दैवज्ञ मंत्रेश्वरकृत फलदीपिकाज्योतिष की महान धरोहरभाग-2
₹320.00₹380.00
ज्योतिष के अविनाशी महत्व को जाति, पन्थ, समाज, राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठकर इसकी सार्वभौमिक प्रयोज्यता के माध्यम से ही सराहा जा सकता है। यह तत्वमीमांसा और नैतिकता से एक साथ संबंधित है। बाह्य स्तर पर इसके दायरे में भौतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को शामिल करने के लिए सब कुछ है और गूढ़ स्तर पर यह आत्मा के गुप्त पक्ष, इसकी अलौकिकता, अविनाशिता और अलौकिक स्थानान्तरण के चक्र से संबंधित है। यह हमें अनदेखे अतीत में दबे कार्य-कारण के बीजों की गहराई तक जाने में सक्षम बनाता है और हमें छिपी हुई उच्च संभावनाओं की चमक में जीवन के अर्थ को सुलझाने में मदद करता है। अतीत के कार्यों से प्रेरित होकर भविष्य की घटनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ज्योतिष हमसे सही एवं मर्यादित कर्मों के अनुसरण की माँग करता है और हृदय परिवर्तन के माध्यम से हमारी आदतों को सुधारने के लिए प्रेरित करता है ताकि जीवन की पहेलियों को अनपरत किया जा सके और भविष्य को प्रभावी ढंग से आकार दिया जा सके।
फलदीपिका ज्योतिष का एक महान ग्रन्थ और विद्वत्तापूर्ण कार्य है जिसमें कुल 28 अध्याय हैं। इसे दो खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरे खण्ड में 12 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में किसी विशिष्ट विषय पर कई उदाहरणों और दृष्टांतों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है। हर अध्याय में ज्योतिष विषयक किसी न किसी सन्दर्भ में विस्तार से उदाहरण सहित व्याख्या की गई है जो ज्योतिष के शिक्षार्थियों को आसानी से समझ में आ सके।
डॉ. मनोज कुमार
एम. ए. (इतिहास एवं लोक प्रशासन), पीएच. डी. ज्योतिषाचार्य (के.पी., पाराशरी एवं जैमिनी पद्धति) अंक ज्योतिषी (पाइथागोरियन, वैदिक एवं चीनीज पद्धति) वास्तु-फेंगशुई विशेषज्ञ एवं पास्ट लाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्ट
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ग्रह योग संक्षेपिका
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ग्रहयोगों की महत्ता का अनुमान कोई प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमी ही लगा सकता है। कितने ही जन्मांगों का गहन विश्लेषण करने पर भी, उनके मध्य सन्निहित मर्म को तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक ग्रहयोगों और उनके परिणाम का सम्यक् ज्ञान न हो। डा. राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं नरेन्द्र मोदी आदि के अत्यंत साधारण दिखने वाले जन्मांगों का रहस्य ग्रहयोगों के संज्ञान के अभाव में कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता है। वस्तुतः ग्रहयोग ज्योतिष शास्त्र की आत्मा है। ग्रहयोगों की उपेक्षा करके जन्मांग में छिपे रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता चाहे ग्रह स्थितियों, उनके बलाबल, दृष्टि, युति, स्वामित्व, नक्षत्र, राशि, भाव आदि की कितनी भी व्याख्या की जाए। ग्रहों का अपनी उच्च या नीच राशि में स्थित होना, अनुकूल फल प्रदान करेगा या प्रतिकूल, यह ग्रहयोगों पर निर्भर करता है। प्रायः देखने में आता है कि जिन जन्मांगों में छह ग्रह भी अपनी उच्च राशि में स्थित हैं, वह नितांत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं; तथा जिनके जन्मांगों में अनेक नीच राशिस्थ ग्रह हैं, वह सतह से उठकर शिखर तक पहुँचे हैं। इसका रहस्य तभी स्पष्ट हो सकता है जब ग्रहयोगों के सम्यक् संज्ञान एवं सटीक क्रियान्वयन का अनुमान हो।
ग्रह योग संक्षेपिका के अध्ययन, अनुसंधान व अभ्यास के साथ-साथ ग्रहयोगों के मनन, चिंतन और मंथन में अत्यन्त सुगमता होगी। जो जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमी एक दृष्टि में ग्रहयोगों को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक शीघ्र संदर्भित पुस्तिका के समतुल्य है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अथक चेष्टा की है कि कोई भी ग्रहयोग, जो किसी भी ग्रहयोग से सम्बन्धित कृति में सन्निहित है, वह इस कृति के अन्तर्गत अवश्य उपलब्ध हो। लगभग 1200 ग्रहयोगों का संदर्भ, उनकी परिभाषा एवं परिणाम इस कृति का वैशिष्ट्य है। प्रबुद्ध और प्रखर ज्योतिष प्रेमियों को, जो मात्र योग की संरचना एवं उनके परिणाम के विषय में जानना चाहते हैं, उनके लिए इस कृति का अध्ययन मात्र ही पर्याप्त है।
ग्रह योग संक्षेपिका को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है–1. विविध योग, 2. धन योग, 3. विवाह योग, 4. संतान योग, 5. आयु योग, 6. भवन एवं वाहन योग, तथा 7. विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा योग।
ग्रह योग संक्षेपिका ग्रहयोगों पर केन्द्रित एक सम्पूर्ण व सरल कृति है जिसके अध्ययन से किसी भी जन्मांग में निर्मित होने वाले अन्यान्य ग्रहयोगों को रेखांकित करना सुगम है। अतः यह समस्त प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों तथा विद्वान ज्योतिर्विदों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।
₹400.00 -
योग पारिजातअनुपम योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
परिणय निर्णयमंगली दोषः सन्निहित यथार्थ
₹320.00वर-वधू के जन्मांगों में विद्यमान मंगली दोष के संतुलन की अनिवार्यता के साथ-साथ आवश्यकता है, मंगली दोष के वास्तविक रहस्य के तलस्पर्शी संज्ञान और अनुभव की, जिसे मंगली दोषः सन्निहित यथार्थ नामक इस कृति में व्यावहारिक जन्मांगों तथा शास्त्रीय सूत्रों और लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनवरत अनुसंधान और अभ्यास के आधार पर नीर-क्षीर विवेचनोपरान्त प्रस्तुत किया गया है।
जन्मांग में मंगल ग्रह की कतिपय विशिष्ट स्थितियाँ ही वैवाहिक सुख में प्रायः विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं जिसे मंगली दोष से रेखांकित किया जाता है। मंगली दोष के सन्निहित यथार्थ से प्रायः अनभिज्ञ ज्योतिष प्रेमी एवं तथाकथित ज्योतिर्विद वर-वधू के जन्मांगों में, मंगली दोष का मिलान करते समय भारी भूल कर बैठते हैं, जिसका वास्तविक कारण विषय की अज्ञानता एवं अल्पज्ञता ही होता है।
वस्तुतः मंगल ग्रह ही वैवाहिक विच्छेद, विसंगतियों, विषमताओं व वैधव्य के अतिरिक्त विवाह के विघटन की विविध अप्रिय परिस्थितियों का सूत्रपात करता है और मंगल ही अनाचार, दुराचार, अत्याचार, बलात्कार और हिंसा का हेतु निर्मित करने वाला ग्रह है परन्तु अनिवार्यता है मंगल ग्रह के प्रभाव के गहन अध्ययन तथा विश्लेषण के उपरान्त उसके वास्तविक परिणाम के उपयुक्त और सटीक आकलन की।
यह कृति अग्रांकित 11 अध्यायों में विभाजित है- 1. मंगल ग्रह ज्ञातव्य तथ्य 2. मंगली दोष: सन्निहित यथार्थ 3. लग्नगत मंगल का फल 4. द्वितीय भावगत मंगल का फल 5. चतुर्थ भावगत मंगल का फल 6. महिलाओं हेतु पंचम भावगत मंगल का फल 7. सप्तम भावगत मंगल का फल 8. अष्टम भावगत मंगल का फल 9. द्वादश भावगत मंगल का फल 10. असंतुलित मंगली दोष के आश्चर्यजनक परिणाम, तथा 11. मंगल ग्रहः दशा दिग्दर्शन।
मंगल ग्रह व मंगली दोष के ज्ञातव्य तथ्य के विषय में अन्यान्य सत्य तथा मिथ्या विचारों की व्याख्या, विश्लेषण व विवेचन, असंतुलित मंगलीदोष के आश्चर्यजनक परिणाम एवं मंगल ग्रह: दशा दिग्दर्शन आदि की शोधपरक च्याख्या, कृति का वैशिष्ट्य है। विविध लग्नों के लिए मंगली दोष का परिवर्तित होता हुआ स्वरूप ही शोध संज्ञान और अनुसंधान है जो वर्तमान युग की अनिवार्यता है। जिज्ञासुओं व ज्योतिष प्रेमियों की अभिलाषा, आकांक्षा और अपेक्षा की सारगर्भिता एवं सत्यता ही उनके अखंडित विश्वास का सेतु निर्मित करती है। रचनाकारद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व टी.पी. त्रिवेदी ने बारहों लग्नों के लिए, विविध प्रकार के मंगली दोष का मर्म और अनुसंधान प्रस्तुत करके, दीर्घकाल से प्रतीक्षित प्रबुद्ध पाठकों के आग्रह को साकार आकार प्रदान किया है।
₹400.00 -
शक्ति कुंज’
₹320.00शक्ति कुंज’ भक्ति भावना का त्रिभुवन मोहन, भव्य भुवन है जो भगवान पराम्बा, जगतजननी, जगदम्बा के परम पावन पदपंकज के प्रसादामृत से परिपूर्ण प्रेरणा प्रार्थना प्रभूथ प्रार्थना पथ एवं प्रांजल प्राशीष है। ‘शक्ति’ भाव और भक्ति, साधना और शक्ति, प्रार्थना और आराधना से पवित्र प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र से सुशोभित भव्य त्रिभुवन मोहन, दिव्य सौन्दर्य से आश्रम, सुगठित, संयोजन, सु साधन, अविद्या, सारस्वत, शाश्वत साधना का स्वर्णिम शक्ति सेतु है, जो स्तुति मणिमण्डित स्तम्भों पर आधारित है, सात सौ रत्नजड़ित स्वर्ण सोपानों से निर्मित है, जिसमें आदिशक्ति, महाशक्ति, पराम्बा, भगवान, कुव्वरी, आदि शामिल हैं। जगतजननी के परम पावन पवित्र प्रांजल चरित्र का दर्शन, विपुल अनुकंपा के निमित्त सिद्धांत सु नियोजित आक्षेप के साथ जाने वाले, विशिष्ट अनुष्ठान का सम्यक विश्लेषण, विवेचन का आख्यान, व्याख्यान विधि-विधान सहित शास्त्र आविष्ठित है।
‘शक्ति कुञ्ज’ 16 अध्यायों में विवेचित एवं व्याख्यायित है जिसे मोक्ष-प्रदायिनी श्री दुर्गासप्तशती के प्रसाद-प्रबन्ध की विस्तृत के साथ-साथ नैमित्तिक साधनाओं के विभिन्न पक्षों पर केन्द्रित किया गया है। श्री दुर्गासप्तशती भू-लोकवासियों की मनोकामनाओं एवं सम्यक् अभिलाषाओं की संपूर्ति एवं संसिद्धि हेतु माता जगदम्बा का अनुपम वरदान है, जो मानव समाज को प्रसादामृत रूप उपलब्ध है।
*भक्ति पुंज: शक्ति कुंज-श्री दुर्गासप्तशती शक्ति रहस्य शक्ति साधनाः संस्कार अनुष्ठान दुर्गाभुवन कामनापरक श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान अनुष्ठान अनुष्ठान और नवार्ण मंत्र एक पूजन शतचंडी एवं दुर्गापाठ विधान श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान-अष्ट सिद्धि उपदेश श्री दुर्गासप्तशती : व्यापक प्रवचन सप्तशती स्थित प्रसिद्ध सम्पुटित मंत्र अन्य मंत्रों की संसिद्धि कथा श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप साधना के सामान्य सूत्र श्री देव्यथर्वशीर्ष और महत्वपूर्ण चंडिका मंगलमंत्र का प्रयोग संपूर्ण मंत्रों की संसिद्धि के लिए ‘सिद्धकुंजिका स्तोत्र’ और ‘बीसा यंत्र’ प्रयोग शक्ति साधना: कतिपय चमत्कार कर देने वालेअंतरंग आभास।
इन अतिरिक्त अन्यान्य प्रस्तावों की संसिद्धि के लिए श्री दुर्गासप्तशती का मंत्रजप विधान, ‘शक्ति कुंज’ की दुर्लभ वैशिष्ट्य है जिसमें व्याहतों से संयुक्त संपुट मंत्रों का जप विधान, विनियोग, संख्या और प्रविधि आदि सिद्धांत शामिल हैं।
श्री दुर्गासप्तशती आस्तिकों की आस्था का ललाट है। माता दुर्गा के अनुपम अनुराग एवं शक्ति साधना की सौरभ सुधा-धारा ‘शक्ति कुञ्ज’ में अविरल गति से प्रवाहित, प्रसारित हो रही है। भक्ति भावना के भव्य भुवन में त्रिभुवन मोहिनी, महाशक्ति पराम्बा की अवर्णनीय अनुरागपूर्ण आस्था, आराधना, अर्चना, अभ्यर्थना के स्वर्णिम संकल्प का हीरक हस्ताक्षर है- ‘शक्ति कुञ्ज’, जिसका पठन और पारायण शक्ति के भक्तों, साधकों, आराधकों, उपासकों तथा जिज्ञासुओं हेतु अपरिहार्य है।₹400.00 -
परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ
₹350.00कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।
किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं
कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र
कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।
₹430.00 -
चद्र दशा फलदीपिका
₹400.00चन्द्रमा अनादि काल से सौन्दर्य का प्रतीक स्वीकारा गया है। चन्द्रमा के दर्शन मात्र से जीवन की अनेक क्लिष्ट स्थितियों के समाधान का पथ प्रशस्त होता है। दर्शन करने में चन्द्रमा जितना निर्मल कोमल और स्वच्छ प्रतीत होता है, वास्तव में देह उतना ही जटिल है। चन्द्रमा के महत्व को समझना सुगम है परंतु उसके वास्तविक फलाफल का सटीक विवेचन अधिक दुःसाध्य है। पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करने वाला चन्द्रमा, पृथ्वीवासियों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है इसीलिए चन्द्रमा को जन्मांग का प्राप्ण घोषित किया गया है। चन्द्रमा का बलाबल और स्थिति ही जन्मांग की प्रबलता या निर्बलता का आधार है। चन्द्रमा की विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित अनुकूल-प्रतिकूल फलाफल का तलस्पर्शी अध्ययन और उसके क्रियान्वयन हेतु अनेक शोधपरक सिद्धान्तों तथा विशिष्ट सूत्रों का उपयुक्त समायोजन चन्द्र दशाफल दीपिका में किया गया है ताकि चन्द्रमा की दशान्तर्दशा के अन्तर्गत होने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं का सटीक आकलन किया जाना संभव हो सके।
इस कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है जिनके अध्ययन से चन्द्रमा की महादशा व अंतर्दशा के विषय में सम्यक् संज्ञान प्राप्त करके सटीक भविष्यकथन किया जा सकता है: 1. ग्रहस्थिति एवं फलकथन, 2. भावगत दशाफल विवेचन, 3. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रग्रह का महत्व, 4. विविध भावगत चन्द्रमा की दशा का फल, 5. बारह जन्म राशियों का फल. 6. बारह राशियों में चन्द्रमा का फल, 7. लग्न फल, 8. विविध लग्नों के लिए भावगत चन्द्रमा का फल. 9. चन्द्रमा की महादशा का संभावित फलाफल, 10. चन्द्रमा की महादशा का फल, 11. चन्द्रमा की महादशा के मध्य अंतर्दशाओं का फल, तथा 12. चन्द्र पीड़ा परिहार विधान।
यह एक व्यावहारिक और ज्योतिष शास्त्र पर केन्द्रित शताधिक शोध प्रबन्धों के रचनाकार ज्योतिर्विदों का प्रथम प्रयास है कि विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित प्रत्येक ग्रह की महादशा और अंतर्दशाओं का इतना वृहद, संपुष्ट और अनुभूत फलकथन दशाफल दीपिका की श्रृंखला के अंतर्गत किया जाना संभव हो सका। सर्वविदित है-कि विश्व में सबसे अधिक उपयोग विंशोत्तरी दशाओं का ही होता है इसलिए इस दशाफल दीपिका श्रृंखला को विंशोत्तरी दशाओं तक ही सीमित रखा गया है। विश्वास है कि विंशोत्तरी दशाफल से सम्बन्धित कृति के अध्ययन की आंकाक्षा व समस्त दशाओं की संरचना के परिणाम से सम्बन्धित जिज्ञासा का सशक्त सारभूत व सारगर्भित समाधान है चन्द्र दशाफल दीपिका जो प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रो व ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹500.00 -
संतति संहिता
₹360.00संतति संहिता उन समस्त सबल, सशक्त, सारस्वत, शाश्वत संकल्पों का साकार स्वरूप है, जो सन्तान सम्बन्धी प्रामाणिक सामग्री से सन्निहित संरचनाओं के अभाव के कारण रचनाकार के मन मस्तिष्क के पटल पर अंकित और अंकुरित हुए। संततिहीनता से त्रस्त, संतति वियोग से व्याकुल, पुत्र अथवा पुत्रियों के जन्म की अत्यधिक आतुर आकांक्षा और अभिलाषा की विफलता से संतप्त, दत्तक संतति की चिन्ता से आक्रान्त, परजात शिशु के संशय से व्यथित, विकृत अथवा विकलांग संतति की संभावना से प्रकम्पित, संतति जन्म के अनुमानित समय संज्ञान हेतु जिज्ञासारत, नालवेष्टित शिशु की आशंका से ग्रस्त, युगल सन्तान जन्म की संभावना, संततिहीनता का कारण विविध शापों से अभिशप्त जातक, पत्नी के गर्भधारण करने की क्षमता, सन्तान संख्या तथा अपनी संतति के साथ संभावित सम्बन्धों की मधुरता अथवा कटुता, शत्रुता अथवा आत्मीयता के बोधतुल्य अनेक ऐसे प्रकरण हैं, जिनके विश्लेषण और व्याख्या के उपरान्त तलस्पर्शी अनुसंधान की अनिवार्यता असंदिग्ध है जिन पर किसी भी सामयिक ज्योतिर्विद् अथवा लेखक ने प्रामाणिक शोध सूत्र, जिज्ञासु और प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की चेष्टा नहीं की।
संतान सम्बन्धी अन्यान्य पक्षों पर शोध साधना में अवगाहन करने हेतु विविध सत्य एवं प्रामाणिक तथ्यों ने देश के प्रसिद्ध लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी को आंदोलित व व्यथित किया। उनकी शोध यात्रा का सर्वाधिक सुरभित सुमन है संतति संहिता, जिसका प्रत्येक पृष्ठ समस्त शास्त्रीय ग्रंथों के सबल प्रमाणों से अभिसिंचित है। कृति को अग्रांकित 21 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित व विश्लेषित किया गया है।
1. पंचम भावगत ग्रहों का फल, 2. पंचम भावगत विभिन्न राशियों का फल, 3. द्वादश भाव के स्वामियों की पंचम भावस्थ स्थिति का फल, 4. पंचम भाव में ग्रहों की दृष्टि का फल, 5. पंचमेश की विभिन्न भावों में स्थिति के अनुसार फल, 6. संतति जन्म प्रकार और प्रसंग, 7. नालवेष्टित शिशु एक भयावह स्थिति, 8. युगल संतान सम्बन्धित संज्ञान, 9. विभिन्न शाप एवं संतति संताप, 10. नारी और गर्भधारण करने की क्षमता, 11. संतान संख्या: संज्ञान सिद्धांत, 12. संततिहीनता का विकल्प दत्तक संतान, 13. संतति और समय की सत्ता, 14. संतान जन्म का समय गणना के विभिन्न आधार, 15. प्रसवकाल संज्ञान, 16. संतति सुख हेतु प्रभूत प्रयत्न एवं प्रतीक्षा, 17. गर्भवती युवती की मृत्यु, 18. शिशु के माता-पिता की मृत्यु सम्बन्धी ग्रहयोग, 19. माता अथवा पिता से त्यक्त संतान हेतु ग्रह ज्ञान, 20. ऋतुकाल एवं गर्भकाल ज्ञातव्य सूत्र, 21. ग्रह स्थितियाँ तथा शिशु के सम्बन्धी ।
संतति संहिता सन्तान पक्ष की एक ऐसी आधारशिला है जिसमें समस्त शास्त्रीय ग्रंथों के प्रामाणिक सूत्रों की संसिद्धि हेतु विविध व्यावहारिक जन्मांगों में विद्यमान ग्रहयोगों की सत्यता को परिलक्षित व प्रदर्शित किया गया है। संतति संहिता सन्तान पक्ष पर केन्द्रित एक अद्भुत ग्रन्थ है जो अनुभूत सूत्रों पर आधारित है और जिसका अध्ययन, अनुगमन, अनुसरण समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध पाठकों और जिज्ञासु छात₹450.00 -
परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा
₹320.00सृष्टि का प्रत्येक निमिष विशिष्ट और विचित्र होने के साथ-साथ अमूल्य है। कर्म संकुल जीवन में यह अनिवार्य है कि कालदेवता के अंश क्षण का उचित अभिज्ञान हो। इसी विचारधारा के आधार पर ऋषिकल्प व्यक्तियों ने प्रत्येक कार्य के सम्पादन हेतु विशिष्ट क्षण निश्चित किया है। इस क्षणवैशिष्ट्य को मुहूर्त की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। विवाह सदृश अतिमहत्त्वपूर्ण संस्कार हेतु मुहूर्त माहात्म्य सर्वविदित है। सिद्धान्त, संहिता, होरा का सूचक त्रिस्कन्ध ज्योतिष है। मुहूर्त ज्योतिष संहिता के अन्तर्गत विवेच्य है। 1600 ईस्वी में राम दैवज्ञ ने मुहूर्तचिन्तामणि नामक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की संरचना की। वर्तमान में इसी के आधार पर विवाह, द्विरागमन आदि संस्कारों के मुहूर्त रेखांकित किए जाने की प्रथा है।
परिणय परम्परा, जिसके लिए प्राणीमात्र प्रतीक्षारत रहता है और जिसमें पल्लवित व पुष्पित होने वाले प्रणय का परिमाण व प्रमाण अनेक ज्ञात-अज्ञात तत्त्वों पर आश्रित होता है. जिससे कदाचित वर-वधू पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं। विवाह संस्कार के प्रतिपादन और संपादन हेतु उपयुक्त मुहूर्त का चयन भी एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा से परिणय सुख का परिणाम, उसका विकृत होता हुआ प्रारूप और उसमें उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ, विषमताएँ और विघटनकारी स्थितियाँ होती हैं। विवाह हेतु उपयुक्त मुहूर्त के अभाव में सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना का ऋतुराज, उत्तरोत्तर ऋतुपात में रूपांतरित होने लगता है। उपयुक्त मुहूर्त में किसी भी कार्य का संपादन अथवा प्रतिपादन सफलता की संसिद्धि करता है, इसमें किंचित संदेह नहीं।
मुहूर्त जैसे जटिल विषय पर केन्द्रित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु कोई भी ऐसा ग्रन्थ नहीं है जिसमें परिणय सम्बन्धी समस्त मुहूर्त प्रणाली का क्रमबद्ध विवेचन आविष्ठित हो। ज्योतिष शास्त्र की इस आवश्यकता की अभिपूर्ति के उद्देश्य से विश्वविख्यात लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने ‘परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा’ की संरचना की। उपयुक्त वर-वधू तथा विवाह हेतु तर्कसम्मत मुहूर्त का सम्यक् संज्ञान इस कृति में वर्णित है। कृति को अग्रांकित नौ अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है ताकि पाठकगण इसके अध्ययन में किंचित भी भ्रमित न हों 1. विवाह संस्कार एवं प्रकार; 2. परिणय निर्णय : प्रमुख सूत्र; 3. विवाह निर्णय ज्ञातव्य सिद्धान्त; 4. मुहूर्त मीमांसा; 5. गुरु-शुक्र अस्त विचार; 6. विवाह विचार एवं प्रश्न मार्ग; 7. जन्म समय एवं अशुभ काल : ज्ञातव्य सूत्र; 8. गण्डान्त एवं मूल शान्ति विधान, तथा 9. विवाह प्रतिपादन पद्धति।
यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, प्रशंसनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।
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