवसाय निर्धारण हेतु उपयुक्त ग्रहयोगों की विस्तृत व्याख्या तथा अन्यान्य उदाहरण प्रस्तुत किए गये हैं। यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है जिसके फलस्वरूप प्रबुद्ध पाठकगण विविध व्यवसायों से सम्बन्धित भविष्यकथन करने में सिद्धहस्त हो सकते हैं।
₹450.00



















