गीता मंत्र गंगोत्री
₹290.00₹350.00
श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियों के लिए प्रार्थना पथ नहीं, बल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमद्भगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायः अधिकांश भक्तजन, साधक, आराधक, पाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एवं उसकी व्याख्या, गीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप में सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामों से शीर्षांकित किया गया है:
श्रीमती मृदुला त्रिवेदी देश की प्रथम पंक्ति के ज्योतिषशास्त्र के अध्येताओं एवं शोधकर्ताओं में प्रशंसित एवं चर्चित हैं। उन्होंने ज्योतिष ज्ञान के असीम सागर के जटिल गर्भ में प्रतिष्ठित अनेक अनमोल रत्न अन्वेषित कर, उन्हें वर्तमान मानवीय संदर्भों के अनुरूप संस्कारित तथा विभिन्न धरातलों पर उन्हें परीक्षित और प्रमाणित करने के पश्चात जिज्ञासु छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करने का सशक्त प्रयास तथा परिश्रम किया है, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने देशव्यापी विभिन्न प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 460 शोधपरक लेखों के अतिरिक्त 70 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों की संरचना की, जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि, प्रशंसा, अभिशंसा, कीर्ति और यश उपलब्ध हुआ है, जिनके अन्यान्य परिवर्द्धित संस्करण, उनकी लोकप्रियता और विषयवस्तु की सारगर्भिता का प्रमाण हैं।
ज्योतिर्विद श्रीमती मृदुला त्रिवेदी देश के अनेक संस्थानों द्वारा प्रशंसित और सम्मानित हुई हैं जिन्हें ‘वर्ल्ड डेवलपमेन्ट पार्लियामेन्ट’ द्वारा ‘डाक्टर ऑफ एस्ट्रोलॉजी’ तथा ‘प्लेनेट्स एण्ड फोरकास्ट’ द्वारा देश के ‘सर्वश्रेष्ठ ज्योतिर्विद’ तथा ‘सर्वश्रेष्ठ लेखक’ का पुरस्कार एवं ‘ज्योतिष महर्षि की उपाधि आदि प्राप्त हुए हैं। ‘अध्यात्म एवं ज्योतिष शोध संस्थान, लखनऊ’ तथा ‘द टाइम्स ऑफ एस्ट्रोलॉजी, दिल्ली द्वारा उन्हें विविध अवसरों पर ज्योतिष पाराशर, ज्योतिष वेदव्यास, ज्योतिष वराहमिहिर, ज्योतिष मार्तण्ड, ज्योतिष भूषण, भाग्यविद्मणि, ज्योतिर्विद्यावारिधि, ज्योतिष बृहस्पति, ज्योतिष भानु एवं ज्योतिष ब्रह्मर्षि ऐसी अन्यान्य अप्रतिम मानक उपाधियों से अलंकृत किया गया है।
श्रीमती मृदुला त्रिवेदी, लखनऊ विश्वविद्यालय की परास्नातक हैं तथा विगत 40 वर्षों से अनवरत ज्योतिष विज्ञान तथा मंत्रशास्त्र के उत्थान तथा अनुसंधान में संलग्न हैं। भारतवर्ष के साथ-साथ विश्व के विभिन्न देशों के निवासी उनसे समय-समय पर ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त करते रहते हैं। श्रीमती मृदुला त्रिवेदी को ज्योतिष विज्ञान की शोध संदर्भित मौन साधिका एवं ज्योतिष ज्ञान के प्रति सारस्वत संकल्प से संयुक्त समर्पित ज्योतिर्विद के रूप में प्रशंसित किया गया है और वह अनेक पत्र-पत्रिकाओं में सह-संपादिका के रूप में कार्यरत रही हैं।
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जातकसारावलीअष्टम भाव
₹450.00इस संसार का सर्वाधिक प्रबल पक्ष है मृत्यु। जिसको जीवन मिला है, उसकी मृत्यु होना सुनिश्चित है। प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य से अवगत है कि कभी न कभी काल के कराल कर उसके जीवन को ध्वस्त कर देंगे। किसी का जीवन पल मात्र का होता है और किसी का जीवन सौ वर्ष से भी अधिक होता है। इस सत्य को सभी को भलीभांति समझने का प्रयास करना चाहिए कि हमें विधाता ने जितने दिन भी जीने को दिए हैं, उसे हमें एक पराक्रमी, साहसी, निर्भीक, परिश्रमी और आनन्द की समस्त विधाओं को गले लगाने और दूसरों में खुशियाँ बाँटने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है और उसी क्षण आनी है, जिस क्षण विधाता ने लिखी है। जीवन के इस वास्तविक सत्य को सभी को सदा आत्मसात करना चाहिए।
राजा परीक्षित ने आचार्य शुकदेव जी से श्रीमद्भागवतपुराण खूब मन लगाकर सुना। अन्त में शुकदेव महाराज ने राजा परीक्षित से प्रश्न किया है- हे राजन् ! मैंने तुम्हें श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया। अब एक प्रश्न मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ। राजा परीक्षित बोले- जी, अवश्य पूछिए । आचार्य शुकदेव ने पूछा कि क्या तुम मरोगे? राजा परीक्षित ने कहा कि मैं कभी नहीं मरूँगा और यही जीवन का यथार्थ है।
₹550.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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योग पारिजातभाग्य योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
मंगल दशा फलदीपिका
₹450.00अनादिकाल से मंगल ग्रह का रक्ताभ सौन्दर्य नवविवाहित दम्पत्तियों के लिए जिज्ञासा और कौतूहल का परम्परागत स्तम्भ रहा है। विवाह के परिपेक्ष्य में जन्मांग में मंगल की अप्रिय स्थिति वर-वधू के अभिभावकों को प्रकम्पित कर देती है। प्रायः मंगल को एक विध्वंसात्मक ग्रह के रूप में स्वीकार किया जाता है परन्तु मंगल दशाफल दीपिका का निहितार्थ इस आस्था को मिथ्या सिद्ध कर देने हेतु चेतना की जागृति का एक परिश्रमसाध्य अनुष्ठान है। मंगल दशाफल दीपिका में सन्निहित, संकलित, संयोजित सामग्री मंगल की दशान्तर्दशा के फलकथन के सन्दर्भ में अत्यधिक महत्वपूर्ण, उपयोगी, अद्भुत और अनुभूत है। प्रतिकूल मंगल की दशा का अत्यन्त अल्पज्ञता और अज्ञानतापूर्ण संज्ञान, दुर्घटना, कलह, आक्रमण, अपराध, अपहरण, आन्दोलन, अग्निकाण्ड, हिंसा, हत्या, दुर्भिक्ष, अतिऊष्मा, पराजय, सूखा, रक्तविकार, शल्यक्रिया, ट्यूमर, पेप्टिक अल्सर, असंतुलित रक्तचाप, विविध व्याधि, युद्ध आदि के रूप में प्रचलित है जबकि अनुकूल मंगल की स्थिति अन्तरंग आनन्द व प्रेम सम्बन्ध, आत्मीयता, प्रसिद्धि, धनधान्य, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, सम्पदा, समृद्धि, सम्मान, शासन-प्रशासन, सत्ता, राज्य प्राप्ति, अधिकार प्राप्ति एवं विजय, पराक्रम, पदोन्नति, पद-प्रतिष्ठा, प्रगति, उन्नति, साहस, निर्भीकता, भूमि, भूखण्ड, भवन के अतिरिक्त हर्षोल्लास, उमंग, उत्साह, ऊर्जा का अभिनव अभियान है।
मंगल दशाफल दीपिका को अग्रांकित 19 सुगम, सरल, सारगर्भित, सार्वभौमिक व सारस्वत अध्यायों तथा 600 पृष्ठों में अन्यान्य व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण के साथ विभाजित, व्याख्यायित एवं विश्लेषित किया गया है: 1. मंगल ग्रहः पौराणिक एवं वैज्ञानिक सत्य तथ्य; 2. दशाफल कथन रहस्य एवं सिद्धान्तः 3. बारह राशियों में मंगल की दशा का फल; 4. मंगल की महादशा का फल; अध्याय 5 से 16 तक विविध भावगत मंगल की दशान्तर्दशा का फल; 17. मंगल की महादशा में विविध ग्रहों की अन्तर्दशा का फल 18. मंगल की महादशा के मध्य प्रत्यंतर दशाओं का फल, तथा 19. मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान।
विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित मंगल दशाफल दीपिका इस श्रृंखला का हीरक हस्ताक्षर है जिसके अध्ययन, अनुभव, अनुसरण और अभ्यास से मंगल ग्रह के दशान्तर्दशा के सन्दर्भ में समस्त भय, भ्रम एवं भ्रांतियाँ ध्वस्त हो जायेंगी और हमारे प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रों, गम्भीर अध्येताओं, भक्तों एवं साधकों को मंगल ग्रह के संदर्भ में अभिनव अभिज्ञान के साथ-साथ मंगल ग्रहकृत पीड़ा परिहार विधान अत्यन्त सम्पुष्ट साकार-आकार में मंगल दशाफल दीपिका के अन्तर्गत एक ही स्थल पर उपलब्ध व सम्भव हो सकेगा।
₹550.00 -
जातकसारावलीपंचम भाव
₹370.00ग्रन्य-परिचय
संतति-सुख के अभाव में, दाम्पत्य सुख की सम्पूर्णता सदा ही संदिग्ध रहती है।
सन्तान भविष्य की नियामक होने के साथ-साथ, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों के मध्य निर्मित होने वाले सुन्दर समीकरण का स्वर्णिम सुदीप है। संतति-सुख के विविध पक्षों की शास्त्रानुमोदित व्याख्या तथा फलादेश के प्रमाणित, परीक्षित तथा प्रतिष्ठित सूत्रों के संतुलित समायोजन के साथ-साथ, पंचम भावगत नवग्रहों के फलाफल का विस्तृत विवेचन एवं संदर्भित सूत्रों की प्रामाणिकता को विविध जन्मांगों की व्याख्या द्वारा इस कृति में सिद्ध किया गया है। पुत्र और पुत्रियों की संख्या, संततिहीनता अथवा दत्तक संतति सम्बन्धी ग्रहयोगों को विविध उदाहरणों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
पंचम भाव से बुद्धि की प्रखरता, ज्ञान की दिशा, रचनात्मकता, कलात्मकता, बौद्धिक क्षमता, स्मरण शक्ति, शिक्षा, विद्वत्ता, बौद्धिक कौशल, प्रेम सम्बन्धों की सफलता अथवा विफलता तथा संतति सुख का उल्लास एवं संततिहीनता के संत्रास आदि के अनुमान से संदर्भित विविध दुर्लभ सूत्र, जातक सारावली-पंचम भाव का वैशिष्ट्य है।
जातक सारावली-पंचम भाव अग्रांकित अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित है-1. पंचम भावगत राशियाँ, तथ्य एवं तत्त्व आदि; 2. पंचमेश की विभिन्न भावस्थिति के अनुसार फल; 3. विभिन्न भावेशों के पंचम भावगत होने तथा ग्रहों की दृष्टि का समीकरण; 4. पंचम भाव से सम्बद्ध विशिष्ट शोध सिद्धान्त; 5. पंचम भावगत सूर्य का फल; 6. पंचम भावगत चन्द्रमा का फल; 7. पंचम भावगत मंगल का फल; 8. पंचम भावगत बुध का फल; 9. पंचम भावगत बृहस्पति का फल; 10. पंचम भावगत शुक्र का फल; 11. पंचम भावगत शनि का फल; 12. पंचम भावगत राहु का फल; 13. पंचम भावगत केतु का फल; 14. पंचम भाव बौद्धिक प्रखरता एवं शिक्षा; 15 पंचम भाव से संदर्भित कतिपय विशेष ग्रहयोग; 16 पुत्र सुखः परिज्ञान एवं परिणाम; 17. मुख्यतः कन्याओं के जन्म हेतु ग्रहयोग; 18. सन्तानहीनता एक अभिशाप; 19. दत्तक पुत्र हेतु ग्रहीय आयाम तथा 20. पंचमेश की महादशा का फल।
जातक सारावली-पंचम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने ‘गागर में सागर’ भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹450.00 -
परिणय निर्णयमंगली योगः विविध संयोग
₹320.00वस्तुतः मंगली योग की विभिन्न सकारात्मक, नकारात्मक एवं अपवादपरक स्थितियों से प्रायः पाठकगण ही नहीं, बल्कि अनेक ज्योतिर्विद भी अनभिज्ञ हैं जो त्रुटिपूर्ण जन्मांग मिलान का हेतु है। मंगली योग से संदर्भित अज्ञानता इस तथ्य से ही परिलक्षित होती है कि अनेक अवसरों पर मंगली कन्या का विवाह अमंगली युवक के साथ सम्पन्न होता है परन्तु उनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धिशाली होता है। जबकि मंगलीदोष के सटीक मिलान के पश्चात् संपादित किए जाने वाले अनेक विवाह प्रायः असफल हो जाते हैं और करुणापूर्ण तथा भयावह विकृति, वैधव्य अथवा विवाह विच्छेद का आधार निर्मित करते हैं। सत्यता यह है कि मंगली दोष के विषय में भारी भ्रांति और भ्रमपूर्ण तथ्य समाज में प्रचलित और प्रतिष्ठित हैं जिनका तलस्पर्शी विश्लेषण, विवेचन कदाचित मंगली दोष सन्निहित यथार्थ एवं मंगली योग: विविध संयोग नामक कृतियों के अतिरिक्त अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। मंगली दोष के विषय की अनभिज्ञता ने ही भारतवर्ष के बहुप्रशंसित, 85 से भी अधिक वृहद् शोध प्रबन्धों के रचनाकार श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने इस विषय की अनिवार्यता को समझा और इन दोनों कृतियों के अन्तर्गत शताधिक जन्मांगों के माध्यम से समस्त ज्योतिष प्रेमियों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है। इस कृति को अग्रांकित 11 भिन्न-भिन्न अध्यायों में विभाजित एवं व्याख्यायित किया गया है –
1. मंगली योग : विविध संयोग; 2. मंगली दोष पर सूर्य का प्रभाव शोध संज्ञान; 3. मंगली दोष पर चन्द्रमा का प्रभाव शोध संज्ञान; 4. मंगली दोष पर बुध का प्रभाव : शोध संज्ञान; 5. मंगली दोष पर बृहस्पति का प्रभाव शोध संज्ञान; 6. मंगली दोष पर शुक्र का प्रभाव : शोध संज्ञान; 7. मंगली दोष पर शनि का प्रभाव शोध संज्ञान; 8. मंगली दोष पर राहु का प्रभाव शोध संज्ञान; 9. मंगली दोष पर केतु का प्रभाव : शोध संज्ञान; 10. महिलाओं हेतु अष्टम भावस्थ मंगल अशुभ परिणाम, तथा 11. मंगलीदोष से रक्षार्थ परिहार विधान।
उल्लेखनीय है कि मंगली दोष के शुभ अथवा अशुभ फल में विविध ग्रहयोगों के कारण वृद्धि अथवा न्यूनता उत्पन्न होती है तथा इस संदर्भ में कदाचित संपुष्ट शोध प्रस्तुत किए जाने का यह प्रथम अवसर है। मंगली दोष पर विविध ग्रहों के प्रभाव से वैवाहिक सुख की स्थिति पूर्णतः रूपांतरित, परिवर्तित अथवा परिमार्जित हो जाती है। इस मर्म को अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मंगली योगः विविध संयोग शीर्षांकित इस कृति में प्रस्तुत किया गया है। मंगली दोष के शमन हेतु अद्भुत एवं अनुभूत मंत्रप्रयोग तथा परिहार विधान कृति का अतिरिक्त आकर्षण है जिसके अनुसरण से लाखों मंगली जातक / जातिकाएं लाभान्वित हुए हैं।
समस्त ज्योतिष प्रेमियों के संज्ञान संवर्द्धन हेतु तथा मंगली दोष के निहितार्थ के तलस्पर्शी अध्ययन हेतु यह कृति पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।₹400.00 -
परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान
₹350.00समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
* परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।₹430.00 -
परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा
₹320.00सृष्टि का प्रत्येक निमिष विशिष्ट और विचित्र होने के साथ-साथ अमूल्य है। कर्म संकुल जीवन में यह अनिवार्य है कि कालदेवता के अंश क्षण का उचित अभिज्ञान हो। इसी विचारधारा के आधार पर ऋषिकल्प व्यक्तियों ने प्रत्येक कार्य के सम्पादन हेतु विशिष्ट क्षण निश्चित किया है। इस क्षणवैशिष्ट्य को मुहूर्त की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। विवाह सदृश अतिमहत्त्वपूर्ण संस्कार हेतु मुहूर्त माहात्म्य सर्वविदित है। सिद्धान्त, संहिता, होरा का सूचक त्रिस्कन्ध ज्योतिष है। मुहूर्त ज्योतिष संहिता के अन्तर्गत विवेच्य है। 1600 ईस्वी में राम दैवज्ञ ने मुहूर्तचिन्तामणि नामक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की संरचना की। वर्तमान में इसी के आधार पर विवाह, द्विरागमन आदि संस्कारों के मुहूर्त रेखांकित किए जाने की प्रथा है।
परिणय परम्परा, जिसके लिए प्राणीमात्र प्रतीक्षारत रहता है और जिसमें पल्लवित व पुष्पित होने वाले प्रणय का परिमाण व प्रमाण अनेक ज्ञात-अज्ञात तत्त्वों पर आश्रित होता है. जिससे कदाचित वर-वधू पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं। विवाह संस्कार के प्रतिपादन और संपादन हेतु उपयुक्त मुहूर्त का चयन भी एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा से परिणय सुख का परिणाम, उसका विकृत होता हुआ प्रारूप और उसमें उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ, विषमताएँ और विघटनकारी स्थितियाँ होती हैं। विवाह हेतु उपयुक्त मुहूर्त के अभाव में सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना का ऋतुराज, उत्तरोत्तर ऋतुपात में रूपांतरित होने लगता है। उपयुक्त मुहूर्त में किसी भी कार्य का संपादन अथवा प्रतिपादन सफलता की संसिद्धि करता है, इसमें किंचित संदेह नहीं।
मुहूर्त जैसे जटिल विषय पर केन्द्रित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु कोई भी ऐसा ग्रन्थ नहीं है जिसमें परिणय सम्बन्धी समस्त मुहूर्त प्रणाली का क्रमबद्ध विवेचन आविष्ठित हो। ज्योतिष शास्त्र की इस आवश्यकता की अभिपूर्ति के उद्देश्य से विश्वविख्यात लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने ‘परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा’ की संरचना की। उपयुक्त वर-वधू तथा विवाह हेतु तर्कसम्मत मुहूर्त का सम्यक् संज्ञान इस कृति में वर्णित है। कृति को अग्रांकित नौ अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है ताकि पाठकगण इसके अध्ययन में किंचित भी भ्रमित न हों 1. विवाह संस्कार एवं प्रकार; 2. परिणय निर्णय : प्रमुख सूत्र; 3. विवाह निर्णय ज्ञातव्य सिद्धान्त; 4. मुहूर्त मीमांसा; 5. गुरु-शुक्र अस्त विचार; 6. विवाह विचार एवं प्रश्न मार्ग; 7. जन्म समय एवं अशुभ काल : ज्ञातव्य सूत्र; 8. गण्डान्त एवं मूल शान्ति विधान, तथा 9. विवाह प्रतिपादन पद्धति।
यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, प्रशंसनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00









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