कालचक्र दशा से फलित
₹70.00₹80.00
पुस्तक के बारे में
वर्तमान समय में जो पुस्तकें कालचक्र दशा में सम्बन्धित है, उनमें ऐसे ही उदाहरणों को रखा गया है जिसमें देहादि संज्ञक राशि या उनके स्वामी पीड़ित हैं। जबकि उन पुस्तकों में ऐसे उदाहरणों को भी रखा जाना चाहिए था जिनमें देहादि संज्ञक राशि दशा में मृत्यु नहीं हुई हो, परन्तु शास्त्रीय सिद्धान्त लागू होते हों, ताकि विद्यार्थीगण दोनों स्थितियों से भिज्ञ हो जाते।
कुछ उदाहरणों में मृत्यु दशा ही गलत लगा रखी है।
कुछ उहाहरणों में प्रथम चक्र की देहादि संज्ञक राशि दशा में मृत्यु होना दर्शाया गया है जबकि जातक द्वितीय चक्र की दशा राशि में मृत्यु को प्राप्त हुआ है।
अन्तर्दशा गणना हेतु परमायु वर्षों के महत्त्व को नहीं बताया गया है।
सोलह वर्ष की किशोरावस्था से ही ज्योतिष के प्रति रुझान के परिणामस्वरूप स्वाध्याय से ज्योतिष सीखने की ललक व गुरु की तलाश में कुमाऊँ क्षेत्र के तत्कालीन प्रकाण्ड ज्योतिर्विदों के उलाहने सहने के बाद भी स्वाध्याय से अपनी यात्रा जारी रखते हुए वर्ष 1985 में वह अविस्मरणीय दिन आया जब वर्षों की प्यास बुझाने हेतु परम गुरु की प्राप्ति योगी भाष्करानन्दजी के रूप में हुई। पूज्य गुरुजी ने न केवल मंत्र दीक्षा देकर मेरा जीवन धन्य किया अपितु अपनी ज्योतिष रूपी ज्ञान की अमृतधारा से सिंचित किया। शेष इस ज्योतिष रूपी महासागर से कुछ बूँदें पूज्य गुरुदेव श्री के० एन० राव जी के श्रीचरणों से प्राप्त हुई। जैसा कि वर्ष 1986 की गुरुपूर्णिमा की रात्रि को योगी जी के श्रीमुख से यह पूर्व कथन प्रकट हुए “कि मेरे देह त्याग के बाद सर्वप्रथम मेरी जीवनी तुम लिखोगे। मैं वैकुण्ठ धाम में नारायण मन्दिर इस जीवन में नहीं बना पाऊँगा। मुझे पुनः आना होगा”। कालान्तर में योगी जी का कथन सत्य साबित हुआ। वर्ष 1997 से प्रथम लेखन 1. योगी भाष्कर वैकुण्ठ धाम में योगी जी के जीवन पर लघु पुस्तिका का प्रकाशन हुआ। तत्पश्चात् 2. हिन्दू ज्योतिष का सरल अध्ययन भाषा टीका 3. व्यावसायिक जीवन में उतार-चढ़ाव भाषा टीका 4. आयु अरिष्ट अष्टम चन्द्र 5. आयु निर्णय 6. परमायु दशा तथा प्रतिष्ठित पत्रों-दैनिक जागरण तथा अमर उजाला में प्रकाशित सौ से अधिक सत्य भविष्यवाणियों के उपरान्त दो वर्षों की अथक खोज के उपरान्त ‘कालचक्र दशा से फलित’ आपके हाथ में ह
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योग पारिजातधन योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
व्याधि वीथिका(निरोग एवं स्वस्थ जीवन )
व्याधि वीथिका अर्थात् व्याधि तंत्र अर्थात् जिन रक्त वाहिनियों, धमनियों एवं शिराओं में रक्त प्रवाहित होता है, उनमें असंतुलन तथा असंयम की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रतिरोधात्मक तत्त्वों की बाहुल्यता के कारण शारीरिक शिथिलता, निर्बलता और दैहिक वेदना की मर्मान्तक पीड़ा, जातक की शारीरिक एवं मानसिक चेतना की क्षति तथा हास, विविध वेदना, विकृति, विषमता उत्पन्न करने वाले शारीरिक द्वन्द को ही व्याधि की विभिन्न स्थितियों से रेखांकित किया गया है। देश के प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित ज्योतिर्विद् श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी ने व्याधि के विविध विचारणीय तत्त्वों तथा तथ्यों के अतिरिक्त बिखरी हुई दुर्लभ एवं दुःसाध्य विषयवस्तु, मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ एवं अनुभूत अनुष्ठानों को व्याधि वीथिका नामक ग्रंथ में संकलित व समायोजित किया है।
व्याधि वीथिका में 10 अध्यायों का वर्णन किया गया है: 1. रोग सुरक्षा सूक्त, 2. रोग रक्षा सूक्त, 2. हृदयाघात रक्षक आदित्य हृदय स्तोत्र, 4. वाल्मिकी रामायण का सुन्दरकाण्ड प्रयोग, 5. महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र, 6. असाध्य व्याधि कथा परिहार विधान, 7. जीवनप्रवर्तक विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र, 8. मृत्युरक्षक इंद्राक्षी स्तोत्र, 9. व्याधि विनाशक हनुमत साधना, 10. व्याधिहर्ता कल्पतरु।
व्याधि वीथिका में ऐसे अन्यान्य अलौकिक, अद्भुत और अनुभूत अनुष्ठान समायोजित हैं जिनसे आत्मरक्षा तो होती ही है, साथ ही साथ आत्महत्या की भी समस्त चेष्टायें व्यर्थ सिद्ध होती हैं। इस कृति के अन्तर्गत ऐसे अनेक कालजयी अनुष्ठान और मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं जिनसे प्रायः पाठकगण अनभिज्ञ हैं।
व्याधि वीथिका की संरचना का मुख्य प्रयोजन पाठकों को विविध मंत्र, स्तोत्र, सूक्त, अनुष्ठान आदि से अवगत कराना है जिनके संपादन प्रतिपादन से साधक, आराधक समस्त व्याधियों, असहनीय संकटों और विभिन्न विकारों, विकृतियों और वेदनाओं आदि से मुक्त होकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार उपयुक्त औषधि के अभिज्ञान के अभाव में किसी व्यक्ति का असमय निधन हो सकता है, उसी प्रकार उपयुक्त परिहार और अनुष्ठान के संज्ञान के अभाव में असाध्य व्याधि से आक्रांत साधक की असमय मृत्यु संभव है जबकि इसके विपरीत उपयुक्त साधना के अनुसरण से वही आराधक पूर्णतः व्याधिमुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। व्याधि वीथिका में ऐसे अनुभव सिद्ध, दुर्लभ अनुष्ठान संकलित हैं, जिनके संपादन से काल पर भी विजय प्राप्त किया जाना संभव है
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शनि दशा फलदीपिका
₹400.00शनि दशाफल दीपिका’ हमारे शीर्षस्थ ज्योतिर्विद् श्री टी.पी. त्रिवेदी के सुदीर्घ, सघन मंथन का नवनीत है। उन्होंने लक्षाधिक जातकों के जन्मांगों का अनुशीलन और प्रायोगिक अन्वेषण करके इस वृहत् ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा इसके माध्यम से एक नव्य सैद्धान्तिकी निर्मित की है।
इसके पूर्व भी श्री त्रिवेदी ‘सैटर्न: द टाइमर’, ‘शनि शमन’, ‘शनि संहिता’ आदि प्रस्थान-ग्रन्थों और शत-सहस्राधिक शोध आलेखों के माध्यम से शनि की अन्तर्दशाओं, उसकी द्वादश राशिगत स्थितियों, उसकी विभिन्न आकृतियों-प्रवृत्तियों, उसके वर्ण, वाहन, दृष्टिफल, गोत्रोत्पत्ति और कारक तत्वों पर सतर्त विमर्श करते रहे हैं।
इस ग्रन्थ की विशिष्टता, बल्कि अनन्यता यह है कि यह जितना शास्त्रानुमोदित है, उतना ही व्यावहारिक अनुभवों, दैनंदिन अभ्यासों और अनुसंधानों पर आधारित है। यह श्री त्रिवेदी की चार दशकों की साधना का सुफल है। निस्संदेह यह उनके बहुआयामी चिंतन-अनुचिंतन से निस्सृत है। इसमें दशाफल निर्धारण, सिद्धान्त का निर्वचन ही नहीं किया गया है, प्रत्युत् जातक की महादशा एवं अन्तर्दशा के शुभाशुभफलों की अनुप्रयोगात्मक संसिद्धि (फलश्रुति) भी अन्तर्घटित की गयी है।
शनि अन्यानेक दुर्भेद्य रहस्यों का पुंज है। इससे संबंधित भौतिक प्रपंच के कोटि-कोटि जातक उपकृत या संत्रस्त हैं। ज्योतिषी जी ने अष्टोत्तरी, विंशोत्तरी महादशा, योगिनी एवं गोचर दशा के शास्त्रीय शनि विषयक अनेक गूढ़, दुःसाध्य तथा जटिल समस्याओं का निदान-समाधान यहां प्रस्तुत किया है। उनके विशिष्ट तथा नितांत निजी स्थान शनि के केंद्रगत, त्रिकोणस्थ, उपचय स्थानगत, त्रिभावस्थ भाव से तथा उनके इष्ट-अनिष्ट प्रतिफल से जुड़े हुए हैं।
₹500.00 -
Secrets of Vaastu Vol. II
₹230.00
Vastu Shastra is an ancient Vidya of structure, which taught the users the art of harmo-nious living with the nature’s field of energy (Jal, Prithvi, Agni, Vayu and Akash). The energies generated by the great elements of Panch Bhootas follow the straight path and the experience of feeling the energy reflection depends upon the shape of the object i e. the Plot On physical level dimension is a measurement of length, breadth and height /depth in con-ventional design. Dimension lines are used to scale and preparation design elements prop-erly
The square is the best shape and thereafter the rectangular with certain restriction on the dimensions. It is not that the other shapes of the plot or the building are unfit for the use or the west or the south directions will bring hardships. The shapes are largely link to generation of energy field. The irregular shapes like triangle, pentagon, circular, etc. will create imbalance in the creation and dispersal of energies. Having a square or rectangular plot/building without proportion to length, breadth and height will be of no use, it is as bad as any other profile because such plot will not generate the adequate energies or vibrations. The volume of space generated and material consumed must be in harmony with the plot/building dimensions. From design perspective if the diinension of the bed/sofa are greater than the dimension of the space, the bed/sofa is too big. The condition is obviously out of balance and may cause much dimensional problems. When an individual is comfortable at physical & emotional level then & then only the spiritual aspects of the individual can be awakened & explored. The more conscious you are about the spiritual aspects of yourself, the greater the experience on the other level. Even without spiritual consciousness when you enhance the energy of a space your sub-conscious mind still recognizes the benefit. Therefore the dimension at physical plain suggest many layers of experience we human beings have like all rounder, self satisfied personality, etc.
₹250.00 -
व्याधि विभावरी( रोगमुक्त जीवन )
₹320.00व्याधि विकार और विविध विकृतियों से विमुक्त होने हेतु किसी सघन और प्रमाणित सामग्री के अभाव ने ही देश के प्रतिष्ठित, विद्वान श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा श्री टी.पी. त्रिवेदी को व्याधि पर केन्द्रित व्याधि विभावरी नामक शोध प्रबन्ध की संरचना हेतु प्रेरित व प्रोत्साहित किया। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक ऐसे मंत्र प्रयोग सन्निहित हैं, जिनके नियमित एवं निरन्तर अनुसरण से कैंसर और एड्स जैसी कर्मज व्याधियों का भी शमन संभव है।
व्याधि विभावरी से तात्पर्य है व्याधिमुक्त करने वाली आनन्दप्रदायक सुखपूर्ण रात्रि। ज्योतिष शास्त्र में विविध वीभत्स व्याधियों के ग्रहयोगों के अनेकानेक विधान व्याख्यायित व विवेचित हैं। व्याधियों की चिकित्सा और निदान की अनिवार्यता भी असंदिग्ध है। किसी भी व्यक्ति के व्याधिग्रस्त होने पर प्रायः महामृत्युंजय जप का परामर्श प्रदान कर दिया जाता है। कब, कहाँ, किस स्थिति में मृत्युंजय मंत्र शीघ्र लाभप्रदायक सिद्ध होगा, इसकी अनिवार्यता असंदिग्ध है। क्या महामृत्युंजय के जप मात्र से कैंसर, एड्स, पक्षाघात, हृदयाघात, लीवर सिरोसिस, ब्रेन हैमरेज व पागलपन जैसी असाध्य व्याधियों की चिकित्सा के समय महामृत्युंजय मंत्रजप का अनुष्ठान करने से अपेक्षित सफलता उपलब्ध हो सकती है? ऐसी असाध्य व्याधियों से मुक्त होने हेतु अनेक विशिष्ट मंत्रजप, स्तोत्र पाठ आदि का सविधि अनुष्ठान संपादन करने से व्याधिग्रस्त व्यक्ति का व्याधिमुक्त होना, अनेक अवसरों पर अनुभवसिद्ध है।
स्वास्थ्य रक्षा हेतु विविध असाध्य व्याधियों से मुक्ति हेतु अनेक दुर्लभ मंत्र अनुष्ठान, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान व्याधि विभावरी के अंतर्गत आविष्ठित हैं। कब, कहाँ, किन स्थितियों में किस मंत्र प्रयोग का अनुकरण करके साधक शीघ्र व्याधिमुक्त हो सकेगा, इसका विस्तृत विवेचन कृति के अग्रांकित अध्यायों में व्याख्यायित व विश्लेषित हैः 1. नवग्रहकृत परिहार, 2. विविध ग्रहकृत व्याधिविधान एवं समाधान, 3. बालरोग शमन साधना, 4. कर्मज व्याधि शमन विधान, 5. मंत्र शक्ति द्वारा व्याधिमुक्ति विधान, 6. ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्म का संत्रास, 7. गण्डमूल में जन्म : अनिष्ट शमन, 8. अशुभ जन्म समय संज्ञान, 9. गंभीर व्याधि परिहार परिज्ञानः प्रबल मारकेश शमन विधान, 10. अथर्ववेद के अन्तर्गत व्याधि शमन विधान, 11. गुरु परम्परा : सिद्ध अनुष्ठान।
असाध्य व्याधि से आक्रांत व्यक्ति हेतु व्याधि विभावरी में सन्निहित मंत्र प्रयोग, अनुष्ठान आदि संजीवनी सिद्ध होंगे, इसमें किंचित सन्देह नहीं है। व्याधि विभावरी मात्र ज्योतिषियों अथवा ज्योतिष प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी व्यक्तियों के लिए पठनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय शोध प्रबन्ध है।
₹400.00 -
शुक्र दशाफलदीपिका
शुक्र दशाफल दीपिका को अग्रांकित 20 अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है जिसमें शुक्र की महादशा के फल के साथ-साथ शुक्र की महादशा के मध्य अन्तर्दशाओं का भी विस्तृत अनुसंधानात्मक अध्ययन पाठकों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया गया है। इस कृति में जहाँ एक ओर समस्त ज्योतिष शास्त्र के शास्त्रीय ग्रंथों में व्याख्यायित उन श्लोकों का उल्लेख है जो ऋषियों ने अब से सैकड़ों या सहस्रों वर्ष पूर्व लिखे थे, वहीं दूसरी ओर इतने लम्बे अंतराल के उपरान्त प्रकृति में होने वाले परिवर्तन ने दशाफल निरूपण में जिस प्रकार के अद्भुत, अविश्वसनीय और समयानुरूप परिवर्तन किये हैं, जिन्हें पूर्णतः समझ पाने के लिए हमने ज्योतिष शास्त्र में दशाफल पर केन्द्रित अपने 40-45 वर्षों के अनुभव और साधना का मर्मस्पर्शी, प्रखर, संज्ञानात्मक, अध्ययनात्मक उपयोग करने के उपरान्त प्रबुद्ध पाठकों के कल्याणार्थ इस कृति को साकार स्वरूप प्रदान किया है।
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जातकसारावलीप्रथम भाव
₹320.00ग्रन्थ-परिचय
ज्योतिष शास्त्र के अभिनव अभिज्ञान के अन्यान्य शोध सिद्धान्तों के अभ्युदय के इस अभियान के रत्नमण्डित सोपान के प्रथम सुरमित सूत्र परिज्ञान को जातक सारावली-प्रथम *भाव से शीषांकित किया गया है। इसके अंतर्गत समस्त ज्योतिष शास्त्रों के सौरभूत सिद्धांतों एवं शोध सूत्रों के सम्यक् संकलन की अनिवार्यता सभी ज्योतिष प्रेमी अनादि काल से अनुभव करते रहे हैं जिसका आचार्यानुमोदित समाधान कृति की संरचना का सार्वभौमिक, सार्वलौकिक प्रयोजन है।
भारतवर्ष के बहुप्रतिष्ठित ज्योतिर्विद श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी.पी. त्रिवेदी ने विविध ग्रन्थों एवं ज्योतिष शास्त्रों से स्वर्णिम सिद्धान्तों का सतर्कतापूर्वक चयन एवं संकलन करके इस कृति में सुंदर स्वरूप में सुव्यवस्थित व समायोजित किया है ताकि प्रखर जिज्ञासुओं व समस्त ज्योतिष प्रेमियों को एक ही स्थल पर अधिकाधिक ज्योतिष शास्त्र का तलस्पर्शी संज्ञान उपलब्ध हो सके और सत्य व सटीक भविष्यकथन करने में सफलता प्राप्त हो।
ग्रहों की विविध भाव स्थिति, भावाधिपति की पृथक् पृथक् भाव स्थिति का फल, विभिन्न भावों के स्वामियों के लग्नगत होने का परिणाम, लग्नगत ग्रहों के साथ अन्य ग्रहों की युति तथा दृष्टि आदि का सम्यक् विवेचन इस कृति का वैशिष्ट्य है।
कृति को बारह अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण भागों में विभाजित, व्याख्यायित तथा अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित किया गया है- 1. ग्रहीय आयाम एवं राशि चक्र, 2. ज्योतिष शास्त्र के सारभूत सूत्र, 3. फलित ज्योतिष के स्वर्णिम सिद्धान्त, 4. नवांश : सन्निहित यथार्थ, 5. प्रथम भाव फल निर्णय, 6. समय संज्ञान एवं समीक्षा, 7. शनि-शुक्र अथवा शुक्र-बृहस्पति की दशान्तर्दशा, 8. लग्न में नवग्रहों की स्थिति के अनुसार फलाफल, 9. लग्नगत विभिन्न राशियों का फलाफल, 10. लग्नेश के भिन्न-भिन्न भावगत होने का फलाफल, 11. लग्न में विभिन्न ग्रह युति फल, तथा 12. प्रमाणित, प्रतिष्ठित एवं परीक्षित प्रयोग।
जातक सारावली-प्रथम भाव के अन्तिम अध्याय में ज्योतिष शास्त्र के सौ से अधिक ऐसे ज्ञातव्य शोध सूत्रों को प्रस्तुत किया गया है जो कदाचित अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। यह सिद्धान्त सूत्र, भविष्यकथन में आश्चर्यजनक सत्यता, सूक्ष्मता, सतर्कता, सहज ही परिलक्षित करते हैं।
जातक सारावली-प्रथम भाव ज्योतिष शास्त्र का रत्नमण्डित अमृत कलश है, जिसमें सन्निहित समस्त सिद्धान्तों को आत्मसात् कर लेने की अनिवार्यता असंदिग्ध है क्योंकि लेखकद्वय ने गागर में सागर भरने की श्रमसाध्य चेष्टा की है। जातक सारावली-प्रथम भाव समस्त ज्योतिष प्रेमियों और अध्येताओं के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय, अनुकरणीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
समृद्धि सूत्रVol 2
समृद्धि सूत्र’ ज्योतिष की मात्र सामान्य संरचना न होकर समृद्धि से सम्बन्धित प्रथम शास्त्रानुमोदित विस्तृत शोध प्रबन्ध है; कालांतर में जिसकी प्रशंसा, प्रतिष्ठा, परिचर्चा तथा गणना ज्योतिष के श्रेष्ठ शास्त्रों में सम्मिलित की जायेगी। समृद्धि से सम्बन्धित यह कृति स्वर्णिम शोध प्रस्तुत करने वाला माता लक्ष्मी का प्रसादामृत है जिसमें समृद्धि से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का समाधान सन्निहित है। ऐसे शोध प्रबन्ध की अनिवार्यता ने, जिसमें जन्मांग में विद्यमान विभिन्न ग्रहयोगों के अध्ययन, अनुसंधान और अनुभूति के आधार पर जातक की समृद्धि एवं सम्पन्नता की परिसीमा का सशक्त संज्ञान एवं सटीक अनुमान उपलब्ध हो सके तथा समृद्धि पथ के आरोह अवरोह, उन्नति अवनति, स्थिरता अथवा अस्थिरता के पूर्णतः स्पष्ट एवं सम्यक् संज्ञान का सारस्वत, शाश्वत सूत्र स्थापित हो सके, उसके निमित्त शास्त्रानुकूल वेदविहित समग्र ग्रन्थगर्भित सूत्रों का सतत्, सतर्क, सघन, सबल अध्ययन और अनुसंधान का अनुकरण करके, उस विशुद्ध प्रतिष्ठित, प्रामाणिक, प्रशंसित प्राञ्जल प्रारूप को ‘समृद्धि सूत्र’ से शीर्षांकित करके समस्त ज्योतिष प्रेमियों, प्रबुद्ध जिज्ञासुओं, शोध छोत्रों तथा शास्त्रान्वेषियों के संसुप्त संज्ञान की जागृति हेतु अभिनव अभियान के पावन पथ के सुदृढ़ एवं सुरुचिपूर्ण सेतु का निर्माण सम्पन्न किया गया है, जो अनेक वर्षों की सघन साधना के उपरान्त अब आपके कर कमलों में सुशोभित है।
‘समृद्धि सूत्र’ का आधार स्तम्भ ज्योतिष के सारगर्भित शास्त्र हैं जिनमें ऋषि-महर्षि ने अपनी अन्तर्दृष्टि को एकाग्र करके, मानव के अर्थ कल्याण को ध्यान में रखते हुए धन, वैभव, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य के संपूर्ण स्वर्णिम सिद्धांत सूत्र के स्पष्ट वर्णन की है तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वृहत्पादक, मानसागरी, फलदीपिका, उत्तरकालामृत, पूर्वकलामृत, ज्योतिष पारिजात, सारावली, ज्योतिषमार्ग, होरारत्न, जातितत्त्वम्, ज्योतिषतत्त्वम्, जातकाभरणम्, जातकालंकार, सर्वार्थ चिंतामणि, खेटकौतुकम्, वृद्धयवनजातक, जातक भूषणम्, होरासार, भृगुसूत्र, भावकौतुहलम्, जातकसारदीप, शम्भुहोराशास्त्र, फलमार्तण्ड, सत्यजातकम्, वृहद्द्योतिषसार, भावार्थ रत्नाकर तथा वृहदरत्नाकर आदि की संरचना। सभी ग्रंथों में धन, ऐश्वर्य, वैभव, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से लेकर सन्दर्भित मंदिरों तक 1100 टुकड़े, नौ खंड और दो खंडों में भंडारित और प्राचीन बताकर उनके दर्शन एवं प्रखर सुरुचिपूर्ण विवेचन, व्याख्या, विश्लेषण एवं विभाजन का वर्णन किया गया है।
‘समृद्धि सूत्र’ की व्याख्या जिन नौ खण्डों में की गई है, वे अग्रांकित शीर्षकों से नामांकित हैं:- 1. लाभ भाव (एकादश भाव) 2. धन भाव (द्वितीय भाव) 3. भाग्य भाव (नवम भाव) 4. व्यय भाव (द्वादश भाव) 5. पूर्व पुण्य भाव (पंचम भाव) 6. धनयोग 7. निर्धन योग 8. सुख समृद्धि से संदर्भित शोध साधना एवं सम्बन्धित जन्मांगों की विस्तृत व्याख्या 9. धन, समृद्धि एवं सम्पन्नता से सम्बन्धित समय संज्ञान की प्रविधि।
समृद्धिशाली अथवा विपन्न होने के सन्दर्भ में सहस्राधिक सूत्रों को स्मरण रखना सामान्य पाठक के लिए संभव नहीं है। ‘समृद्धि सूत्र’ में अर्थवान् अथवा अर्थहीन बनने से सम्बन्धित विभिन्न ग्रन्थों में व्याख्यायित सहस्त्रों सूत्रों के विकल्प के रूप में एक शोध सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसके अनवरत अगाध अनुसंधान में लेखकद्वय का तीस वर्ष से भी अधिक समय व्यतीत हुआ। यह शोध सिद्धान्त, ‘समृद्धि सूत्र’ का सर्वस्व है।










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