भारतीय ज्योतिषऔर मौसम विज्ञान
₹140.00₹150.00
भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की ऋतुओं में कृषि की दृष्टि से वर्षा ऋतु अधिक उपयोगी मानी जाती है। कब पानी बरसेगा, कब नहीं बरसेगा का ज्ञान होते रहने पर ही किसान कृषि कार्यों के सम्बन्ध में अधिक सतर्क रह सकते हैं। अन्य ऋतुओं के दैनन्दिन पर्यवेक्षण से आगामी वर्षा का अधिकांश ज्ञान सम्भव है। भारतीय आचार्यों ने ऋतु-सम्बन्धी वर्षा, वायु, मेघ और आकाशीय विद्युत आदि के विषय में अनुसन्धान करके अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया है, जो संस्कृत वाङ्मय में यत्र-तत्र मिलते हैं। बृहत् संहिता, मेघमाला और बृहदैवज्ञरंजन आदि ग्रन्थों में वह संग्रह रूप में भी उपलब्ध है। भारत की प्रत्येक भाषा में थोड़ी-बहुत ऋतु-सम्बन्धी कहावतें भी प्रचलित हैं। हिन्दी साहित्य में ऋतु-सम्बन्धी कहावतों के लिए घाघ, राउत और भड्डरी आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इनकी ऋतु-सम्बन्धी कहावतें बहुधा सत्य सिद्ध होती हैं।
‘भारतीय ज्योतिष और मौसम विज्ञान’ इन्होंने इस पुस्तक में अपने अनुसन्धानों और ऋतु-सम्बन्धी विवरणों का तुलनात्मक अध्ययन किया है और उपलब्ध प्राचीन साहित्य के आधार पर यह पुस्तक तैयार की है। इस पुस्तक में उद्धृत श्लोकों का हिन्दी अनुवाद क्रमशः पुस्तक के अन्त में दिया गया है जिससे कि पाठकों को सुविधा हो। यह छोटा-सा ग्रन्थ, आशा है, हिन्दी के पाठकों को रुचिकर और उपयोगी प्रतीत होगा।
आचार्य भास्करानंद लोहानी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
भारद्वाज गोत्रीय कान्यकुब्ज उपाध्याय ब्राहम्ण । पूर्वज चन्दशासन में राजगुरू, जयचन्द के पतन के बाद उनके वंशधरों के साथ प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग) में बसे, सन् 1489 में श्री श्रीवल्लभ उपाध्याय जयचन्द के वंशधरों को साथ लेकर उत्तराखण्ड पधारे और वहाँ सत्ता में प्रतिष्ठापित किया। सिद्ध महापुरूष श्री श्रीवल्लभ जी की अलौकिक शक्तियों का वर्णन मि. वाल्टन I.C.S. और मि. अठकिन्शन के अल्मोड़ा गजेटियरों में (भाग 35, पृष्ठ 262 और भाग 12, पृष्ठ 425-26 में) है। ‘लोहानी’ ज्ञाति नहीं राज्य से प्राप्त उपाधि है, मन्त्रशक्ति से लोहाशस्त्रागार भस्म कर देने से ‘लोहहोमी’ ‘कलमटिया’ पर्वत इसका साक्षी है। (अब अपभ्रंश में ‘लोहानी’ कुछ पूर्वजों को ‘पाण्डे’ (पाण्डित्य कार्य से) और कुछ को ‘काण्डपाल’ (वेदों के काण्डों के ज्ञाता) उपाधिप्राप्त ।
उत्तराखण्ड में सन् 1489 से 1815 तक पूर्वज चन्द, गोरखा व कल्यूरी शासकों के राजगुरू रहे, किन्तु सत्ता से दूर। चन्द राज्य से प्राप्त सत्तर वादियों (आलियों) का
क्षेत्र सत्तर + आलि = ‘सत्राली’ पैतृक आवास ।
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योग पारिजातअनुपम योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
योग पारिजातभाग्य योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
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योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
मंत्र मंदाकिनी
₹320.00मंत्र मंदाकिनी में समस्त सामान्य समस्याओं के सुगम समाधान का शास्त्रसंगत उल्लेख किया गया है जिसमें शताधिक मंत्रों में से, स्वयं के लिए अनुकूल मंत्र चयन की दुष्कर प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। प्रत्येक अभीष्ट की संसिद्धि हेतु पूर्ण परिहार प्रदान करने हेतु पृथक् पृथक् परामर्श प्रपत्र का प्रबल पथ मंत्र मंदाकिनी में प्रस्तुत किया गया है। ये सभी परिहार, अनुष्ठान अथवा प्रयोग दीर्घकाल से लेखकद्वय द्वारा परीक्षित हैं तथा सहस्राधिक अवसरों पर अभिशंसित, प्रशंसित और चर्चित हुए हैं जिनसे प्राप्त परिणाम के प्रमाण और परिमाण से साधक व पाठकगण निरन्तर प्रेरित, आनन्दित, आह्ह्लादित, हर्षित और उल्लसित हुए हैं।
मंदाकिनी मंत्र के 19 अध्यायों में विभाजित है जिसमें मंत्र शक्ति के अद्भुत प्रभाव का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है-1. मंत्रः वैज्ञानिक व्याख्या; 2. मंत्र विज्ञानः विविध विभाग, 3. ग्रह शांतिः 4. विवाहसंबंधी समस्याएं एवं समाधान; 5. संतति सुखः परिहार परिज्ञान; 6. निकृष्ट ग्रह योग कृत निषेध शमन, 7. प्रचुर धनप्राप्ति अनुभूत साधनाएँ: 8. शत्रु शमन तथा प्रतिद्वंदी शमन; 9. व्याधि शमनः स्वास्थ्यवर्धन; 10. परीक्षा और प्रतियोगिता में सर्वोच्च सफलता; 11. सभी दोस्तों को निर्मूल मन की संस्तुति; 12. इलेक्ट्रोइलेक्ट्रॉनिक वृत्तान्तः 13. विस्तृत व्रतविधान; 14. दान अनुष्ठानः श्रेष्ठ परिहार प्रार्थनाएँ: 15. श्रीदुर्गासप्तशती सन्निहित उपासनाएँ: अभीष्ट संसिद्धि साधनाएँ: 16. अन्यान्य प्रार्थनाओं के समाधान जिज्ञासा एवं सुगमता साकेतिक साधनाएँ: 17. सुखद दाम्पत्य उपासना उपासना साकेतिक साधनाएँ: 18. मानस मंत्र साधना; 19. षट्कर्म प्रयोग। ज्योतिष एवं मंत्र विज्ञान के गूढ़ रहस्य सभी ज्योतिष प्रेमी एवं मंत्र अध्येताओं के अध्ययन एवं अनुसंधान के निमित्त मंत्र मंदाकिनी एक अमूल्य निधि है।
₹400.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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चद्र दशा फलदीपिका
₹400.00चन्द्रमा अनादि काल से सौन्दर्य का प्रतीक स्वीकारा गया है। चन्द्रमा के दर्शन मात्र से जीवन की अनेक क्लिष्ट स्थितियों के समाधान का पथ प्रशस्त होता है। दर्शन करने में चन्द्रमा जितना निर्मल कोमल और स्वच्छ प्रतीत होता है, वास्तव में देह उतना ही जटिल है। चन्द्रमा के महत्व को समझना सुगम है परंतु उसके वास्तविक फलाफल का सटीक विवेचन अधिक दुःसाध्य है। पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करने वाला चन्द्रमा, पृथ्वीवासियों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है इसीलिए चन्द्रमा को जन्मांग का प्राप्ण घोषित किया गया है। चन्द्रमा का बलाबल और स्थिति ही जन्मांग की प्रबलता या निर्बलता का आधार है। चन्द्रमा की विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित अनुकूल-प्रतिकूल फलाफल का तलस्पर्शी अध्ययन और उसके क्रियान्वयन हेतु अनेक शोधपरक सिद्धान्तों तथा विशिष्ट सूत्रों का उपयुक्त समायोजन चन्द्र दशाफल दीपिका में किया गया है ताकि चन्द्रमा की दशान्तर्दशा के अन्तर्गत होने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं का सटीक आकलन किया जाना संभव हो सके।
इस कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है जिनके अध्ययन से चन्द्रमा की महादशा व अंतर्दशा के विषय में सम्यक् संज्ञान प्राप्त करके सटीक भविष्यकथन किया जा सकता है: 1. ग्रहस्थिति एवं फलकथन, 2. भावगत दशाफल विवेचन, 3. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रग्रह का महत्व, 4. विविध भावगत चन्द्रमा की दशा का फल, 5. बारह जन्म राशियों का फल. 6. बारह राशियों में चन्द्रमा का फल, 7. लग्न फल, 8. विविध लग्नों के लिए भावगत चन्द्रमा का फल. 9. चन्द्रमा की महादशा का संभावित फलाफल, 10. चन्द्रमा की महादशा का फल, 11. चन्द्रमा की महादशा के मध्य अंतर्दशाओं का फल, तथा 12. चन्द्र पीड़ा परिहार विधान।
यह एक व्यावहारिक और ज्योतिष शास्त्र पर केन्द्रित शताधिक शोध प्रबन्धों के रचनाकार ज्योतिर्विदों का प्रथम प्रयास है कि विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित प्रत्येक ग्रह की महादशा और अंतर्दशाओं का इतना वृहद, संपुष्ट और अनुभूत फलकथन दशाफल दीपिका की श्रृंखला के अंतर्गत किया जाना संभव हो सका। सर्वविदित है-कि विश्व में सबसे अधिक उपयोग विंशोत्तरी दशाओं का ही होता है इसलिए इस दशाफल दीपिका श्रृंखला को विंशोत्तरी दशाओं तक ही सीमित रखा गया है। विश्वास है कि विंशोत्तरी दशाफल से सम्बन्धित कृति के अध्ययन की आंकाक्षा व समस्त दशाओं की संरचना के परिणाम से सम्बन्धित जिज्ञासा का सशक्त सारभूत व सारगर्भित समाधान है चन्द्र दशाफल दीपिका जो प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रो व ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹500.00 -
समृद्धि सूत्रVol 2
समृद्धि सूत्र’ ज्योतिष की मात्र सामान्य संरचना न होकर समृद्धि से सम्बन्धित प्रथम शास्त्रानुमोदित विस्तृत शोध प्रबन्ध है; कालांतर में जिसकी प्रशंसा, प्रतिष्ठा, परिचर्चा तथा गणना ज्योतिष के श्रेष्ठ शास्त्रों में सम्मिलित की जायेगी। समृद्धि से सम्बन्धित यह कृति स्वर्णिम शोध प्रस्तुत करने वाला माता लक्ष्मी का प्रसादामृत है जिसमें समृद्धि से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान सन्निहित है। ऐसे शोध प्रबन्ध की अनिवार्यता ने, जिसमें जन्मांग में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोगों के अध्ययन, अनुसंधान और अनुभूति के आधार पर जातक की समृद्धि एवं सम्पन्नता की परिसीमा का सशक्त संज्ञान एवं सटीक अनुमान उपलब्ध हो सके तथा समृद्धि पथ के आरोह अवरोह, उन्नति अवनति, स्थिरता अथवा अस्थिरता के पूर्णतः स्पष्ट एवं सम्यक् संज्ञान का सारस्वत, शाश्वत सूत्र स्थापित हो सके, उसके निमित्त शास्त्रानुकूल वेदविहित समग्र ग्रन्थगर्भित सूत्रों का सतत्, सतर्क, सघन, सबल अध्ययन और अनुसंधान का अनुकरण करके, उस विशुद्ध प्रतिष्ठित, प्रामाणिक, प्रशंसित प्राञ्जल प्रारूप को ‘समृद्धि सूत्र’ से शीर्षांकित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध जिज्ञासुओं, शोध छोत्रों तथा शास्त्रान्वेषियों के संसुप्त संज्ञान की जागृति हेतु अभिनव अभियान के पावन पथ के सुदृढ़ एवं सुरुचिपूर्ण सेतु का निर्माण सम्पन्न किया गया है, जो अनेक वर्षों की सघन साधना के उपरान्त अब आपके कर कमलों में सुशोभित है।
‘समृद्धि सूत्र’ का आधार स्तम्भ ज्योतिष के सारगर्भित शास्त्र हैं जिनमें ऋषि-महर्षि ने अपनी अन्तर्दृष्टि को एकाग्र करके, मानव के अर्थ कल्याण को ध्यान में रखते हुए धन, वैभव, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संपूर्ण स्वर्णिम सिद्धांत सूत्र के स्पष्ट वर्णन की है तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वृहत्पादक, मानसागरी, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, पूर्वकलामृत, ज्योतिष पारिजात, सारावली, ज्योतिषमार्ग, होरारत्न, जातितत्त्वम्, ज्योतिषतत्त्वम्, जातकाभरणम्, जातकालंकार, सर्वार्थ चिंतामणि, खेटकौतुकम्, वृद्धयवनजातक, जातक भूषणम्, होरासार, भृगुसूत्र, भावकौतुहलम्, जातकसारदीप, शम्भुहोराशास्त्र, फलमार्तण्ड, सत्यजातकम्, वृहद्द्योतिषसार, भावार्थ रत्नाकर तथा वृहदरत्नाकर आदि की संरचना। सभी ग्रंथों में धन, ऐश्वर्य, वैभव, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से लेकर सन्दर्भित मंदिरों तक 1100 टुकड़े, नौ खंड और दो खंडों में भंडारित और प्राचीन बताकर उनके दर्शन एवं प्रखर सुरुचिपूर्ण विवेचन, व्याख्या, विश्लेषण एवं विभाजन का वर्णन किया गया है।
‘समृद्धि सूत्र’ की व्याख्या जिन नौ खण्डों में की गई है, वे अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित हैं:- 1. लाभ भाव (एकादश भाव) 2. धन भाव (द्वितीय भाव) 3. भाग्य भाव (नवम भाव) 4. व्यय भाव (द्वादश भाव) 5. पूर्व पुण्य भाव (पंचम भाव) 6. धनयोग 7. निर्धन योग 8. सुख समृद्धि से संदर्भित शोध साधना एवं सम्बन्धित जन्मांगों की विस्तृत व्याख्या 9. धन, समृद्धि एवं सम्पन्नता से सम्बन्धित समय संज्ञान की प्रविधि।
समृद्धिशाली अथवा विपन्न होने के सन्दर्भ में सहस्राधिक सूत्रों को स्मरण रखना सामान्य पाठक के लिए संभव नहीं है। ‘समृद्धि सूत्र’ में अर्थवान् अथवा अर्थहीन बनने से सम्बन्धित विभिन्न ग्रन्थों में व्याख्यायित सहस्त्रों सूत्रों के विकल्प के रूप में एक शोध सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसके अनवरत अगाध अनुसंधान में लेखकद्वय का तीस वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हुआ। यह शोध सिद्धान्त, ‘समृद्धि सूत्र’ का सर्वस्व है। -
परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान
₹350.00समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
* परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।₹430.00 -
सूर्यदशा फलदीपिका
₹320.00ज्योतिष विज्ञान की महत्ता व समय की सत्ता के मध्य निर्मित होने वाले समीकरण की स्वर्णमण्डित शिला ही दशाफल दीपिका का सबलतम है जिसका रहस्य भारतीय ऋषि-मनीषियों ने अपनी योग साधना के बल पर समस्त मानवता के कल्याण हेतु समय-समय पर उद्घाटित किया था। ज्योतिष शास्त्र में विंशोत्तरी दशा सर्वाधिक विश्वसनीय व अनुकरणीय है। सूर्यग्रह की महादशा, अंतर्दशा व प्रत्यंतरदशा पर केंद्रित सूर्य दशाफल दीपिका नामक यह शोधप्रबन्ध दशान्तदंशा के संदर्भ में सत्य भविष्यकथन हेतु क्रांतिकारक सिद्ध होगा। इस सम्बन्ध में समस्त ज्योतिष ग्रन्थों में अनगिनत सूत्र उपलब्ध हैं जिनका उपयुक्त समन्वय व समायोजन कृति का सर्वस्व है। वस्तुतः यह कृति विंशोत्तरी दशाफल कथन करने की अद्भुत तकनीक का उत्कृष्ट प्रमाण है। विंशोत्तरी दशा के क्रियान्वयन से पूर्व ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थों में सन्निहित समस्त श्लोकों के मर्म को आत्मसात् करके उनके सटीक क्रियान्वयन करने की कला के अभ्यास के अभाव में जन्मांग के आधार पर भविष्य में होने वाली अनुकूल, प्रतिकूल घटनाओं के समय की घोषणा कदापि नहीं करनी चाहिए। दशाफल कथन की अविश्वसनीयता व अल्पज्ञान की सत्ता को देखकर लेखकों का मन करुण क्रन्दन कर उठा और उन्हें विंशोत्तरी दशा पर शोधपरक चिंतन व लेखन करने हेतु विवश किया।
सूर्य दशाफल दीपिका को अग्रांकित 12 अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है: 1. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व, 2. विंशोत्तरी दशाफल निर्णय, 3. दशाफल कथन हेतु कतिपय आवश्यक सूत्र, 4. नक्षत्र के आधार पर विंशोत्तरी दशा का फलकथन, 5. सूर्य की महादशा का फल. 6. विविध भावगत सूर्य की महादशा का फल, 7. बारह राशियों में सूर्य की दशा का फल, 8. उच्च-नीच आदि राशिगत सूर्य की दशा का फल, 9. सूर्य की महादशा में विविध ग्रहों की अंतर्दशा का फल, 10. सूर्य की महादशा में प्रत्यंतर दशाओं का फल, 11. सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण परिज्ञान एवं परिहार, तथा 12. सूर्य की महादशा की अनुकूलता हेतु अनुभूत व अद्भुत परिहार।
प्रबुद्ध पाठकों व जिज्ञासु छात्रों के प्रबल आग्रह पर कृति में परिहार का भी संयोजन किया गया है क्योंकि इसके अभाव में कृति की पूर्णता संदिग्ध थी। प्रबुद्ध पाठक व जिज्ञासु छात्र सूर्यग्रह पीड़ा परिहार के अध्ययन से अवश्य लाभान्वित होंगे। विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित शताधिक पुस्तकों के अध्ययन ने ही लेखकद्वय को प्रत्येक ग्रह की दशान्तर्दशा पर आधारित दशाफल श्रृंखला की पुस्तकों की संरचना हेतु प्रेरित किया ताकि विविध दशान्तर्दशाओं के विषय को अनुभव के निकष पर कस कर वास्तव में प्रतिफलित होने वाली घटनाओं के सम्यक् उल्लेख का समायोजन किया जा सके। विश्वास है कि सूर्य दशाफल दीपिका में विद्यमान सूत्रों का सटीक क्रियान्वयन शत-प्रतिशत सत्य भविष्यकथन करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होगा।
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