दैवज्ञ मंत्रेश्वरकृत फलदीपिकाज्योतिष की महान धरोहरभाग-2
₹320.00₹380.00
ज्योतिष के अविनाशी महत्व को जाति, पन्थ, समाज, राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठकर इसकी सार्वभौमिक प्रयोज्यता के माध्यम से ही सराहा जा सकता है। यह तत्वमीमांसा और नैतिकता से एक साथ संबंधित है। बाह्य स्तर पर इसके दायरे में भौतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को शामिल करने के लिए सब कुछ है और गूढ़ स्तर पर यह आत्मा के गुप्त पक्ष, इसकी अलौकिकता, अविनाशिता और अलौकिक स्थानान्तरण के चक्र से संबंधित है। यह हमें अनदेखे अतीत में दबे कार्य-कारण के बीजों की गहराई तक जाने में सक्षम बनाता है और हमें छिपी हुई उच्च संभावनाओं की चमक में जीवन के अर्थ को सुलझाने में मदद करता है। अतीत के कार्यों से प्रेरित होकर भविष्य की घटनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ज्योतिष हमसे सही एवं मर्यादित कर्मों के अनुसरण की माँग करता है और हृदय परिवर्तन के माध्यम से हमारी आदतों को सुधारने के लिए प्रेरित करता है ताकि जीवन की पहेलियों को अनपरत किया जा सके और भविष्य को प्रभावी ढंग से आकार दिया जा सके।
फलदीपिका ज्योतिष का एक महान ग्रन्थ और विद्वत्तापूर्ण कार्य है जिसमें कुल 28 अध्याय हैं। इसे दो खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरे खण्ड में 12 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में किसी विशिष्ट विषय पर कई उदाहरणों और दृष्टांतों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है। हर अध्याय में ज्योतिष विषयक किसी न किसी सन्दर्भ में विस्तार से उदाहरण सहित व्याख्या की गई है जो ज्योतिष के शिक्षार्थियों को आसानी से समझ में आ सके।
डॉ. मनोज कुमार
एम. ए. (इतिहास एवं लोक प्रशासन), पीएच. डी. ज्योतिषाचार्य (के.पी., पाराशरी एवं जैमिनी पद्धति) अंक ज्योतिषी (पाइथागोरियन, वैदिक एवं चीनीज पद्धति) वास्तु-फेंगशुई विशेषज्ञ एवं पास्ट लाइफ रिग्रेशन थेरेपिस्ट
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परिणय निर्णयमंगली दोषः सन्निहित यथार्थ
₹320.00वर-वधू के जन्मांगों में विद्यमान मंगली दोष के संतुलन की अनिवार्यता के साथ-साथ आवश्यकता है, मंगली दोष के वास्तविक रहस्य के तलस्पर्शी संज्ञान और अनुभव की, जिसे मंगली दोषः सन्निहित यथार्थ नामक इस कृति में व्यावहारिक जन्मांगों तथा शास्त्रीय सूत्रों और लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनवरत अनुसंधान और अभ्यास के आधार पर नीर-क्षीर विवेचनोपरान्त प्रस्तुत किया गया है।
जन्मांग में मंगल ग्रह की कतिपय विशिष्ट स्थितियाँ ही वैवाहिक सुख में प्रायः विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं जिसे मंगली दोष से रेखांकित किया जाता है। मंगली दोष के सन्निहित यथार्थ से प्रायः अनभिज्ञ ज्योतिष प्रेमी एवं तथाकथित ज्योतिर्विद वर-वधू के जन्मांगों में, मंगली दोष का मिलान करते समय भारी भूल कर बैठते हैं, जिसका वास्तविक कारण विषय की अज्ञानता एवं अल्पज्ञता ही होता है।
वस्तुतः मंगल ग्रह ही वैवाहिक विच्छेद, विसंगतियों, विषमताओं व वैधव्य के अतिरिक्त विवाह के विघटन की विविध अप्रिय परिस्थितियों का सूत्रपात करता है और मंगल ही अनाचार, दुराचार, अत्याचार, बलात्कार और हिंसा का हेतु निर्मित करने वाला ग्रह है परन्तु अनिवार्यता है मंगल ग्रह के प्रभाव के गहन अध्ययन तथा विश्लेषण के उपरान्त उसके वास्तविक परिणाम के उपयुक्त और सटीक आकलन की।
यह कृति अग्रांकित 11 अध्यायों में विभाजित है- 1. मंगल ग्रह ज्ञातव्य तथ्य 2. मंगली दोष: सन्निहित यथार्थ 3. लग्नगत मंगल का फल 4. द्वितीय भावगत मंगल का फल 5. चतुर्थ भावगत मंगल का फल 6. महिलाओं हेतु पंचम भावगत मंगल का फल 7. सप्तम भावगत मंगल का फल 8. अष्टम भावगत मंगल का फल 9. द्वादश भावगत मंगल का फल 10. असंतुलित मंगली दोष के आश्चर्यजनक परिणाम, तथा 11. मंगल ग्रहः दशा दिग्दर्शन।
मंगल ग्रह व मंगली दोष के ज्ञातव्य तथ्य के विषय में अन्यान्य सत्य तथा मिथ्या विचारों की व्याख्या, विश्लेषण व विवेचन, असंतुलित मंगलीदोष के आश्चर्यजनक परिणाम एवं मंगल ग्रह: दशा दिग्दर्शन आदि की शोधपरक च्याख्या, कृति का वैशिष्ट्य है। विविध लग्नों के लिए मंगली दोष का परिवर्तित होता हुआ स्वरूप ही शोध संज्ञान और अनुसंधान है जो वर्तमान युग की अनिवार्यता है। जिज्ञासुओं व ज्योतिष प्रेमियों की अभिलाषा, आकांक्षा और अपेक्षा की सारगर्भिता एवं सत्यता ही उनके अखंडित विश्वास का सेतु निर्मित करती है। रचनाकारद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी व टी.पी. त्रिवेदी ने बारहों लग्नों के लिए, विविध प्रकार के मंगली दोष का मर्म और अनुसंधान प्रस्तुत करके, दीर्घकाल से प्रतीक्षित प्रबुद्ध पाठकों के आग्रह को साकार आकार प्रदान किया है।
₹400.00 -
शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
ग्रह योग संक्षेपिका
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ग्रहयोगों की महत्ता का अनुमान कोई प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमी ही लगा सकता है। कितने ही जन्मांगों का गहन विश्लेषण करने पर भी, उनके मध्य सन्निहित मर्म को तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक ग्रहयोगों और उनके परिणाम का सम्यक् ज्ञान न हो। डा. राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं नरेन्द्र मोदी आदि के अत्यंत साधारण दिखने वाले जन्मांगों का रहस्य ग्रहयोगों के संज्ञान के अभाव में कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता है। वस्तुतः ग्रहयोग ज्योतिष शास्त्र की आत्मा है। ग्रहयोगों की उपेक्षा करके जन्मांग में छिपे रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता चाहे ग्रह स्थितियों, उनके बलाबल, दृष्टि, युति, स्वामित्व, नक्षत्र, राशि, भाव आदि की कितनी भी व्याख्या की जाए। ग्रहों का अपनी उच्च या नीच राशि में स्थित होना, अनुकूल फल प्रदान करेगा या प्रतिकूल, यह ग्रहयोगों पर निर्भर करता है। प्रायः देखने में आता है कि जिन जन्मांगों में छह ग्रह भी अपनी उच्च राशि में स्थित हैं, वह नितांत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं; तथा जिनके जन्मांगों में अनेक नीच राशिस्थ ग्रह हैं, वह सतह से उठकर शिखर तक पहुँचे हैं। इसका रहस्य तभी स्पष्ट हो सकता है जब ग्रहयोगों के सम्यक् संज्ञान एवं सटीक क्रियान्वयन का अनुमान हो।
ग्रह योग संक्षेपिका के अध्ययन, अनुसंधान व अभ्यास के साथ-साथ ग्रहयोगों के मनन, चिंतन और मंथन में अत्यन्त सुगमता होगी। जो जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमी एक दृष्टि में ग्रहयोगों को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक शीघ्र संदर्भित पुस्तिका के समतुल्य है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अथक चेष्टा की है कि कोई भी ग्रहयोग, जो किसी भी ग्रहयोग से सम्बन्धित कृति में सन्निहित है, वह इस कृति के अन्तर्गत अवश्य उपलब्ध हो। लगभग 1200 ग्रहयोगों का संदर्भ, उनकी परिभाषा एवं परिणाम इस कृति का वैशिष्ट्य है। प्रबुद्ध और प्रखर ज्योतिष प्रेमियों को, जो मात्र योग की संरचना एवं उनके परिणाम के विषय में जानना चाहते हैं, उनके लिए इस कृति का अध्ययन मात्र ही पर्याप्त है।
ग्रह योग संक्षेपिका को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है–1. विविध योग, 2. धन योग, 3. विवाह योग, 4. संतान योग, 5. आयु योग, 6. भवन एवं वाहन योग, तथा 7. विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा योग।
ग्रह योग संक्षेपिका ग्रहयोगों पर केन्द्रित एक सम्पूर्ण व सरल कृति है जिसके अध्ययन से किसी भी जन्मांग में निर्मित होने वाले अन्यान्य ग्रहयोगों को रेखांकित करना सुगम है। अतः यह समस्त प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों तथा विद्वान ज्योतिर्विदों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।
₹400.00 -
परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ
₹350.00कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।
किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं
कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र
कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।
₹430.00 -
परिणय निर्णयमंगली योगः विविध संयोग
₹320.00वस्तुतः मंगली योग की विभिन्न सकारात्मक, नकारात्मक एवं अपवादपरक स्थितियों से प्रायः पाठकगण ही नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिर्विद भी अनभिज्ञ हैं जो त्रुटिपूर्ण जन्मांग मिलान का हेतु है। मंगली योग से संदर्भित अज्ञानता इस तथ्य से ही परिलक्षित होती है कि अनेक अवसरों पर मंगली कन्या का विवाह अमंगली युवक के साथ सम्पन्न होता है परन्तु उनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धिशाली होता है। जबकि मंगलीदोष के सटीक मिलान के पश्चात् संपादित किए जाने वाले अनेक विवाह प्रायः असफल हो जाते हैं और करुणापूर्ण तथा भयावह विकृति, वैधव्य अथवा विवाह विच्छेद का आधार निर्मित करते हैं। सत्यता यह है कि मंगली दोष के विषय में भारी भ्रांति और भ्रमपूर्ण तथ्य समाज में प्रचलित और प्रतिष्ठित हैं जिनका तलस्पर्शी विश्लेषण, विवेचन कदाचित मंगली दोष सन्निहित यथार्थ एवं मंगली योग: विविध संयोग नामक कृतियों के अतिरिक्त अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। मंगली दोष के विषय की अनभिज्ञता ने ही भारतवर्ष के बहुप्रशंसित, 85 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों के रचनाकार श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने इस विषय की अनिवार्यता को समझा और इन दोनों कृतियों के अन्तर्गत शताधिक जन्मांगों के माध्यम से समस्त ज्योतिष प्रेमियों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। इस कृति को अग्रांकित 11 भिन्न-भिन्न अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित किया गया है –
1. मंगली योग : विविध संयोग; 2. मंगली दोष पर सूर्य का प्रभाव शोध संज्ञान; 3. मंगली दोष पर चन्द्रमा का प्रभाव शोध संज्ञान; 4. मंगली दोष पर बुध का प्रभाव : शोध संज्ञान; 5. मंगली दोष पर बृहस्पति का प्रभाव शोध संज्ञान; 6. मंगली दोष पर शुक्र का प्रभाव : शोध संज्ञान; 7. मंगली दोष पर शनि का प्रभाव शोध संज्ञान; 8. मंगली दोष पर राहु का प्रभाव शोध संज्ञान; 9. मंगली दोष पर केतु का प्रभाव : शोध संज्ञान; 10. महिलाओं हेतु अष्टम भावस्थ मंगल अशुभ परिणाम, तथा 11. मंगलीदोष से रक्षार्थ परिहार विधान।
उल्लेखनीय है कि मंगली दोष के शुभ अथवा अशुभ फल में विविध ग्रहयोगों के कारण वृद्धि अथवा न्यूनता उत्पन्न होती है तथा इस संदर्भ में कदाचित संपुष्ट शोध प्रस्तुत किए जाने का यह प्रथम अवसर है। मंगली दोष पर विविध ग्रहों के प्रभाव से वैवाहिक सुख की स्थिति पूर्णतः रूपांतरित, परिवर्तित अथवा परिमार्जित हो जाती है। इस मर्म को अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मंगली योगः विविध संयोग शीर्षांकित इस कृति में प्रस्तुत किया गया है। मंगली दोष के शमन हेतु अद्भुत एवं अनुभूत मंत्रप्रयोग तथा परिहार विधान कृति का अतिरिक्त आकर्षण है जिसके अनुसरण से लाखों मंगली जातक / जातिकाएं लाभान्वित हुए हैं।
समस्त ज्योतिष प्रेमियों के संज्ञान संवर्द्धन हेतु तथा मंगली दोष के निहितार्थ के तलस्पर्शी अध्ययन हेतु यह कृति पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।₹400.00 -
व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान
₹320.00कलिकाल के वर्तमान चक्र के विकृत एवं विरूपित स्वरूप में निमग्न होते जा रहे समाज के मध्य व्रत संपादन की लोकप्रियता, उपयोगिता तथा उसके विलक्षण प्रभाव की महिमा को ‘व्रत विधान : विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति के मधुरिम मधुवन के महकते प्रांगण में संबंधित जातकों के सम्मुख प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। यह कृति नौ पृथक पृथक अध्यायों में व्याख्यायित है जिन्हें अग्रांकित शीर्षकों से स्थिर किया गया है-
1. मंत्र : सत्यान्तिक विश्लेषण, 2. वैवाहिक विलम्ब एवं ग्रहयोग : ज्योतिषीय
विश्लेषण, 3. वैवाहिक विलम्ब कुछ अनुभूत मंत्र, स्तोत्र एवं प्रयोग, 4. व्रत परिज्ञानः प्रविधि एवं प्रावधान, 5. वैवाहिक समस्याओं का सुगम समाधान व्रत विधान, 6. विशिष्ट व्रत का अनुसरण : वैवाहिक विसंगतियाँ, वैधव्य, पार्थक्य का शमन, 7. संतति सुगम : परिहार प्रावधान, 8. सर्वश्रेष्ठ अनुष्ठान व्रत विधान तथा 9. प्रमुख पुत्र सुगम व्रत एवं विधान
विविध व्रत विधान, विवाह एवं सन्तान से संबंधित अनेक सुगम समाधान इस कृति में अनुमान किए गए हैं। प्रायः व्रत और उपवास की भिन्नता से अनभिज्ञ जन-सामान्य व्रत को अनुष्ठान के रूप में उपयोग करने तथा उसके चमत्कृत कर देने वाले प्रभाव से भिन्न है। इस वास्तविकता की सम्यक् व्याख्या ‘व्रत विधान विवाह एवं सन्तान’ नामक कृति में आविष्ठित है। वैवाहिक विलम्ब एवं विघटन का सुगम समाधान है- मंत्रजप, स्तोत्र पाठ, व्रत और दान। इसी प्रकार से संततिहीनता को संतति सुख में रूपांतरित करने हेतु विविध विधान मंत्र प्रयोग तथा अनेक व्रत और उनका अद्भुत एवं अनुभूत व्यावहारिक पक्ष इस कृति में अनुमान किया गया है
वैवाहिक विलम्ब, विघटन, संततिहीनता अथवा शाप से ग्रसित अनेक ऐसे जातक हैं जो संस्कृत के मंत्र, स्तोत्र तथा अनुष्ठान का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं हैं तथा न ही वह योग्य आचार्यों द्वारा संबंधित अनुष्ठानों का प्रतिपादन कराने में सक्षम हैं। विवाह एवं सन्तान सुख हेतु आतुर एवं प्रतीक्षारत जातकों के लिए सर्वोच्च सुगम मार्ग है, उपयुक्त व्रत का चयन तथा विधि विधान सहित उसका अनुकरण, आरंभ एवं उद्यापन आदि, जो इस कृति का सर्वस्व है।
इस कृति में अनेक पुत्रप्रदाता व्रत एवं संतति सुख की कामना की संसिद्धि हेतु विविध व्रत एवं विधान दार्शनिक किए गए हैं, जो अद्भुत और अनुभूत हैं जिनमें से कात्यायनी व्रत, पुंसवन व्रत, पयोव्रत, श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत, षष्ठी देवी व्रत आदि प्रमुख हैं तथा वैवाहिक विलम्ब के समाधान हेतु विविध वारों से संबंधित व्रतविधान और वैवाहिक संकट एवं प्रशासन के परिहार हेतु मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि के साथ-साथ उसके विधान भी इस कृति में सत्रिहित हैं
यह कृति अपनी सारगर्भिता, सार्वभौमिकता तथा उपयोगिता के कारण समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए अत्यन्त हितकर और लाभप्रद सिद्ध होगी, इसमें किंचित सन्देह नहीं।₹350.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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शनि दशा फलदीपिका
₹400.00शनि दशाफल दीपिका’ हमारे शीर्षस्थ ज्योतिर्विद् श्री टी.पी. त्रिवेदी के सुदीर्घ, सघन मंथन का नवनीत है। उन्होंने लक्षाधिक जातकों के जन्मांगों का अनुशीलन और प्रायोगिक अन्वेषण करके इस वृहत् ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा इसके माध्यम से एक नव्य सैद्धान्तिकी निर्मित की है।
इसके पूर्व भी श्री त्रिवेदी ‘सैटर्न: द टाइमर’, ‘शनि शमन’, ‘शनि संहिता’ आदि प्रस्थान-ग्रन्थों और शत-सहस्राधिक शोध आलेखों के माध्यम से शनि की अन्तर्दशाओं, उसकी द्वादश राशिगत स्थितियों, उसकी विभिन्न आकृतियों-प्रवृत्तियों, उसके वर्ण, वाहन, दृष्टिफल, गोत्रोत्पत्ति और कारक तत्वों पर सतर्त विमर्श करते रहे हैं।
इस ग्रन्थ की विशिष्टता, बल्कि अनन्यता यह है कि यह जितना शास्त्रानुमोदित है, उतना ही व्यावहारिक अनुभवों, दैनंदिन अभ्यासों और अनुसंधानों पर आधारित है। यह श्री त्रिवेदी की चार दशकों की साधना का सुफल है। निस्संदेह यह उनके बहुआयामी चिंतन-अनुचिंतन से निस्सृत है। इसमें दशाफल निर्धारण, सिद्धान्त का निर्वचन ही नहीं किया गया है, प्रत्युत् जातक की महादशा एवं अन्तर्दशा के शुभाशुभफलों की अनुप्रयोगात्मक संसिद्धि (फलश्रुति) भी अन्तर्घटित की गयी है।
शनि अन्यानेक दुर्भेद्य रहस्यों का पुंज है। इससे संबंधित भौतिक प्रपंच के कोटि-कोटि जातक उपकृत या संत्रस्त हैं। ज्योतिषी जी ने अष्टोत्तरी, विंशोत्तरी महादशा, योगिनी एवं गोचर दशा के शास्त्रीय शनि विषयक अनेक गूढ़, दुःसाध्य तथा जटिल समस्याओं का निदान-समाधान यहां प्रस्तुत किया है। उनके विशिष्ट तथा नितांत निजी स्थान शनि के केंद्रगत, त्रिकोणस्थ, उपचय स्थानगत, त्रिभावस्थ भाव से तथा उनके इष्ट-अनिष्ट प्रतिफल से जुड़े हुए हैं।
₹500.00










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