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ग्रन्थ-परिचय
व्यावसायिका जीविकोपार्जन के सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोपयुक्त माध्यम का ज्योतिष सुलभ स्वर्णिम सिद्धान्त और सशक्त सूत्र तथा सारस्वत संज्ञान द्वारा धनार्जन के विधि-विधान व प्रावधान का पूर्वानुमान करके तदनुसार उपयुक्त शिक्षार्जन की ओर प्रशस्त व गतिशील होकर उपयुक्त व्यवसाय चयन हेतु गहन चिंतन-मनन की गणना का अलौकिक आधारस्तम्भ है। व्यवसाय का निर्धारण, जीविकोपार्जन की उपयुक्त दिशा और बालक की प्रतिभा की गति, मति, प्रगति एवं उन्नति आदि पर विचार करने में, सदा शीघ्रता करना अपेक्षित है और यही ज्योतिष शास्त्र की वास्तविक उपयोगिता है कि व्यवसाय की व्यवस्था, उचित वय में ही की जा सके। जन्मांग के आधार पर ग्रहों की स्थिति के अनुसार उपयुक्त व्यवसाय का सटीक निर्धारण करने हेतु ही व्यावसायिका की संरचना हुई है।
दशम भावगत ग्रह और दशमेश के नवांशाधिपति, दशम भाव पर दृष्टि निक्षेप करने वाले ग्रह तथा दशमेश से संयुक्त ग्रह आदि द्वारा व्यवसाय की दिशा का संकेत प्राप्त होता है। खेद का विषय है कि इस दिशा में किये गये शोध कार्यों से अधिकांश ज्योतिष प्रेमी अनभिज्ञ हैं। संप्रति व्यवसाय की अनगिनत शाखाओं ने, उसकी सीमा का इतना अधिक विस्तार किया है जिसे लिपिबद्ध किया जा सकना संभव नहीं है परन्तु व्यवसाय के चंचल, चटुल प्रवाह में अवगाहन करके कतिपय मूल्यवान रत्न खोजकर, उन्हें अनुभव के निकष पर संस्कारित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत करने का दुःसाध्य अनुसंधान, इस कृति के स्वच्छ, स्पष्ट एवं पावन पीयूष में संचित और संकलित है। व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय, तृतीय, अष्टम, नवम, दशम भाव, लग्न के अतिरिक्त विविध ग्रहयोगों की भूमिका की उपेक्षा करने से त्रुटिपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार अनेक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनका गहन आकलन इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
ज्योतिष शास्त्र के हिंदी पाठकों के निरंतर आग्रह ने यशस्वी ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व श्री टी.पी. त्रिवेदी को इस विषय पर प्रमाणित व सारगर्भित संरचना व्यावसायिका के लेखन हेतु विवश किया। यह कृति अन्यान्य शोधपरक अध्यायों में व्याख्यायित है जिनके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, अभियन्ता, अधिवक्ता, लेखाकार, कलाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, खिलाड़ी, बैंककर्मी, भविष्यवक्ता, वैज्ञानिक, पुलिस एवं रक्षा, प्रबंधन, अध्यापन, व्यापार, लेखक, कवि, संत, संन्यासी, महर्षि आदि विविध व्यवसाय निर्धारण हेतु उपयुक्त ग्रहयोगों की विस्तृत व्याख्या तथा अन्यान्य उदाहरण प्रस्तुत किए गये हैं। यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है जिसके फलस्वरूप प्रबुद्ध पाठकगण विविध व्यवसायों से सम्बन्धित भविष्यकथन करने में सिद्धहस्त हो सकते हैं।
ग्रन्थ-परिचय
व्यावसायिका जीविकोपार्जन के सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोपयुक्त माध्यम का ज्योतिष सुलभ स्वर्णिम सिद्धान्त और सशक्त सूत्र तथा सारस्वत संज्ञान द्वारा धनार्जन के विधि-विधान व प्रावधान का पूर्वानुमान करके तदनुसार उपयुक्त शिक्षार्जन की ओर प्रशस्त व गतिशील होकर उपयुक्त व्यवसाय चयन हेतु गहन चिंतन-मनन की गणना का अलौकिक आधारस्तम्भ है। व्यवसाय का निर्धारण, जीविकोपार्जन की उपयुक्त दिशा और बालक की प्रतिभा की गति, मति, प्रगति एवं उन्नति आदि पर विचार करने में, सदा शीघ्रता करना अपेक्षित है और यही ज्योतिष शास्त्र की वास्तविक उपयोगिता है कि व्यवसाय की व्यवस्था, उचित वय में ही की जा सके। जन्मांग के आधार पर ग्रहों की स्थिति के अनुसार उपयुक्त व्यवसाय का सटीक निर्धारण करने हेतु ही व्यावसायिका की संरचना हुई है।
दशम भावगत ग्रह और दशमेश के नवांशाधिपति, दशम भाव पर दृष्टि निक्षेप करने वाले ग्रह तथा दशमेश से संयुक्त ग्रह आदि द्वारा व्यवसाय की दिशा का संकेत प्राप्त होता है। खेद का विषय है कि इस दिशा में किये गये शोध कार्यों से अधिकांश ज्योतिष प्रेमी अनभिज्ञ हैं। संप्रति व्यवसाय की अनगिनत शाखाओं ने, उसकी सीमा का इतना अधिक विस्तार किया है जिसे लिपिबद्ध किया जा सकना संभव नहीं है परन्तु व्यवसाय के चंचल, चटुल प्रवाह में अवगाहन करके कतिपय मूल्यवान रत्न खोजकर, उन्हें अनुभव के निकष पर संस्कारित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत करने का दुःसाध्य अनुसंधान, इस कृति के स्वच्छ, स्पष्ट एवं पावन पीयूष में संचित और संकलित है। व्यवसाय निर्धारण में द्वितीय, तृतीय, अष्टम, नवम, दशम भाव, लग्न के अतिरिक्त विविध ग्रहयोगों की भूमिका की उपेक्षा करने से त्रुटिपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार अनेक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनका गहन आकलन इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
ज्योतिष शास्त्र के हिंदी पाठकों के निरंतर आग्रह ने यशस्वी ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व श्री टी.पी. त्रिवेदी को इस विषय पर प्रमाणित व सारगर्भित संरचना व्यावसायिका के लेखन हेतु विवश किया। यह कृति अन्यान्य शोधपरक अध्यायों में व्याख्यायित है जिनके अंतर्गत भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, अभियन्ता, अधिवक्ता, लेखाकार, कलाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, खिलाड़ी, बैंककर्मी, भविष्यवक्ता, वैज्ञानिक, पुलिस एवं रक्षा, प्रबंधन, अध्यापन, व्यापार, लेखक, कवि, संत, संन्यासी, महर्षि आदि विविध व्यवसाय निर्धारण हेतु उपयुक्त ग्रहयोगों की विस्तृत व्याख्या तथा अन्यान्य उदाहरण प्रस्तुत किए गये हैं। यह शोध प्रबन्ध समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु पाठकों, प्रबुद्ध छात्रों एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्विदों द्वारा पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है जिसके फलस्वरूप प्रबुद्ध पाठकगण विविध व्यवसायों से सम्बन्धित भविष्यकथन करने में सिद्धहस्त हो सकते हैं।
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