बुध दशाफल दीपिका”
₹350.00₹430.00
दशाफल दीपिका शीर्षांकित इस ग्रन्थ को हमने दस अध्यायों में व्याख्यायित, विश्लेषित और विवेचित करने की चेष्टा की है। “बुध दशाफल दीपिका” का प्रथम अध्याय बुध ग्रह : पौराणिक एवं वैज्ञानिक सत्य तथ्य पर केन्द्रित है। इस अध्याय में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि बुध ग्रह की वास्तविकता यह है कि वह नवग्रहों में सर्वाधिक लघु पिण्ड है परन्तु जन्मांग में बुध ग्रह की भूमिका की महिमा अनन्त है। बुध बुद्धि की क्षमता, बौद्धिक प्रखरता, तलस्पर्शी विवेचन, विश्लेषण, स्मरण शक्ति के स्थायित्व या निर्बलता के अतिरिक्त विश्व में
होने वाली समस्त शोध और अनुसंधानों के लिए उत्तरदायी ग्रह है। बुद्धि ही इस पृथ्वी को संचालित करती है और जन्मांग में बुध जितना प्रबल, विशुद्ध, पापरहित, शुभग्रहों से दृष्ट, शुभ ग्रहों की राशि, नवांश, नक्षत्र में संस्थिति और साथ ही साथ अपनी उच्च, स्वराशि या मूलत्रिकोण अथवा नवांश में स्थित होता है। जातक की बौद्धिक गरिमा उतनी ही अधिक प्रशंसित चर्चित होती है।
दशाफल दीपिका शीर्षांकित इस ग्रन्थ को हमने दस अध्यायों में व्याख्यायित, विश्लेषित और विवेचित करने की चेष्टा की है। “बुध दशाफल दीपिका” का प्रथम अध्याय बुध ग्रह : पौराणिक एवं वैज्ञानिक सत्य तथ्य पर केन्द्रित है। इस अध्याय में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि बुध ग्रह की वास्तविकता यह है कि वह नवग्रहों में सर्वाधिक लघु पिण्ड है परन्तु जन्मांग में बुध ग्रह की भूमिका की महिमा अनन्त है। बुध बुद्धि की क्षमता, बौद्धिक प्रखरता, तलस्पर्शी विवेचन, विश्लेषण, स्मरण शक्ति के स्थायित्व या निर्बलता के अतिरिक्त विश्व में
होने वाली समस्त शोध और अनुसंधानों के लिए उत्तरदायी ग्रह है। बुद्धि ही इस पृथ्वी को संचालित करती है और जन्मांग में बुध जितना प्रबल, विशुद्ध, पापरहित, शुभग्रहों से दृष्ट, शुभ ग्रहों की राशि, नवांश, नक्षत्र में संस्थिति और साथ ही साथ अपनी उच्च, स्वराशि या मूलत्रिकोण अथवा नवांश में स्थित होता है। जातक की बौद्धिक गरिमा उतनी ही अधिक प्रशंसित चर्चित होती है।
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परिणय निर्णयमंगली योगः विविध संयोग
₹320.00वस्तुतः मंगली योग की विभिन्न सकारात्मक, नकारात्मक एवं अपवादपरक स्थितियों से प्रायः पाठकगण ही नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिर्विद भी अनभिज्ञ हैं जो त्रुटिपूर्ण जन्मांग मिलान का हेतु है। मंगली योग से संदर्भित अज्ञानता इस तथ्य से ही परिलक्षित होती है कि अनेक अवसरों पर मंगली कन्या का विवाह अमंगली युवक के साथ सम्पन्न होता है परन्तु उनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धिशाली होता है। जबकि मंगलीदोष के सटीक मिलान के पश्चात् संपादित किए जाने वाले अनेक विवाह प्रायः असफल हो जाते हैं और करुणापूर्ण तथा भयावह विकृति, वैधव्य अथवा विवाह विच्छेद का आधार निर्मित करते हैं। सत्यता यह है कि मंगली दोष के विषय में भारी भ्रांति और भ्रमपूर्ण तथ्य समाज में प्रचलित और प्रतिष्ठित हैं जिनका तलस्पर्शी विश्लेषण, विवेचन कदाचित मंगली दोष सन्निहित यथार्थ एवं मंगली योग: विविध संयोग नामक कृतियों के अतिरिक्त अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। मंगली दोष के विषय की अनभिज्ञता ने ही भारतवर्ष के बहुप्रशंसित, 85 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों के रचनाकार श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने इस विषय की अनिवार्यता को समझा और इन दोनों कृतियों के अन्तर्गत शताधिक जन्मांगों के माध्यम से समस्त ज्योतिष प्रेमियों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। इस कृति को अग्रांकित 11 भिन्न-भिन्न अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित किया गया है –
1. मंगली योग : विविध संयोग; 2. मंगली दोष पर सूर्य का प्रभाव शोध संज्ञान; 3. मंगली दोष पर चन्द्रमा का प्रभाव शोध संज्ञान; 4. मंगली दोष पर बुध का प्रभाव : शोध संज्ञान; 5. मंगली दोष पर बृहस्पति का प्रभाव शोध संज्ञान; 6. मंगली दोष पर शुक्र का प्रभाव : शोध संज्ञान; 7. मंगली दोष पर शनि का प्रभाव शोध संज्ञान; 8. मंगली दोष पर राहु का प्रभाव शोध संज्ञान; 9. मंगली दोष पर केतु का प्रभाव : शोध संज्ञान; 10. महिलाओं हेतु अष्टम भावस्थ मंगल अशुभ परिणाम, तथा 11. मंगलीदोष से रक्षार्थ परिहार विधान।
उल्लेखनीय है कि मंगली दोष के शुभ अथवा अशुभ फल में विविध ग्रहयोगों के कारण वृद्धि अथवा न्यूनता उत्पन्न होती है तथा इस संदर्भ में कदाचित संपुष्ट शोध प्रस्तुत किए जाने का यह प्रथम अवसर है। मंगली दोष पर विविध ग्रहों के प्रभाव से वैवाहिक सुख की स्थिति पूर्णतः रूपांतरित, परिवर्तित अथवा परिमार्जित हो जाती है। इस मर्म को अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मंगली योगः विविध संयोग शीर्षांकित इस कृति में प्रस्तुत किया गया है। मंगली दोष के शमन हेतु अद्भुत एवं अनुभूत मंत्रप्रयोग तथा परिहार विधान कृति का अतिरिक्त आकर्षण है जिसके अनुसरण से लाखों मंगली जातक / जातिकाएं लाभान्वित हुए हैं।
समस्त ज्योतिष प्रेमियों के संज्ञान संवर्द्धन हेतु तथा मंगली दोष के निहितार्थ के तलस्पर्शी अध्ययन हेतु यह कृति पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।₹400.00 -
जातकसारावलीअष्टम भाव
₹450.00इस संसार का सर्वाधिक प्रबल पक्ष है मृत्यु। जिसको जीवन मिला है, उसकी मृत्यु होना सुनिश्चित है। प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य से अवगत है कि कभी न कभी काल के कराल कर उसके जीवन को ध्वस्त कर देंगे। किसी का जीवन पल मात्र का होता है और किसी का जीवन सौ वर्ष से भी अधिक होता है। इस सत्य को सभी को भलीभांति समझने का प्रयास करना चाहिए कि हमें विधाता ने जितने दिन भी जीने को दिए हैं, उसे हमें एक पराक्रमी, साहसी, निर्भीक, परिश्रमी और आनन्द की समस्त विधाओं को गले लगाने और दूसरों में खुशियाँ बाँटने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है और उसी क्षण आनी है, जिस क्षण विधाता ने लिखी है। जीवन के इस वास्तविक सत्य को सभी को सदा आत्मसात करना चाहिए।
राजा परीक्षित ने आचार्य शुकदेव जी से श्रीमद्भागवतपुराण खूब मन लगाकर सुना। अन्त में शुकदेव महाराज ने राजा परीक्षित से प्रश्न किया है- हे राजन् ! मैंने तुम्हें श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया। अब एक प्रश्न मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ। राजा परीक्षित बोले- जी, अवश्य पूछिए । आचार्य शुकदेव ने पूछा कि क्या तुम मरोगे? राजा परीक्षित ने कहा कि मैं कभी नहीं मरूँगा और यही जीवन का यथार्थ है।
₹550.00 -
परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ
₹350.00कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।
किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं
कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र
कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।
₹430.00 -
जातकसारावलीपंचम भाव
₹370.00ग्रन्य-परिचय
संतति-सुख के अभाव में, दाम्पत्य सुख की सम्पूर्णता सदा ही संदिग्ध रहती है।
सन्तान भविष्य की नियामक होने के साथ-साथ, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के मध्य निर्मित होने वाले सुन्दर समीकरण का स्वर्णिम सुदीप है। संतति-सुख के विविध पक्षों की शास्त्रानुमोदित व्याख्या तथा फलादेश के प्रमाणित, परीक्षित तथा प्रतिष्ठित सूत्रों के संतुलित समायोजन के साथ-साथ, पंचम भावगत नवग्रहों के फलाफल का विस्तृत विवेचन एवं संदर्भित सूत्रों की प्रामाणिकता को विविध जन्मांगों की व्याख्या द्वारा इस कृति में सिद्ध किया गया है। पुत्र और पुत्रियों की संख्या, संततिहीनता अथवा दत्तक संतति सम्बन्धी ग्रहयोगों को विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
पंचम भाव से बुद्धि की प्रखरता, ज्ञान की दिशा, रचनात्मकता, कलात्मकता, बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति, शिक्षा, विद्वत्ता, बौद्धिक कौशल, प्रेम सम्बन्धों की सफलता अथवा विफलता तथा संतति सुख का उल्लास एवं संततिहीनता के संत्रास आदि के अनुमान से संदर्भित विविध दुर्लभ सूत्र, जातक सारावली-पंचम भाव का वैशिष्ट्य है।
जातक सारावली-पंचम भाव अग्रांकित अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित है-1. पंचम भावगत राशियाँ, तथ्य एवं तत्त्व आदि; 2. पंचमेश की विभिन्न भावस्थिति के अनुसार फल; 3. विभिन्न भावेशों के पंचम भावगत होने तथा ग्रहों की दृष्टि का समीकरण; 4. पंचम भाव से सम्बद्ध विशिष्ट शोध सिद्धान्त; 5. पंचम भावगत सूर्य का फल; 6. पंचम भावगत चन्द्रमा का फल; 7. पंचम भावगत मंगल का फल; 8. पंचम भावगत बुध का फल; 9. पंचम भावगत बृहस्पति का फल; 10. पंचम भावगत शुक्र का फल; 11. पंचम भावगत शनि का फल; 12. पंचम भावगत राहु का फल; 13. पंचम भावगत केतु का फल; 14. पंचम भाव बौद्धिक प्रखरता एवं शिक्षा; 15 पंचम भाव से संदर्भित कतिपय विशेष ग्रहयोग; 16 पुत्र सुखः परिज्ञान एवं परिणाम; 17. मुख्यतः कन्याओं के जन्म हेतु ग्रहयोग; 18. सन्तानहीनता एक अभिशाप; 19. दत्तक पुत्र हेतु ग्रहीय आयाम तथा 20. पंचमेश की महादशा का फल।
जातक सारावली-पंचम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने ‘गागर में सागर’ भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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ज्योतिष विज्ञानसिद्धांत शिरोमणि
₹240.00जातक सारावली-दशम भाव आकाशीय पिंडों के अध्ययन एवं ज्योतिष शास्त्र के शोध सिद्धांतों से आलोकित व्यवसाय पक्ष का प्रज्वलित प्रकाश पुंज है। व्यवसाय और कर्म के अधिष्ठाता महाप्रभु की परमपावन पुनीत पदरज का मंगल तिलक है जातक सारावली-दशम भाव। व्यवसाय अर्थात् जीविकोपार्जन का माध्यम, समस्त मानव जाति की गति, मति, प्रगति, उन्नति की सम्यक् स्थिति का सक्रिय अभिनव अंग है। व्यवसाय का गौरव ही नर-नारियों की प्रभुता व सत्ता, अधिकार व कर्तव्य, कर्म व दायित्व की त्रिवेणी है और यही जीवन की विविध व्यवस्थाओं और पारिस्थितिक से अलंकृत कर्म का ऐसा सिंधु है, जिसमें अनवरत, अनंत, अविरल, निर्मल, कोमल मधु एवं दुग्ध स्तंभ का समायोजन एवं निरंतर प्रवाह होता रहता है। मनोनुकूल व्यवसाय प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता होती है। व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन अधिकांश ग्रंथों की प्रामाणिकता संदिग्ध है
किसी कुशल ज्योतिर्विद् से पूछे जाने वाली प्रमुख जिज्ञासाओं में जातक/जातिका के व्यवसाय से संबंधित प्रश्न को समेकित किया जा सकता है। वह नौकरी करेगा या व्यापार में सफलता प्राप्त करेगा, उद्योगपति बनेगा या उद्योग बनकर धनार्जन करेगा। यदि उद्योगपति बनेगा तो किस स्तर का होगा, क्या देश के प्रतिष्ठित और यशस्वी उद्योगपतियों में उसके नाम की गणना होगी या फिर कोई साधारण नौकरी करके मात्र जीवनयापन कर सकेगा। ऐसे कई प्रश्न अभिभावकगण प्रायः पूछते रहते हैं और यह स्वाभाविक होने के साथ ही अनिवार्य भी है। जातक सारावली-दशम भाव का वैशिष्ट्य है, नवांश चक्र द्वारा उपयुक्त व्यवसाय को समेकित करना। नवांश चक्र के अध्ययन के अभाव में किसी भी जातक के व्यवसाय का सटीक अनुमान करना लगभग उसी प्रकार है, जैसे किसी व्यक्ति का चित्र देखकर संबंधित व्याधियों का रेखांकन करना। अस्तु, नवांश चक्र का तलस्पर्शी मर्म तथा ऐसे अनेक विषयों के प्रामाणिक व परिक्षित शोधसूत्र, इस कृति में समाहित हैं जो इसे व्यवसाय पक्ष पर केंद्रित एक असाधारण कृति के रूप में संतुलित करते हैं
कृति को विषय के विस्तृत धरातल के आधार पर 19 शोधपरक एवं ज्ञानवर्द्धक अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है। इस कृति के अंतर्गत श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अपने पूर्व 40 वर्षों के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान के पावन प्रांजल पीयूष का अनुसरण किया है। समस्त जिज्ञासु पाठकों एवं ज्योतिष प्रेमियों के लिए जातक सारावली-दशम भाव पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय है जिसमें सन्निहित सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से व्यवसाय पक्ष से परिप्रेक्ष्य भविष्य कथन करने का अपूर्व कौशल और सामर्थ्य प्राप्त होना संभव है₹300.00 -
जातकसारावलीद्वितीय भाव
₹320.00धनार्जन, धन संचय तथा धन संवर्द्धन के विविध विधान के अन्यान्य अलौकिक शोध सिद्धान्तों से आलोकित ग्रहयोगों तथा उपयुक्त उदाहरणों से अलंकृत, आचार्यानुमोदित, शास्त्र संदर्भित ग्रन्थ जातक सारावली–द्वितीय भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी।
जातक के भाग्य पर विचार करने के साथ-साथ द्वितीय भाव का प्रबल होना भी अपेक्षित है। धनागमन का स्रोत ज्ञात हो, तो उसी के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। धन भाव की प्रबलता या निर्बलता का अनुमान करन क लिए षष्ठ च स्थान पान का अध्ययन भी अनिवार्य है क्योंकि षष्ठ भाव, द्वितीय भाव से पंचमस्थ फलेवा है बीर दास भाव द्वितीय भाव से नवमस्थ होता है। इन तीनों भावों में परस्पर विरामेपास्याश अम्वन्ध का अध्ययन ही जातक के धनवान हाने की वास्तविक स्थिति का परिचालन प्रधान करता है।
लिलीय चाचयता ग्रहों की विस्तृत व्याख्या और उनसे सम्बन्धित अन्यान्य शास्त्रीय प्रष्चों में विलमान सामग्री के साथ लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान और अम्पास का सारांश सटीक उदाहरणों के साथ इस कृति में समायाजित किया गया है। द्वितीय भाव में संस्थित ग्रहों के अतिरिक्त द्वितीयश की विभिन्न भाव में संस्थिति का फल, विभिन्न भावों के अधिपतियों के द्वितीय भावगत होने का फल एवं द्वितीय भाव म दो या दो से अधिक ग्रहों की युति का फल आदि का इतना संपुष्ट और सघन विश्लेषण प्रथम बार इस कृति में आविष्ठित है।
जातक सारावली–द्वितीय भाव को अग्रांकित शीर्षकों में विभाजित करक कृति के आधार के शोध सिद्धांतों को प्रबल धरातल प्रदान किया गया है: 1. द्वितीय भाव : विविध पक्ष, 2. द्वितीय भावगत ग्रहों का फल, 3. द्वितीय भावगत विभिन्न राशियों एवं ग्रहों की दृष्टि का फल, 4. द्वितीय भावगत विभिन्न ग्रह युतियों का फल, 5. द्वितीयेश के विभिन्न भावगत होने का फल, 6. विभिन्न भावेशों के द्वितीय भावगत होने का फल, 7. ग्रहों का संतुलन एवं समृद्धि का संवर्द्धन, 8. धन योग : ग्रहों का संयोग, तथा 9. विपुल वित्तार्जन: विविध समीकरण।
जातक सारावली–द्वितीय भाव, धनार्जन, धनसंचय, धनीक्ष्याम, धन संवर्द्धन तथा विपुल धन के विस्तार और प्रसार के साथ आय के स्रोत के अनुमान, चामी से फाई मुखमंडल के सोन्दर्य, नेत्रों की ज्योति तथा परिवार के पठन के अध्ययन हेतु पृछ प्रामाणिक ओर परीक्षित ग्रन्थ है जो सभी ज्योतिष प्रेमियों के लिए उदरणीय पहनीर अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
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