होरा शतक
₹160.00₹200.00
विविध ग्रन्थों का सार मात्र सौ श्लोकों में समेटना निश्चय ही उत्कृष्ट विद्या और अनुभव को दर्शाता है। ‘होरा शतक’ भी एक ऐसी ही विद्वतापूर्ण रचना है।
विविध ग्रन्थों का सार मात्र सौ श्लोकों में समेटना निश्चय ही उत्कृष्ट विद्या और अनुभव को दर्शाता है। ‘होरा शतक’ भी एक ऐसी ही विद्वतापूर्ण रचना है।
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शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
गीता मंत्र गंगोत्री
₹290.00श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियों के लिए प्रार्थना पथ नहीं, बल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमद्भगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायः अधिकांश भक्तजन, साधक, आराधक, पाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एवं उसकी व्याख्या, गीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप में सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामों से शीर्षांकित किया गया है:
₹350.00 -
बृहस्पति दशा फलदीपिका
₹320.00महादशा में हम स्वबाहुबल द्वारा अपार धन, यश, कीर्ति, वैभव, समृद्धि, सम्मान, पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित करेंगे।
समय व्यतीत होता चला गया और बृहस्पति की महादशा के 16 वर्ष भी व्यतीत हो गए तथा हम पूरी बृहस्पति की महादशा पर्यन्त भीख ही माँगते रहे। हमारे सामने आर्थिक विषमता की ऐसी-ऐसी स्थितियाँ आयीं कि हमें आठ-आठ दिन तक भोजन भी उपलब्ध नहीं हुआ। अत्यन्त विपन्नता ने हमारे आत्मविश्वास को झकझोर कर रख दिया। तब हमें ज्ञात हुआ कि बृहस्पति धन और समृद्धि नहीं प्रदान करता है। इन 16 वर्षों में हमने ज्योतिष शास्त्र का गहन अध्ययन किया और ज्योतिष शास्त्र की हिन्दी और अंग्रेजी की लगभग सभी पुस्तकों का मनन, चिन्तन किया, जो बाद में हमारे बहुत काम आया। हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बृहस्पति धन नहीं, बल्कि ज्ञान देता है। बृहस्पति दशाफल दीपिका के अन्तर्गत हमने दशाफल अध्ययन हेतु जो शोध सिद्धान्त प्रस्तुत किए हैं, उनके अध्ययन और क्रियान्वयन से हमारे प्रबुद्ध पाठकगण ऐसे अन्यान्य तथ्यों को भलीभांति समझ सकेंगे।
₹400.00 -
ग्रह योग संक्षेपिका
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ग्रहयोगों की महत्ता का अनुमान कोई प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमी ही लगा सकता है। कितने ही जन्मांगों का गहन विश्लेषण करने पर भी, उनके मध्य सन्निहित मर्म को तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक ग्रहयोगों और उनके परिणाम का सम्यक् ज्ञान न हो। डा. राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं नरेन्द्र मोदी आदि के अत्यंत साधारण दिखने वाले जन्मांगों का रहस्य ग्रहयोगों के संज्ञान के अभाव में कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता है। वस्तुतः ग्रहयोग ज्योतिष शास्त्र की आत्मा है। ग्रहयोगों की उपेक्षा करके जन्मांग में छिपे रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता चाहे ग्रह स्थितियों, उनके बलाबल, दृष्टि, युति, स्वामित्व, नक्षत्र, राशि, भाव आदि की कितनी भी व्याख्या की जाए। ग्रहों का अपनी उच्च या नीच राशि में स्थित होना, अनुकूल फल प्रदान करेगा या प्रतिकूल, यह ग्रहयोगों पर निर्भर करता है। प्रायः देखने में आता है कि जिन जन्मांगों में छह ग्रह भी अपनी उच्च राशि में स्थित हैं, वह नितांत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं; तथा जिनके जन्मांगों में अनेक नीच राशिस्थ ग्रह हैं, वह सतह से उठकर शिखर तक पहुँचे हैं। इसका रहस्य तभी स्पष्ट हो सकता है जब ग्रहयोगों के सम्यक् संज्ञान एवं सटीक क्रियान्वयन का अनुमान हो।
ग्रह योग संक्षेपिका के अध्ययन, अनुसंधान व अभ्यास के साथ-साथ ग्रहयोगों के मनन, चिंतन और मंथन में अत्यन्त सुगमता होगी। जो जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमी एक दृष्टि में ग्रहयोगों को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक शीघ्र संदर्भित पुस्तिका के समतुल्य है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अथक चेष्टा की है कि कोई भी ग्रहयोग, जो किसी भी ग्रहयोग से सम्बन्धित कृति में सन्निहित है, वह इस कृति के अन्तर्गत अवश्य उपलब्ध हो। लगभग 1200 ग्रहयोगों का संदर्भ, उनकी परिभाषा एवं परिणाम इस कृति का वैशिष्ट्य है। प्रबुद्ध और प्रखर ज्योतिष प्रेमियों को, जो मात्र योग की संरचना एवं उनके परिणाम के विषय में जानना चाहते हैं, उनके लिए इस कृति का अध्ययन मात्र ही पर्याप्त है।
ग्रह योग संक्षेपिका को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है–1. विविध योग, 2. धन योग, 3. विवाह योग, 4. संतान योग, 5. आयु योग, 6. भवन एवं वाहन योग, तथा 7. विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा योग।
ग्रह योग संक्षेपिका ग्रहयोगों पर केन्द्रित एक सम्पूर्ण व सरल कृति है जिसके अध्ययन से किसी भी जन्मांग में निर्मित होने वाले अन्यान्य ग्रहयोगों को रेखांकित करना सुगम है। अतः यह समस्त प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों तथा विद्वान ज्योतिर्विदों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।
₹400.00 -
जातकसारावलीपंचम भाव
₹370.00ग्रन्य-परिचय
संतति-सुख के अभाव में, दाम्पत्य सुख की सम्पूर्णता सदा ही संदिग्ध रहती है।
सन्तान भविष्य की नियामक होने के साथ-साथ, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के मध्य निर्मित होने वाले सुन्दर समीकरण का स्वर्णिम सुदीप है। संतति-सुख के विविध पक्षों की शास्त्रानुमोदित व्याख्या तथा फलादेश के प्रमाणित, परीक्षित तथा प्रतिष्ठित सूत्रों के संतुलित समायोजन के साथ-साथ, पंचम भावगत नवग्रहों के फलाफल का विस्तृत विवेचन एवं संदर्भित सूत्रों की प्रामाणिकता को विविध जन्मांगों की व्याख्या द्वारा इस कृति में सिद्ध किया गया है। पुत्र और पुत्रियों की संख्या, संततिहीनता अथवा दत्तक संतति सम्बन्धी ग्रहयोगों को विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
पंचम भाव से बुद्धि की प्रखरता, ज्ञान की दिशा, रचनात्मकता, कलात्मकता, बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति, शिक्षा, विद्वत्ता, बौद्धिक कौशल, प्रेम सम्बन्धों की सफलता अथवा विफलता तथा संतति सुख का उल्लास एवं संततिहीनता के संत्रास आदि के अनुमान से संदर्भित विविध दुर्लभ सूत्र, जातक सारावली-पंचम भाव का वैशिष्ट्य है।
जातक सारावली-पंचम भाव अग्रांकित अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित है-1. पंचम भावगत राशियाँ, तथ्य एवं तत्त्व आदि; 2. पंचमेश की विभिन्न भावस्थिति के अनुसार फल; 3. विभिन्न भावेशों के पंचम भावगत होने तथा ग्रहों की दृष्टि का समीकरण; 4. पंचम भाव से सम्बद्ध विशिष्ट शोध सिद्धान्त; 5. पंचम भावगत सूर्य का फल; 6. पंचम भावगत चन्द्रमा का फल; 7. पंचम भावगत मंगल का फल; 8. पंचम भावगत बुध का फल; 9. पंचम भावगत बृहस्पति का फल; 10. पंचम भावगत शुक्र का फल; 11. पंचम भावगत शनि का फल; 12. पंचम भावगत राहु का फल; 13. पंचम भावगत केतु का फल; 14. पंचम भाव बौद्धिक प्रखरता एवं शिक्षा; 15 पंचम भाव से संदर्भित कतिपय विशेष ग्रहयोग; 16 पुत्र सुखः परिज्ञान एवं परिणाम; 17. मुख्यतः कन्याओं के जन्म हेतु ग्रहयोग; 18. सन्तानहीनता एक अभिशाप; 19. दत्तक पुत्र हेतु ग्रहीय आयाम तथा 20. पंचमेश की महादशा का फल।
जातक सारावली-पंचम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने ‘गागर में सागर’ भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
जातकसारावलीप्रथम भाव
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ज्योतिष शास्त्र के अभिनव अभिज्ञान के अन्यान्य शोध सिद्धान्तों के अभ्युदय के इस अभियान के रत्नमण्डित सोपान के प्रथम सुरमित सूत्र परिज्ञान को जातक सारावली-प्रथम *भाव से शीषांकित किया गया है। इसके अंतर्गत समस्त ज्योतिष शास्त्रों के सौरभूत सिद्धांतों एवं शोध सूत्रों के सम्यक् संकलन की अनिवार्यता सभी ज्योतिष प्रेमी अनादि काल से अनुभव करते रहे हैं जिसका आचार्यानुमोदित समाधान कृति की संरचना का सार्वभौमिक, सार्वलौकिक प्रयोजन है।
भारतवर्ष के बहुप्रतिष्ठित ज्योतिर्विद श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने विविध ग्रन्थों एवं ज्योतिष शास्त्रों से स्वर्णिम सिद्धान्तों का सतर्कतापूर्वक चयन एवं संकलन करके इस कृति में सुंदर स्वरूप में सुव्यवस्थित व समायोजित किया है ताकि प्रखर जिज्ञासुओं व समस्त ज्योतिष प्रेमियों को एक ही स्थल पर अधिकाधिक ज्योतिष शास्त्र का तलस्पर्शी संज्ञान उपलब्ध हो सके और सत्य व सटीक भविष्यकथन करने में सफलता प्राप्त हो।
ग्रहों की विविध भाव स्थिति, भावाधिपति की पृथक् पृथक् भाव स्थिति का फल, विभिन्न भावों के स्वामियों के लग्नगत होने का परिणाम, लग्नगत ग्रहों के साथ अन्य ग्रहों की युति तथा दृष्टि आदि का सम्यक् विवेचन इस कृति का वैशिष्ट्य है।
कृति को बारह अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण भागों में विभाजित, व्याख्यायित तथा अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित किया गया है- 1. ग्रहीय आयाम एवं राशि चक्र, 2. ज्योतिष शास्त्र के सारभूत सूत्र, 3. फलित ज्योतिष के स्वर्णिम सिद्धान्त, 4. नवांश : सन्निहित यथार्थ, 5. प्रथम भाव फल निर्णय, 6. समय संज्ञान एवं समीक्षा, 7. शनि-शुक्र अथवा शुक्र-बृहस्पति की दशान्तर्दशा, 8. लग्न में नवग्रहों की स्थिति के अनुसार फलाफल, 9. लग्नगत विभिन्न राशियों का फलाफल, 10. लग्नेश के भिन्न-भिन्न भावगत होने का फलाफल, 11. लग्न में विभिन्न ग्रह युति फल, तथा 12. प्रमाणित, प्रतिष्ठित एवं परीक्षित प्रयोग।
जातक सारावली-प्रथम भाव के अन्तिम अध्याय में ज्योतिष शास्त्र के सौ से अधिक ऐसे ज्ञातव्य शोध सूत्रों को प्रस्तुत किया गया है जो कदाचित अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। यह सिद्धान्त सूत्र, भविष्यकथन में आश्चर्यजनक सत्यता, सूक्ष्मता, सतर्कता, सहज ही परिलक्षित करते हैं।
जातक सारावली-प्रथम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने गागर में सागर भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। जातक सारावली-प्रथम भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
राहु केतु
₹210.00श्री कृष्ण कुमार द्वारा लिखित ज्योतिष और रोग पर यह ग्रन्थ मेरे हाथों में है। इसका विहंगम अध्ययन यह सिद्ध करने के लिये काफी है कि इसमें प्रयुक्त विभिन्न
सिद्धान्तों का संकलन भिन्न-भिन्न शास्त्रों से किया गया है तथा इसमें काफी प्रयत्न तया परिश्रम किया गया है।₹250.00 -
परिणय निर्णयमंगली योगः विविध संयोग
₹320.00वस्तुतः मंगली योग की विभिन्न सकारात्मक, नकारात्मक एवं अपवादपरक स्थितियों से प्रायः पाठकगण ही नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिर्विद भी अनभिज्ञ हैं जो त्रुटिपूर्ण जन्मांग मिलान का हेतु है। मंगली योग से संदर्भित अज्ञानता इस तथ्य से ही परिलक्षित होती है कि अनेक अवसरों पर मंगली कन्या का विवाह अमंगली युवक के साथ सम्पन्न होता है परन्तु उनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धिशाली होता है। जबकि मंगलीदोष के सटीक मिलान के पश्चात् संपादित किए जाने वाले अनेक विवाह प्रायः असफल हो जाते हैं और करुणापूर्ण तथा भयावह विकृति, वैधव्य अथवा विवाह विच्छेद का आधार निर्मित करते हैं। सत्यता यह है कि मंगली दोष के विषय में भारी भ्रांति और भ्रमपूर्ण तथ्य समाज में प्रचलित और प्रतिष्ठित हैं जिनका तलस्पर्शी विश्लेषण, विवेचन कदाचित मंगली दोष सन्निहित यथार्थ एवं मंगली योग: विविध संयोग नामक कृतियों के अतिरिक्त अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। मंगली दोष के विषय की अनभिज्ञता ने ही भारतवर्ष के बहुप्रशंसित, 85 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों के रचनाकार श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने इस विषय की अनिवार्यता को समझा और इन दोनों कृतियों के अन्तर्गत शताधिक जन्मांगों के माध्यम से समस्त ज्योतिष प्रेमियों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। इस कृति को अग्रांकित 11 भिन्न-भिन्न अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित किया गया है –
1. मंगली योग : विविध संयोग; 2. मंगली दोष पर सूर्य का प्रभाव शोध संज्ञान; 3. मंगली दोष पर चन्द्रमा का प्रभाव शोध संज्ञान; 4. मंगली दोष पर बुध का प्रभाव : शोध संज्ञान; 5. मंगली दोष पर बृहस्पति का प्रभाव शोध संज्ञान; 6. मंगली दोष पर शुक्र का प्रभाव : शोध संज्ञान; 7. मंगली दोष पर शनि का प्रभाव शोध संज्ञान; 8. मंगली दोष पर राहु का प्रभाव शोध संज्ञान; 9. मंगली दोष पर केतु का प्रभाव : शोध संज्ञान; 10. महिलाओं हेतु अष्टम भावस्थ मंगल अशुभ परिणाम, तथा 11. मंगलीदोष से रक्षार्थ परिहार विधान।
उल्लेखनीय है कि मंगली दोष के शुभ अथवा अशुभ फल में विविध ग्रहयोगों के कारण वृद्धि अथवा न्यूनता उत्पन्न होती है तथा इस संदर्भ में कदाचित संपुष्ट शोध प्रस्तुत किए जाने का यह प्रथम अवसर है। मंगली दोष पर विविध ग्रहों के प्रभाव से वैवाहिक सुख की स्थिति पूर्णतः रूपांतरित, परिवर्तित अथवा परिमार्जित हो जाती है। इस मर्म को अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मंगली योगः विविध संयोग शीर्षांकित इस कृति में प्रस्तुत किया गया है। मंगली दोष के शमन हेतु अद्भुत एवं अनुभूत मंत्रप्रयोग तथा परिहार विधान कृति का अतिरिक्त आकर्षण है जिसके अनुसरण से लाखों मंगली जातक / जातिकाएं लाभान्वित हुए हैं।
समस्त ज्योतिष प्रेमियों के संज्ञान संवर्द्धन हेतु तथा मंगली दोष के निहितार्थ के तलस्पर्शी अध्ययन हेतु यह कृति पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।₹400.00










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