ज्योतिष और रोगकारण और निवारणभाग 1
₹400.00₹500.00
रोग क्या है, स्वस्थ कौन, ज्योतिष में स्वास्थ्य विचार, लग्नबल-लग्नेशबल-शुभ कर्तरी योग-निष्पाप चंद्रमा, शुभ ग्रह शुभस्थान में तथा पापग्रह दुःस्थान में, लग्न व लग्नेश का राशि बल, त्रिकेश का त्रिक बंधन शुभ है, अष्टमेश बली या शनि अष्टमस्थ, बली लग्न से बेहतर स्वास्थ्य, रुग्ण देह या निर्बल शरीर, लग्न व लग्नेश की दुर्बलता, चंद्रमा का पापत्व, त्रिषडाय में ग्रह का अभाव, केन्द्र/त्रिकोण में क्रूर ग्रह की स्थिति, अष्टमेश की निर्बलता आरोग्य लाभ या रोग से मुक्ति, उदाहरण कुंडलियां अधोभाग की दुर्बलता, मांसपेशियों की बढ़ती दुर्बलता, दुर्बल मांसपेशियां, मांसपेशियों की कमजोरी, विवेचन व समीक्षा।
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जातकसारावलीद्वितीय भाव
₹320.00धनार्जन, धन संचय तथा धन संवर्द्धन के विविध विधान के अन्यान्य अलौकिक शोध सिद्धान्तों से आलोकित ग्रहयोगों तथा उपयुक्त उदाहरणों से अलंकृत, आचार्यानुमोदित, शास्त्र संदर्भित ग्रन्थ जातक सारावली–द्वितीय भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों के लिए हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी।
जातक के भाग्य पर विचार करने के साथ-साथ द्वितीय भाव का प्रबल होना भी अपेक्षित है। धनागमन का स्रोत ज्ञात हो, तो उसी के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। धन भाव की प्रबलता या निर्बलता का अनुमान करन क लिए षष्ठ च स्थान पान का अध्ययन भी अनिवार्य है क्योंकि षष्ठ भाव, द्वितीय भाव से पंचमस्थ फलेवा है बीर दास भाव द्वितीय भाव से नवमस्थ होता है। इन तीनों भावों में परस्पर विरामेपास्याश अम्वन्ध का अध्ययन ही जातक के धनवान हाने की वास्तविक स्थिति का परिचालन प्रधान करता है।
लिलीय चाचयता ग्रहों की विस्तृत व्याख्या और उनसे सम्बन्धित अन्यान्य शास्त्रीय प्रष्चों में विलमान सामग्री के साथ लेखकद्वय के अध्ययन, अनुभव, अनुसंधान और अम्पास का सारांश सटीक उदाहरणों के साथ इस कृति में समायाजित किया गया है। द्वितीय भाव में संस्थित ग्रहों के अतिरिक्त द्वितीयश की विभिन्न भाव में संस्थिति का फल, विभिन्न भावों के अधिपतियों के द्वितीय भावगत होने का फल एवं द्वितीय भाव म दो या दो से अधिक ग्रहों की युति का फल आदि का इतना संपुष्ट और सघन विश्लेषण प्रथम बार इस कृति में आविष्ठित है।
जातक सारावली–द्वितीय भाव को अग्रांकित शीर्षकों में विभाजित करक कृति के आधार के शोध सिद्धांतों को प्रबल धरातल प्रदान किया गया है: 1. द्वितीय भाव : विविध पक्ष, 2. द्वितीय भावगत ग्रहों का फल, 3. द्वितीय भावगत विभिन्न राशियों एवं ग्रहों की दृष्टि का फल, 4. द्वितीय भावगत विभिन्न ग्रह युतियों का फल, 5. द्वितीयेश के विभिन्न भावगत होने का फल, 6. विभिन्न भावेशों के द्वितीय भावगत होने का फल, 7. ग्रहों का संतुलन एवं समृद्धि का संवर्द्धन, 8. धन योग : ग्रहों का संयोग, तथा 9. विपुल वित्तार्जन: विविध समीकरण।
जातक सारावली–द्वितीय भाव, धनार्जन, धनसंचय, धनीक्ष्याम, धन संवर्द्धन तथा विपुल धन के विस्तार और प्रसार के साथ आय के स्रोत के अनुमान, चामी से फाई मुखमंडल के सोन्दर्य, नेत्रों की ज्योति तथा परिवार के पठन के अध्ययन हेतु पृछ प्रामाणिक ओर परीक्षित ग्रन्थ है जो सभी ज्योतिष प्रेमियों के लिए उदरणीय पहनीर अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
मंगल दशा फलदीपिका
₹450.00अनादिकाल से मंगल ग्रह का रक्ताभ सौन्दर्य नवविवाहित दम्पत्तियों के लिए जिज्ञासा और कौतूहल का परम्परागत स्तम्भ रहा है। विवाह के परिपेक्ष्य में जन्मांग में मंगल की अप्रिय स्थिति वर-वधू के अभिभावकों को प्रकम्पित कर देती है। प्रायः मंगल को एक विध्वंसात्मक ग्रह के रूप में स्वीकार किया जाता है परन्तु मंगल दशाफल दीपिका का निहितार्थ इस आस्था को मिथ्या सिद्ध कर देने हेतु चेतना की जागृति का एक परिश्रमसाध्य अनुष्ठान है। मंगल दशाफल दीपिका में सन्निहित, संकलित, संयोजित सामग्री मंगल की दशान्तर्दशा के फलकथन के सन्दर्भ में अत्यधिक महत्वपूर्ण, उपयोगी, अद्भुत और अनुभूत है। प्रतिकूल मंगल की दशा का अत्यन्त अल्पज्ञता और अज्ञानतापूर्ण संज्ञान, दुर्घटना, कलह, आक्रमण, अपराध, अपहरण, आन्दोलन, अग्निकाण्ड, हिंसा, हत्या, दुर्भिक्ष, अतिऊष्मा, पराजय, सूखा, रक्तविकार, शल्यक्रिया, ट्यूमर, पेप्टिक अल्सर, असंतुलित रक्तचाप, विविध व्याधि, युद्ध आदि के रूप में प्रचलित है जबकि अनुकूल मंगल की स्थिति अन्तरंग आनन्द व प्रेम सम्बन्ध, आत्मीयता, प्रसिद्धि, धनधान्य, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, सम्पदा, समृद्धि, सम्मान, शासन-प्रशासन, सत्ता, राज्य प्राप्ति, अधिकार प्राप्ति एवं विजय, पराक्रम, पदोन्नति, पद-प्रतिष्ठा, प्रगति, उन्नति, साहस, निर्भीकता, भूमि, भूखण्ड, भवन के अतिरिक्त हर्षोल्लास, उमंग, उत्साह, ऊर्जा का अभिनव अभियान है।
मंगल दशाफल दीपिका को अग्रांकित 19 सुगम, सरल, सारगर्भित, सार्वभौमिक व सारस्वत अध्यायों तथा 600 पृष्ठों में अन्यान्य व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण के साथ विभाजित, व्याख्यायित एवं विश्लेषित किया गया है: 1. मंगल ग्रहः पौराणिक एवं वैज्ञानिक सत्य तथ्य; 2. दशाफल कथन रहस्य एवं सिद्धान्तः 3. बारह राशियों में मंगल की दशा का फल; 4. मंगल की महादशा का फल; अध्याय 5 से 16 तक विविध भावगत मंगल की दशान्तर्दशा का फल; 17. मंगल की महादशा में विविध ग्रहों की अन्तर्दशा का फल 18. मंगल की महादशा के मध्य प्रत्यंतर दशाओं का फल, तथा 19. मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान।
विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित मंगल दशाफल दीपिका इस श्रृंखला का हीरक हस्ताक्षर है जिसके अध्ययन, अनुभव, अनुसरण और अभ्यास से मंगल ग्रह के दशान्तर्दशा के सन्दर्भ में समस्त भय, भ्रम एवं भ्रांतियाँ ध्वस्त हो जायेंगी और हमारे प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों, गम्भीर अध्येताओं, भक्तों एवं साधकों को मंगल ग्रह के संदर्भ में अभिनव अभिज्ञान के साथ-साथ मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान अत्यन्त सम्पुष्ट साकार-आकार में मंगल दशाफल दीपिका के अन्तर्गत एक ही स्थल पर उपलब्ध व सम्भव हो सकेगा।
₹550.00 -
सूर्यदशा फलदीपिका
₹320.00ज्योतिष विज्ञान की महत्ता व समय की सत्ता के मध्य निर्मित होने वाले समीकरण की स्वर्णमण्डित शिला ही दशाफल दीपिका का सबलतम है जिसका रहस्य भारतीय ऋषि-मनीषियों ने अपनी योग साधना के बल पर समस्त मानवता के कल्याण हेतु समय-समय पर उद्घाटित किया था। ज्योतिष शास्त्र में विंशोत्तरी दशा सर्वाधिक विश्वसनीय व अनुकरणीय है। सूर्यग्रह की महादशा, अंतर्दशा व प्रत्यंतरदशा पर केंद्रित सूर्य दशाफल दीपिका नामक यह शोधप्रबन्ध दशान्तदंशा के संदर्भ में सत्य भविष्यकथन हेतु क्रांतिकारक सिद्ध होगा। इस सम्बन्ध में समस्त ज्योतिष ग्रन्थों में अनगिनत सूत्र उपलब्ध हैं जिनका उपयुक्त समन्वय व समायोजन कृति का सर्वस्व है। वस्तुतः यह कृति विंशोत्तरी दशाफल कथन करने की अद्भुत तकनीक का उत्कृष्ट प्रमाण है। विंशोत्तरी दशा के क्रियान्वयन से पूर्व ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थों में सन्निहित समस्त श्लोकों के मर्म को आत्मसात् करके उनके सटीक क्रियान्वयन करने की कला के अभ्यास के अभाव में जन्मांग के आधार पर भविष्य में होने वाली अनुकूल, प्रतिकूल घटनाओं के समय की घोषणा कदापि नहीं करनी चाहिए। दशाफल कथन की अविश्वसनीयता व अल्पज्ञान की सत्ता को देखकर लेखकों का मन करुण क्रन्दन कर उठा और उन्हें विंशोत्तरी दशा पर शोधपरक चिंतन व लेखन करने हेतु विवश किया।
सूर्य दशाफल दीपिका को अग्रांकित 12 अध्यायों में व्याख्यायित किया गया है: 1. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य का महत्व, 2. विंशोत्तरी दशाफल निर्णय, 3. दशाफल कथन हेतु कतिपय आवश्यक सूत्र, 4. नक्षत्र के आधार पर विंशोत्तरी दशा का फलकथन, 5. सूर्य की महादशा का फल. 6. विविध भावगत सूर्य की महादशा का फल, 7. बारह राशियों में सूर्य की दशा का फल, 8. उच्च-नीच आदि राशिगत सूर्य की दशा का फल, 9. सूर्य की महादशा में विविध ग्रहों की अंतर्दशा का फल, 10. सूर्य की महादशा में प्रत्यंतर दशाओं का फल, 11. सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण परिज्ञान एवं परिहार, तथा 12. सूर्य की महादशा की अनुकूलता हेतु अनुभूत व अद्भुत परिहार।
प्रबुद्ध पाठकों व जिज्ञासु छात्रों के प्रबल आग्रह पर कृति में परिहार का भी संयोजन किया गया है क्योंकि इसके अभाव में कृति की पूर्णता संदिग्ध थी। प्रबुद्ध पाठक व जिज्ञासु छात्र सूर्यग्रह पीड़ा परिहार के अध्ययन से अवश्य लाभान्वित होंगे। विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित शताधिक पुस्तकों के अध्ययन ने ही लेखकद्वय को प्रत्येक ग्रह की दशान्तर्दशा पर आधारित दशाफल श्रृंखला की पुस्तकों की संरचना हेतु प्रेरित किया ताकि विविध दशान्तर्दशाओं के विषय को अनुभव के निकष पर कस कर वास्तव में प्रतिफलित होने वाली घटनाओं के सम्यक् उल्लेख का समायोजन किया जा सके। विश्वास है कि सूर्य दशाफल दीपिका में विद्यमान सूत्रों का सटीक क्रियान्वयन शत-प्रतिशत सत्य भविष्यकथन करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होगा।
₹400.00 -
राहु केतु
₹210.00श्री कृष्ण कुमार द्वारा लिखित ज्योतिष और रोग पर यह ग्रन्थ मेरे हाथों में है। इसका विहंगम अध्ययन यह सिद्ध करने के लिये काफी है कि इसमें प्रयुक्त विभिन्न
सिद्धान्तों का संकलन भिन्न-भिन्न शास्त्रों से किया गया है तथा इसमें काफी प्रयत्न तया परिश्रम किया गया है।₹250.00 -
जातकसारावलीपंचम भाव
₹370.00ग्रन्य-परिचय
संतति-सुख के अभाव में, दाम्पत्य सुख की सम्पूर्णता सदा ही संदिग्ध रहती है।
सन्तान भविष्य की नियामक होने के साथ-साथ, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के मध्य निर्मित होने वाले सुन्दर समीकरण का स्वर्णिम सुदीप है। संतति-सुख के विविध पक्षों की शास्त्रानुमोदित व्याख्या तथा फलादेश के प्रमाणित, परीक्षित तथा प्रतिष्ठित सूत्रों के संतुलित समायोजन के साथ-साथ, पंचम भावगत नवग्रहों के फलाफल का विस्तृत विवेचन एवं संदर्भित सूत्रों की प्रामाणिकता को विविध जन्मांगों की व्याख्या द्वारा इस कृति में सिद्ध किया गया है। पुत्र और पुत्रियों की संख्या, संततिहीनता अथवा दत्तक संतति सम्बन्धी ग्रहयोगों को विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
पंचम भाव से बुद्धि की प्रखरता, ज्ञान की दिशा, रचनात्मकता, कलात्मकता, बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति, शिक्षा, विद्वत्ता, बौद्धिक कौशल, प्रेम सम्बन्धों की सफलता अथवा विफलता तथा संतति सुख का उल्लास एवं संततिहीनता के संत्रास आदि के अनुमान से संदर्भित विविध दुर्लभ सूत्र, जातक सारावली-पंचम भाव का वैशिष्ट्य है।
जातक सारावली-पंचम भाव अग्रांकित अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित है-1. पंचम भावगत राशियाँ, तथ्य एवं तत्त्व आदि; 2. पंचमेश की विभिन्न भावस्थिति के अनुसार फल; 3. विभिन्न भावेशों के पंचम भावगत होने तथा ग्रहों की दृष्टि का समीकरण; 4. पंचम भाव से सम्बद्ध विशिष्ट शोध सिद्धान्त; 5. पंचम भावगत सूर्य का फल; 6. पंचम भावगत चन्द्रमा का फल; 7. पंचम भावगत मंगल का फल; 8. पंचम भावगत बुध का फल; 9. पंचम भावगत बृहस्पति का फल; 10. पंचम भावगत शुक्र का फल; 11. पंचम भावगत शनि का फल; 12. पंचम भावगत राहु का फल; 13. पंचम भावगत केतु का फल; 14. पंचम भाव बौद्धिक प्रखरता एवं शिक्षा; 15 पंचम भाव से संदर्भित कतिपय विशेष ग्रहयोग; 16 पुत्र सुखः परिज्ञान एवं परिणाम; 17. मुख्यतः कन्याओं के जन्म हेतु ग्रहयोग; 18. सन्तानहीनता एक अभिशाप; 19. दत्तक पुत्र हेतु ग्रहीय आयाम तथा 20. पंचमेश की महादशा का फल।
जातक सारावली-पंचम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने ‘गागर में सागर’ भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
ग्रह योग संक्षेपिका
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ग्रहयोगों की महत्ता का अनुमान कोई प्रबुद्ध ज्योतिष प्रेमी ही लगा सकता है। कितने ही जन्मांगों का गहन विश्लेषण करने पर भी, उनके मध्य सन्निहित मर्म को तब तक नहीं जाना जा सकता, जब तक ग्रहयोगों और उनके परिणाम का सम्यक् ज्ञान न हो। डा. राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद एवं नरेन्द्र मोदी आदि के अत्यंत साधारण दिखने वाले जन्मांगों का रहस्य ग्रहयोगों के संज्ञान के अभाव में कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता है। वस्तुतः ग्रहयोग ज्योतिष शास्त्र की आत्मा है। ग्रहयोगों की उपेक्षा करके जन्मांग में छिपे रहस्य को कदापि नहीं जाना जा सकता चाहे ग्रह स्थितियों, उनके बलाबल, दृष्टि, युति, स्वामित्व, नक्षत्र, राशि, भाव आदि की कितनी भी व्याख्या की जाए। ग्रहों का अपनी उच्च या नीच राशि में स्थित होना, अनुकूल फल प्रदान करेगा या प्रतिकूल, यह ग्रहयोगों पर निर्भर करता है। प्रायः देखने में आता है कि जिन जन्मांगों में छह ग्रह भी अपनी उच्च राशि में स्थित हैं, वह नितांत सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं; तथा जिनके जन्मांगों में अनेक नीच राशिस्थ ग्रह हैं, वह सतह से उठकर शिखर तक पहुँचे हैं। इसका रहस्य तभी स्पष्ट हो सकता है जब ग्रहयोगों के सम्यक् संज्ञान एवं सटीक क्रियान्वयन का अनुमान हो।
ग्रह योग संक्षेपिका के अध्ययन, अनुसंधान व अभ्यास के साथ-साथ ग्रहयोगों के मनन, चिंतन और मंथन में अत्यन्त सुगमता होगी। जो जिज्ञासु ज्योतिष प्रेमी एक दृष्टि में ग्रहयोगों को आत्मसात् करना चाहते हैं, उनके लिए यह एक शीघ्र संदर्भित पुस्तिका के समतुल्य है। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने अथक चेष्टा की है कि कोई भी ग्रहयोग, जो किसी भी ग्रहयोग से सम्बन्धित कृति में सन्निहित है, वह इस कृति के अन्तर्गत अवश्य उपलब्ध हो। लगभग 1200 ग्रहयोगों का संदर्भ, उनकी परिभाषा एवं परिणाम इस कृति का वैशिष्ट्य है। प्रबुद्ध और प्रखर ज्योतिष प्रेमियों को, जो मात्र योग की संरचना एवं उनके परिणाम के विषय में जानना चाहते हैं, उनके लिए इस कृति का अध्ययन मात्र ही पर्याप्त है।
ग्रह योग संक्षेपिका को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है–1. विविध योग, 2. धन योग, 3. विवाह योग, 4. संतान योग, 5. आयु योग, 6. भवन एवं वाहन योग, तथा 7. विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा योग।
ग्रह योग संक्षेपिका ग्रहयोगों पर केन्द्रित एक सम्पूर्ण व सरल कृति है जिसके अध्ययन से किसी भी जन्मांग में निर्मित होने वाले अन्यान्य ग्रहयोगों को रेखांकित करना सुगम है। अतः यह समस्त प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों तथा विद्वान ज्योतिर्विदों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय ग्रन्थ है।
₹400.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है










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