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  • अष्टके वर्गसिद्धांत एवं फलित

    ज्योतिष शास्त्र में अष्टक वर्ग पद्धति का गौरवपूर्ण स्थान है। पलक झपकते ही इसके द्वारा जातक के स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, आध्यात्मिक विकास, आजीविका तथा अन्य अच्छी-बुरी सम्भावनाओं की सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अन्य किसी विद्या में अष्टक वर्ग सरीखा अचूकता से गोचर ग्रह के प्रभाव का आकलन सम्भव ही नहीं। अष्टक वर्ग सारिणी पर दृष्टिपात करने से जातक की आजीविका क्षेत्र में सफलता व सम्पन्नता तथा विभिन्न ग्रहों की दशा का फल सटीक व प्रभावशाली ढंग से बताया जा सकता है। अष्टक वर्ग के अभाव में ये जान पाना असम्भव है कि श्री गुलजारीलाल नन्दा तथा श्री चरणसिंह इतनी अल्प अवधि के लिए प्रधानमंत्री क्यों बने तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू एवम् इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल इतना लम्बा क्यों चला।

    भयप्रद साढ़े साती के परिणाम भी अष्टक वर्ग की सहायता से सहज व सही ढंग से जाने जाते हैं। इसकी सहायता से पता लगता है कि शनि के अष्टक वर्ग में अधिक बिन्दु पाने वाली राशि पर शनि का संचार दुख व हताशा नहीं देता अपितु धैर्य, उत्साह व कार्यक्षमता बढ़ाता है।

    इस विद्या का प्रयोग मुहुर्त विचार में भी किया जा सकता है। किस दिशा में सफलता व सम्पन्नता मिलेगी, किस तरह की पत्नी शुभ व सौभाग्यप्रद् होगी आदि। चुनाव में पर्चा भरने, साक्षात्कार पर जाने, औषधि लेने या अन्तरिक्ष यान छोड़ने का सही समय अष्टक वर्ग द्वारा सहज बताया जा सकता है। मित्र सहयोगी के चयन में भी अष्टक वर्ग उपयोगी है

    110.00120.00
  • अष्टाध्यायी

    भारतीय ज्योतिष का संक्षिप्पो इतिहास, भगवान श्रीराम से लेकर मनमोहन सिंह तक तेईस राजप्रमुखों की जन्मकुंडलियों की विवेचना, कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के दुःखद अंत की परम्परा का रहस्य, साथ ही न्यायाधीशों-उद्योगपतियों तथा ब्यूरोक्रेट्स की जन्मकुंडलियों की विवेचना से परिपूर्ण यह पुस्तक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष- इन चार वैदिक त्रिकोणों पर आधारित भारतीय ज्योतिष का पुनर्मूल्यांकन तथा समाधान भी प्रस्तुत करती है। लेखक ने वैदिक त्रिकोणों के आधार पर रत्नों के चुनाव तथा ग्रहों की शांति के अकाट्य उपाय बताये हैं जो इस पुस्तक की अनुपम उपलब्धि है। भाग्यशाली रत्नों के चुनाव तथा अरिष्ट निवारक ज्योतिषीय उपायों की पृथक् से चर्चा सम्मिलित कर इस पुस्तक को और भी उपयोगी बना दिया गया है। ‘प्रश्नमार्ग’ के सुझावों तथा ‘कालसर्प योग की शांति’ को पाठकों के विशेष आग्रह पर शामिल किया गया है। आठ अध्यायों की यह लघु पुस्तक ज्योतिष के विभिन्न अंगों-यथा इतिहास, वैदिक त्रिकोणों के आलोक में ज्योतिष का पुनर्मूल्यांकन, उपचारीय ज्योतिष, मेडिकल ऐस्ट्रोलौजी तथा वोकेशनल ऐस्ट्रोलौजी की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी पुस्तक है।

    130.00150.00
  • आजीविका विचार ज्योतिष के झरोखे से भाग-2

     यह पुस्तक ज्योतिषियों के लिए ही नहीं वरन व्यावसायिक सलाहकारों तथा मानवीय संसाधनों के नियोजकों के लिए भी अत्यंत उपयोगी लगती है। क्योंकि, विद्वान लेखक ने इस पुस्तक में व्यवसाय संबंधी ज्योतिष के लगभग सभी नियमों का श्रेष्ठ संकलन कि
    310.00350.00
  • आजीविका विचारज्योतिष के झरोखे सेभाग-1

    यह पुस्तक ज्योतिषियों के लिए ही नहीं वरन व्यावसायिक सलाहकारों तथा मानवीय संसाधनों के नियोजकों के लिए भी अत्यंत उपयोगी लगती है। क्योंकि, विद्वान लेखक ने इस पुस्तक में व्यवसाय संबंधी ज्योतिष के लगभग सभी नियमों का श्रेष्ठ संकलन कि

    300.00350.00
  • आपका भाग्यरत्न

    “आपका भाग्य रत्न कौन-सा रत्न है” इसकी संपूर्ण जानकारी देने वाली हिंदी भाषा की एकमात्र प्रामाणिक किताब
    आपका भाग्यरत्न
    ग्रह एवं रत्नों की उत्पत्ति, इतिहास, भौतिक गुण, औषधि गुण, दैवी शक्ति, रत्नों की परीक्षा, स्वर्ग लोक एवं मृत्यु लोक के रत्न, उनका प्रभाव, रत्न धारण विधि, पर्यायी रत्न, भाग्य रत्न कौन सा? उपरत्नों की जानकारी, पंचदशी त्रिशांति यंत्र, नवग्रह मुद्रिका, नवग्रहों के रत्नों की पूजा, मंत्र, जप आदि की जानकारी से अद्यतित हिंदी की वास्तविक भाषा।

  • आयु निर्णय शोध सिद्धांत एवं प्रयोग

    जातक के जन्मांग पर नाना प्रकार के राजयोग-धनयोग आदि पर विचार करने से पूर्व प्रत्येक ज्योतिषी को सर्वप्रथम जातक की आयु पर विचार करना चाहिये। यदि जातक को आयु ही प्राप्त न हो, तो ज्योर्तिविद के फलादेशों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग जाती है। आयु जैसे दुरूह विषय में परांगत होना अत्याधिक दुष्कर कार्य है तथा प्राचीन विद्वानों, ऋषि-मुनियों द्वारा ज्योतिष में किए गए कार्य सर्वप्रथम तो पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है, जो उपलब्ध हैं भी उनमें विभिन्न प्रकार का मत-मतान्तर देखने को मिलता है। जिसका एक कारण तो अनुवाद की त्रुटि है, दूसरा कारण उपलब्ध साहित्य की अपूर्णता। प्राप्त ग्रन्थों में आयु-निर्णय की अनेक गणितीय तथा अन्य विधियाँ दी गई हैं। यथा – अंशायु, पिण्डायु, निर्सगायु, अष्टकवर्गायु, योगायु तथा जैमिनी पद्धिति से आयु निर्धारण आदि का वर्णन मिलता है।

    उक्त सभी पद्धतियों से जैमिनी ऋषि का PAM (पाम) सिद्धान्त तथा महर्षि पाराशर के योगायु के सिद्धान्तों को परस्पर समावेश कर आयु के निकटतम स्थूल बिन्दु को प्राप्त किया जा सकता है, चूंकि यह बहुत ही गूढ़ विषय है अतः इस कलिकाल की अल्पायु में इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है।

    यद्यपि जैमिनी ऋषि के सिद्धान्त अपने आप में परिपूर्ण और सत्यता के अत्याधिक निकट माने जाते हैं। परन्तु, उनके सिद्धान्तों को सरलीकृत कर समझने के लिये ऋषि ज्योतिषी योगी के०एन० राव जी जैसी दिव्यात्माओं की आवश्यकता है। अन्यथा जैमिनी ज्योतिष की उपलब्ध भाषा टीकाओं के मत-मतान्तर रूपी मकड़ाजाल में एक जिज्ञासु ज्योतिष उलझकर रह जाएगा।

    130.00150.00
  • आयुष्य विचार

    आयुष्य विचार या आयुर्दाय मनुष्य की जीवन अवधि को जानने की रोचक विधि है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान परिषद द्वारा आयोजित ज्योतिष विशारद के प्रश्न पत्र-III का यह प्रथम भाग है।

    210.00250.00
  • उत्तर कालामृत

    कवि कालिदास के उत्तर कालामृत पर आदरणीय वी. सुब्रह्मण्यम शास्त्री और श्री पी.एस. शास्त्री की टीकाएँ अंग्रेजी भाषा में तथा श्री जगन्नाथ भसीन की टीका हिन्दी भाषा में उपलब्ध है।
    कदाचित् इस पर नई टीका की आवश्यकता नहीं थी किन्तु इस अचरजपूर्ण ग्रन्थ को पढ़ने पर लगा कि शायद कहीं कुछ छूट गया है। उसे पूरा करने का यह छोटा सा प्रयास है।
    310.00350.00
  • उद्यम उन्नति

    ग्रन्थ-परिचय

    यदि जीवन का लक्ष्य उन्नति है तो व्यक्ति का उद्यम ही यथार्थ है। उद्यम के अभाव से उन्नति एवं प्रगति संभव नहीं होती और वह दिशाषिहीन जीवन को जन्म देती है। उद्यम पूर्व उन्नति का संयुक्त पर्याय है आजीविका अथवा व्यवसाय। व्यवसाय की महत्ता तथा समय की सत्ता के मध्य निर्मित होने वाले समीकरण का सुगम समाधान है, व्यवसाय पक्ष पर केन्द्रित यह अद्भुत कृति उद्यम एवं उन्नति। खेद का विषय है कि ज्योतिष शास्त्र के विविध पक्षों से सम्बन्धित स्तरीय सामग्री और समृद्ध साहित्य का हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में अभाव है। लगभग समस्त शास्त्रीय ज्योतिष ग्रन्थों में व्यवसाय पक्ष पर अत्यन्त अल्प सामग्री ही उपलब्ध है। व्यवसाय पक्ष पर आधारित सभी शोध कार्यों का अध्ययन अनिवार्य है जो भारतवर्ष की बहुचर्चित अंग्रेजी पत्रिका ‘द एस्ट्रोलॉजिकल मैगजीन’ में अनेक अनुसंधानकर्ताओं द्वारा पूर्व लगभग 70 वर्षों से ज्योतिष विद्या के उत्तरोत्तर उत्थान हेतु प्रस्तुत किया जाता रहा है।

    जातक के व्यवसाय के सटीक संज्ञान हेतु दशम भाव के साथ-साथ द्वितीय भाव का भी विश्लेषण सम्यक रूप से किया जाना चाहिए। प्रत्येक नौकरी या व्यापार के लिए पृथक-पृथक् ग्रह स्थितियों, कारकों, भावों और भावाधिपतियों की विशिष्ट स्थितियों का अध्ययन अपेक्षित है।

    महाकाय, महाकाल, तिमिराकार शनि ग्रह को दुर्दमनीय दारुण दुःखों व दुःखों के संत्रास और विविध व्यथाओं का पर्याय आऔर प्रदाता स्वीकारा जाता है। इस कृति में जन्मांग में विद्यमान शनि की स्थिति के आधार पर उपयुक्त व्यवसाय, व्यापार अथवा नौकरी की दिशा का सटीक अनुमान करने की प्रामाणिक शोध प्रस्तुत की गई है। जहाँ एक एक ओर 3 सभी को प्रकंपित और भयमीत करने वाला शनि जातक को सतह से उठाकर शिखर तक पहुँचाने के अद्भुत सामर्थ्य से अभिसिंचित है, वहीं दूसरी ओर शनि की साढ़ेसाती और ढड्या, कब अनुकूल और प्रतिकूल फल प्रदान करती है, इसका भी सम्यक् संज्ञान आवश्यक है जो इस कृति में विविध व्यावहारिक उदाहरणों एवं प्रसंगों के माध्यम से आविष्ठित है।

    उद्यम एवं उन्नति नामक इस कृति को विविध 10 अध्यायों में विभाजित और व्याख्यायित किया गया है। व्यवसाय पक्ष के विविध संताप से ग्रस्त मानव की पीड़ा का सनाधान प्रस्तुत करने के प्रयोजन से इस कृति में उपयुक्त परिहार को भी स्थान प्रदान किया गया है। परिहार के सविधि अनुसरण से नौकरी, व्यापार, अवनति, हानि, निलम्बन आदि समस्त संत्रास को मधुरिम मुस्कान के मधुमास में रूपांतरित करना संभव है। यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।

    400.00500.00
  • उपचारीय ज्योतिष कौमुदी

    पुस्तक के बारे में
    गत कुछ वर्षों में उपचारीय ज्योतिष को युक्तिसंगत स्वरूप प्रदान करने में जिन कुछेक विद्वानों ने अमूल्य योगदान दिया है उनमें पाठकजी का विशिष्ट स्थान है। एल्फा पब्लिकेशन के विशेष आग्रह पर पाठकजी ने उपचारीय ज्योतिष सम्बन्धी अपने शोधपूर्ण विचार कई पुस्तकों की एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है, जिसकी प्रथम कड़ी “उपचारीय ज्योतिष कौमुदी” के रूप में आपके सम्मुख प्रस्तुत है। यह पुस्तक छः अध्यायों की है किन्तु, इसे पढ़कर तथा समझकर कोई भी मेधावी ज्योतिषी उपचारीय ज्योतिष के क्षेत्र में पारंगत हो सकता है। प्रथम अध्याय में, वर्णित ज्योतिष के मूलभूत सिद्धान्त को समझकर आप कुंडली के बारह भावों से सम्बन्धित समस्याओं को हल करने में समर्थ हो सकते हैं। द्वितीय अध्याय में, रत्नों की आवश्यकता पर जो शोधपूर्ण विस्तृत सामग्री दी गई है वैसी उपयोगी सामग्री आपको अन्यत्र अभी तक देखने को नहीं मिली होगी। तृतीय अध्याय में, लेखक ने पराशरीय उपचार विधि की जो झलक प्रस्तुत की है वह पूर्णतः शास्त्रोक्त होते हुए भी देश-काल-पात्र के समीचीन है। चतुर्थ अध्याय में लेखक ने पैंतीस दोषपूर्ण ग्रहयुतियों के परिहार बताये हैं। पंचम अध्याय में, ग्रहों की शान्ति हेतु लेखक ने तेईस हिन्दू पौराणिक देवी-देवताओं के मंत्र जाप तथा स्तुति का जो विस्तृत विवरण दिया है उससे देवोपचार में दक्षता आ सकती है। षष्ठ अध्याय में, लाल किताब के कुछ सुप्रसिद्ध टोटके दिये गये हैं जिसमें कालसर्पयोग को शमन करने के टोटके भी शामिल हैं। यदि “जातक चन्द्रिका” को ललित ज्योतिष के आधार ग्रन्थ के रूप में मान्यता प्रदान की जा सकती है, तो कोई कारण नहीं कि “उपचारीय ज्योतिष कौमुदी” को उपचारीय ज्योतिष के आधार ग्रन्थ के रूप में मान्यता न दी जाये। पाठकों के आग्रह पर हम शीघ्र ही उपचारीय ज्योतिष श्रृंखला में पाठक जी की अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का भी प्रकाशन करने जा रहे हैं।

    110.00130.00
  • कालचक्र दशा से फलित

    पुस्तक के बारे में

    वर्तमान समय में जो पुस्तकें कालचक्र दशा में सम्बन्धित है, उनमें ऐसे ही उदाहरणों को रखा गया है जिसमें देहादि संज्ञक राशि या उनके स्वामी पीड़ित हैं। जबकि उन पुस्तकों में ऐसे उदाहरणों को भी रखा जाना चाहिए था जिनमें देहादि संज्ञक राशि दशा में मृत्यु नहीं हुई हो, परन्तु शास्त्रीय सिद्धान्त लागू होते हों, ताकि विद्यार्थीगण दोनों स्थितियों से भिज्ञ हो जाते।

    कुछ उदाहरणों में मृत्यु दशा ही गलत लगा रखी है।

    कुछ उहाहरणों में प्रथम चक्र की देहादि संज्ञक राशि दशा में मृत्यु होना दर्शाया गया है जबकि जातक द्वितीय चक्र की दशा राशि में मृत्यु को प्राप्त हुआ है।

    अन्तर्दशा गणना हेतु परमायु वर्षों के महत्त्व को नहीं बताया गया है।

    70.0080.00
  • कालसर्पयोग

    लेखक की चाह

    हो सकता है कि कालसर्प योग पर बाज़ार में अन्य अनेक पुस्तकें विज्ञ पाठकों के लिए उपलब्ध हों। परन्तु कुछ लेखक कालसर्प योग के द्वारा पाठकों में भय या घम उत्पन्न करना चाहते हैं, तो कुछ लेखक कालसर्प योग को केवल अन्य ज्योतिष योगों की भान्ति योग मानकर चलना चाहते हैं। परन्तु अनुभव में आया है कि वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। यह भी मांगलिक दोष, विष कन्या या गोचर की साढ़ेसाती की भान्ति जातक के जीवन के कुछ तथ्यों की ओर संकेत करता है। कुछ जातकों के लिए कालसर्प दोष वरदान हे तो कुछ के लिए अभिशाप। मैंने कालसर्प का इसी दृष्टि से अध्ययन किया है कि कालसर्प किनके लिए वरदान है तथा किन जातकों के लिए अभिशाप ।

    मेरी पुस्तक लिखने की एक ही चाह रही है कि में विज्ञ पाठकों के सामने वास्तविक स्थिति को रख सकूँ। इसमें मैंने अपनी ओर से न तो कुछ जोड़ा है, न कुछ छिपाने की कोशिश की है। शास्त्रों में मुझे जो मिला वह मैंने पाठकों के समक्ष रखा है। मेरे मित्रों व विद्यार्थियों ने जो अनुभव बतलाए उनको लेखनी से पंक्तिबद्ध किया है।

    पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक अनुभव करेंगे कि कालसर्प योग वास्तव में जीवन में सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह पूर्व जन्मों के कर्मों की ओर संकेत देता है। यह कार्मिक योग है। जातक पर प्रभाव ज़रूर डालता है। कालसर्प योग वाले जातक किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए जन्म लेते हैं। उनका जीवन संघर्षमय रहता है। यदि पूर्व जन्मों में किसी प्राकृतिक नियम का उल्लंघन किया है या किसी जीव को कष्ट पहुँचाया है या अशुभ बचनों को अर्जित किया है, बद-दुआओं को अर्जित किया है तो जातक को इस जन्म में उसका फल भोगना पड़ता है यह ज्योतिष का आधार भी है। कालसर्पयोग सीप-सीढ़ी के खेल की तरह जातक को जीवन संघर्ष में ऊपर व नीचे, हार व जीत होती रहती है। साँप की तरह टेढ़ा मेढ़ा चलता रहता है।

    70.0075.00
  • कुण्डली मिलान

    पुस्तक के बारे में

    विवाह जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है। जातक के माता-पिता इसे पूर्ण विचार-विमर्श करके करना चाहते हैं। गृहस्थ जीवन समाज का आधार है। इसके सुखी होने से बूढ़े, बच्चे व समाज सब ओर प्रसन्नता व हर्षोल्लास फैलता है। समाज में शान्ति व्यवस्था व हर्षोल्लास स्थापित हो इसको ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।

    विभिन्न संस्कारों में परस्पर विरोधी बातों का समन्वय करते हुए दक्षिण व उत्तर भारतीय रूपों व मान्यताओं का समाहार करते हुए लेखक ने विस्त त जानकारी देने की कोशिश की है। विवह के अवसर पर पूर्ण ज्ञान देने के लिये आयु निर्णय, दोष साम्य, मांगलिक दोष व विवाह के समय का निर्धारण, दर्शानर्तदशा साम्य आदि का विचार किया गया है। कन्या व वर में पाये जाने वाले अशुभयोगों की जानकारी दी गई है। विवाह की प्रत्येक समस्या को सुलझाने की पूर्ण रूपेण कोशिश की गई है।

    प्रत्येक दोष का परिहार दिया गया है तथा ाधारण तौर पर पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तार भी अलग से दिया गया है। जिससे कुण्डली मिलान एवं विवाह पर एक अनूठी पुस्तक बन पड़ी है। यह केवल विद्यार्थियों के लिए ही नहीं अपितु कुण्डली मिलान करने वाले विद्वान पंडितों के लिये भी यह एक उपयोगी पुस्तक है।

    180.00200.00
  • गणेश होरा शास्त्रम्भाव विवेचनभाग – 1

    पुस्तक के बारे में

    इस पुस्तक में, वर्णित सिद्धांत वीरभद्र ज्योतिष पर आधारित तथा वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार, यथासंभव व्यवस्थित हैं। पुस्तक की विषय वस्तु का प्रारूप, इस प्रकार तैयार किया गया है, कि मौलिक ज्योतिष सिद्धांतों (परिचय), विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के प्रभावों, भाव विश्लेषण तथा लग्न भाव से द्वादश भाव तक उपयुक्त उदाहरण कुण्डलियों सहित, सभी भावों का परिज्ञान प्रबुद्ध पाठकों को प्रदान किया जा सके। प्रथम छह स्थानों की व्याख्या के पश्चात्, एक उदाहरण कुण्डली का, प्रथम छह भावों के लिए, विस्तृत विश्लेषण किया गया है एवम् शेष छह स्थानों का विस्तृत विश्लेषण उनकी व्याख्या के पश्चात् किया गया है। तत्पश्चात् बारह स्थानों का विश्लेषण किया गया है। बारह भावों, भावेशों और ग्रहों के पारस्परिक सम्बन्धों पर इसमें, न केवल यथेष्ट तथ्य हैं, अपितु उनको तर्कसंगत रूप से समझाया भी है। पाठकों को अवश्य ही इससे लाभ होगा।

    250.00300.00
  • गीता मंत्र गंगोत्री

    श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियों के लिए प्रार्थना पथ नहीं, बल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमद्भगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायः अधिकांश भक्तजन, साधक, आराधक, पाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एवं उसकी व्याख्या, गीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप में सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामों से शीर्षांकित किया गया है:

    290.00350.00
  • गीता मंत्र गंगोत्री: Gita Mantra Gangotri

    श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियो के लिए प्रार्थना पथ नहीबल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमदभगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायअधिकांश भक्तजनसाधक आराधकपाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एव उसकी व्याख्यागीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप मे सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायो में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामो से शीर्षाकित किया गया है:

    1. सन्ध्योपासना:सूक्ष्म ज्ञातव्य तथ्य 2.भगवान श्रीकृष्ण से सम्बन्धित आसधना स्तोत्र 3. श्रीमद्भगवद्गीता में सन्निहित मंत्रशक्ति एवं अनुष्ठान विधान 4. विपत्ति विनाशक विविध मंत्र प्रयोग 5. विभिन्न कार्यों की संसिद्धि हेतु वेदविहित मंत्र, 6. वैदिक सूक्त साधन अभिज्ञान 7.पतिपत्नी में सयोग हेतु अनुभव परिहार परिज्ञान 8.केमद्रुम योग शमन 9. कालसर्पयोग दोषपरिहार परिज्ञान 10. पाप निवृत्ति मंत्र आराधना 11. अकाल मृत्यु एवं असाध्य व्याधि से मुक्ति ही जीवन की शक्ति 12. श्राद्ध एवं मोक्षपितृ श्राद्ध विधान।

    गीता मंत्र गंगोत्री में दुर्लभ अद्भुत और अनुभूत मंत्र प्रयोगसाधानाएँ तथा कतिपय महत्त्वपूर्ण परिहार परिशान सुन्दर और सुरूचिपूर्ण स्वरूप में सन्निहित हैं जो सम्बन्धित विषय पर पाठकगणो के लिए हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगे। महर्षि वेदव्यास ने चार वेद अट्ठारह पुराण एव इक्कीस उपनिषदों के साथसाथ महाभारत के महाकाव्य की सरचना करने पर कहा था कि ”मेरे कथ के रहस्य को मैं जानता हूँ शुकदेव जानते हैं संजय जानता है अथवा नहींइसमें मुझे सन्देह है। इनके अतिरिक्त कोई भी नहीं जानता। हे गणपतिआप भी मेरे ग्रन्थ के मर्म को नहीं जानते। इस महाकाव्य महाभारत मे जो नही होगावह विश्व में कहीं नही होगा 

    गीता मंत्र गंगोत्री मंत्रशास्त्र की महकती पुष्पाजलि तथा साधना संज्ञान की ओजस्वल और ऊर्जस्वल उपलब्धि है। मंत्र साधना के सविधि संपादन सेसाधक की समस्त अभिलाषाओं अपेक्षाओं और इच्छाओं की संसिद्धि होती हैपरन्तु कार्य विशेष की सम्पन्नता हेतुहैअनिवार्यता हैउपयुक्त एवं अनुकूल साधना के विविवत् संपादन कीजो गीता मंत्र गंगोत्री का वैशिष्ट्य है।

    संक्षिप्त परिचय

    श्रीमती मृदुला त्रिवेदी देश की प्रथम पक्ति के ज्योतिषशास्त्र के अध्येताओं एव शोधकर्ताओ में प्रशंसित एवं चर्चित हैं। उन्होने ज्योतिष ज्ञान के असीम सागर के जटिल गर्भ में प्रतिष्ठित अनेक अनमोल रत्न अन्वेषित करउन्हें वर्तमान मानवीय संदर्भो के अनुरूप संस्कारित तथा विभिन्न धरातलों पर उन्हें परीक्षित और प्रमाणित करने के पश्चात जिज्ञासु छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करने का सशक्त प्रयास तथा परिश्रम किया हैजिसके परिणामस्वरूप उन्होंने देशव्यापी विभिन्न प्रतिष्ठित एव प्रसिद्ध पत्रपत्रिकाओ मे प्रकाशित 460 शोधपरक लेखो के अतिरिक्त 70 से भी अधिक वृहद शोध प्रबन्धों की सरचना कीजिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धिप्रशंसाअभिशंसा कीर्ति 

  • गोचर फल विचार

    वर्तमान पुस्तक “गोचर फल विचार” में गोचर-फल-विकास के सेल अध्यायों में प्रकाश डाला गया है। प्रथम अध्याय में दर्शन फल विचार के महत्व पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, पष्ठ, सप्तम, अष्टम और नवम अध्यायों में शास्त्रीय ग्रंथों में क्रमशः नारद-संहिता, बृहसंहिता, फलदीपिका, ज्योतिषाभरण, ज्योतिषार्घव-नवनीतम् ज्योतिषादेशमार्ग, कालप्रकाशिका, बृहज्ज्योतिषसार और फलित-मार्तण्ड में ज्योतिष शास्त्र से संबंधित सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। शास्त्रीय ग्रंथों में जन्मकालीन चन्द्र-नक्षत्र के आधार पर ही दर्शन फल विचार का सारा ताना-बाना बना हुआ है जिसमें स्थायित्व नहीं बताया जा सकता।

    130.00150.00
  • गोचर फलदर्पण (एक आधुनिक और वैज्ञानिक अध्ययन)

    * ज्योतिष शास्त्र के गोचर विषय पर लिखी गयी पहली पुस्तक जिसमें लेखक के वर्षों पढ़ाने के अनुभव का निचोड़ है।

    * क्रमवार ढंग तथा उदाहरणों के माध्यम से गोचर की अनूठी और सही व्याख्या ।

    * प्राचीन सिद्धान्तों को आधार मानकर वर्तमान काल में गोचर की अचूक उपयोगिता ।

    * गोचर का वर्गों में प्रयोग-एक अद्वितीय विधि ।

    * समुदाय अष्टक वर्ग और सर्वाष्टक वर्ग के सूक्ष्म भेद तथा गोचर के अभिनव प्रयोग।

    * अष्टक वर्ग में गोचर देखकर ‘दिन कैसा बीतेगा’ बताने में प्रवीणता आदि-आदि अनेक व्यावहारिक उपयोगों पर मौलिक पुस्तक ।

    250.00280.00
  • ग्रह योग संक्षेपिका

    ग्रन्थ-परिचय

    ग्रहयोगों की महत्ता का अनुमान कोई प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमी ही लगा सकता है। कितने ही जन्मांगों का गहन विश्लेषण करने पर भी, उनके मध्य सन्निहित मर्म को तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक ग्रहयोगों और उनके परिणाम का सम्यक् ज्ञान न हो। डा. राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं नरेन्द्र मोदी आदि के अत्यंत साधारण दिखने वाले जन्मांगों का रहस्य ग्रहयोगों के संज्ञान के अभाव में कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता है। वस्तुतः ग्रहयोग ज्योतिष शास्त्र की आत्मा है। ग्रहयोगों की उपेक्षा करके जन्मांग में छिपे रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता चाहे ग्रह स्थितियों, उनके बलाबल, दृष्टि, युति, स्वामित्व, नक्षत्र, राशि, भाव आदि की कितनी भी व्याख्या की जाए। ग्रहों का अपनी उच्च या नीच राशि में स्थित होना, अनुकूल फल प्रदान करेगा या प्रतिकूल, यह ग्रहयोगों पर निर्भर करता है। प्रायः देखने में आता है कि जिन जन्मांगों में छह ग्रह भी अपनी उच्च राशि में स्थित हैं, वह नितांत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं; तथा जिनके जन्मांगों में अनेक नीच राशिस्थ ग्रह हैं, वह सतह से उठकर शिखर तक पहुँचे हैं। इसका रहस्य तभी स्पष्ट हो सकता है जब ग्रहयोगों के सम्यक् संज्ञान एवं सटीक क्रियान्वयन का अनुमान हो।

    ग्रह योग संक्षेपिका के अध्ययन, अनुसंधान व अभ्यास के साथ-साथ ग्रहयोगों के मनन, चिंतन और मंथन में अत्यन्त सुगमता होगी। जो जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमी एक दृष्टि में ग्रहयोगों को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक शीघ्र संदर्भित पुस्तिका के समतुल्य है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अथक चेष्टा की है कि कोई भी ग्रहयोग, जो किसी भी ग्रहयोग से सम्बन्धित कृति में सन्निहित है, वह इस कृति के अन्तर्गत अवश्य उपलब्ध हो। लगभग 1200 ग्रहयोगों का संदर्भ, उनकी परिभाषा एवं परिणाम इस कृति का वैशिष्ट्य है। प्रबुद्ध और प्रखर ज्योतिष प्रेमियों को, जो मात्र योग की संरचना एवं उनके परिणाम के विषय में जानना चाहते हैं, उनके लिए इस कृति का अध्ययन मात्र ही पर्याप्त है।

    ग्रह योग संक्षेपिका को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है–1. विविध योग, 2. धन योग, 3. विवाह योग, 4. संतान योग, 5. आयु योग, 6. भवन एवं वाहन योग, तथा 7. विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा योग।

    ग्रह योग संक्षेपिका ग्रहयोगों पर केन्द्रित एक सम्पूर्ण व सरल कृति है जिसके अध्ययन से किसी भी जन्मांग में निर्मित होने वाले अन्यान्य ग्रहयोगों को रेखांकित करना सुगम है। अतः यह समस्त प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों तथा विद्वान ज्योतिर्विदों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।

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  • ग्रहफल विचारप्लूटो नेपच्यून व यूरेनस सहित

    पुस्तक एक दृष्टि में
    बहुधा ग्रह अपने नैसर्गिक कारकत्व के साथ, जिस भाव में बैठें या जिस भाव के स्वामी हों उनका फल देते हैं। अतः पुस्तक का आरंभ व समापन भाव विवेचन से हुआ है। देखें पृष्ठ 1-18 व परिशिष्ट पृष्ठ 275-278।
    अध्याय दो में भाव विचार के नियम (भाव संबंधी शुभता-अशुभता का बोध) तो परिशिष्ट 2, में भावेश की भाव गत स्थिति का फल दिया है। देखें पृष्ठ 19-30, तथा पृष्ठ 279-295।

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