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₹40.00पंच पक्षी शास्त्र के रहस्य
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पञ्चपक्षी शास्त्र का उद्भव भारत के तमिलनाडु प्रांत के सिद्ध संतों के कर-कमलों द्वारा हुआ। प्राचीन काल में यह पद्धति काफी प्रचलित थी तथा इसके द्वारा काफी सटीक भविष्यवाणियां की जाती थीं। कालांतर में यह विद्या लुप्तप्राय हो गयी। इस विद्या से संबंधित किसी प्रामाणिक ग्रंथ की रचना भी नहीं की गयी तथा इस विद्या का सीमित प्रसार गुरु शिष्य परंपरा के तहत मौखिक रूप से ही हो पाया। कुछ छिट-पुट सामग्रियां इधर-उधर बिखरी हुई ही प्राप्त हो पाती हैं। लेखक ने अथक प्रयास एवं वर्षों के मेहनत से तमिल संतों के इस अनमोल धरोहर को पुनर्जीवन प्रदान करने का एक प्रयास किया है ताकि यह विद्या देश के कोने-कोने तक पहुंच पाए तथा लोग इसका लाभउठाकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकें। पञ्चपक्षी सिद्धांत के अनुसार हममें से सभी जातकों का कोई न कोई जन्मपक्षी निर्धारित है। ये पक्षी पांच प्रकार के होते हैं। शुक्लपक्ष अथवा कृष्णपक्ष में अपने जन्म नक्षत्र के आधार पर जन्मपक्षी का निर्धारण होता है। सभी लोगों के कौआ, मुर्गा, उल्लू, गिद्ध एवं मयूर में से कोई न कोई जन्मपक्षी होता है। ये सभी पक्षी दिन एवं रात्रि के विभिन्न यम काल में अलग-अलग गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। ये पक्षी शासन करना, खाना, घूमना, सोना एवं मरना नामक पांच भिन्न गतिविधियां अलग-अलग समय में संपादित करते हैं। इनमें शासन करना सर्वश्रेष्ठ गतिविधि है तथा खाना श्रेष्ठ गतिविधि, घूमना सामान्य गतिविधि, सोना निम्न गतिविधि तथा मरना अति निम्न गतिविधि के अंतर्गत आता है। यदि हम किसी विशेष कार्य का निष्पादन करने जा रहे हैं तो निःसंदेह हमें अपने जन्मपक्षी के शासन करने की गतिविधि का चयन करना चाहिए क्योंकि इस काल में किया गया कोई कार्य पूर्ण रूप से सफल होगा इसकी संभावना काफी पुष्ट होती है।
डॉ. मनोज कुमार
एम. ए. (इतिहास एवं लोक प्रशासन), पीएच. डी. ज्योतिषाचार्य (के.पी., पाराशरी एवं जैमिनी पद्धति) अंक ज्योतिषी (पाइथागोरियन, वैदिक एवं चीनीज पद्धति) वास्तु-फेंगशुई विशेषज्ञ एवं पास्ट लाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्ट
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