आयु निर्णय शोध सिद्धांत एवं प्रयोग

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जातक के जन्मांग पर नाना प्रकार के राजयोग-धनयोग आदि पर विचार करने से पूर्व प्रत्येक ज्योतिषी को सर्वप्रथम जातक की आयु पर विचार करना चाहिये। यदि जातक को आयु ही प्राप्त न हो, तो ज्योर्तिविद के फलादेशों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग जाती है। आयु जैसे दुरूह विषय में परांगत होना अत्याधिक दुष्कर कार्य है तथा प्राचीन विद्वानों, ऋषि-मुनियों द्वारा ज्योतिष में किए गए कार्य सर्वप्रथम तो पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है, जो उपलब्ध हैं भी उनमें विभिन्न प्रकार का मत-मतान्तर देखने को मिलता है। जिसका एक कारण तो अनुवाद की त्रुटि है, दूसरा कारण उपलब्ध साहित्य की अपूर्णता। प्राप्त ग्रन्थों में आयु-निर्णय की अनेक गणितीय तथा अन्य विधियाँ दी गई हैं। यथा – अंशायु, पिण्डायु, निर्सगायु, अष्टकवर्गायु, योगायु तथा जैमिनी पद्धिति से आयु निर्धारण आदि का वर्णन मिलता है।

उक्त सभी पद्धतियों से जैमिनी ऋषि का PAM (पाम) सिद्धान्त तथा महर्षि पाराशर के योगायु के सिद्धान्तों को परस्पर समावेश कर आयु के निकटतम स्थूल बिन्दु को प्राप्त किया जा सकता है, चूंकि यह बहुत ही गूढ़ विषय है अतः इस कलिकाल की अल्पायु में इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है।

यद्यपि जैमिनी ऋषि के सिद्धान्त अपने आप में परिपूर्ण और सत्यता के अत्याधिक निकट माने जाते हैं। परन्तु, उनके सिद्धान्तों को सरलीकृत कर समझने के लिये ऋषि ज्योतिषी योगी के०एन० राव जी जैसी दिव्यात्माओं की आवश्यकता है। अन्यथा जैमिनी ज्योतिष की उपलब्ध भाषा टीकाओं के मत-मतान्तर रूपी मकड़ाजाल में एक जिज्ञासु ज्योतिष उलझकर रह जाएगा।

जातक के जन्मांग पर नाना प्रकार के राजयोग-धनयोग आदि पर विचार करने से पूर्व प्रत्येक ज्योतिषी को सर्वप्रथम जातक की आयु पर विचार करना चाहिये। यदि जातक को आयु ही प्राप्त न हो, तो ज्योर्तिविद के फलादेशों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग जाती है। आयु जैसे दुरूह विषय में परांगत होना अत्याधिक दुष्कर कार्य है तथा प्राचीन विद्वानों, ऋषि-मुनियों द्वारा ज्योतिष में किए गए कार्य सर्वप्रथम तो पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है, जो उपलब्ध हैं भी उनमें विभिन्न प्रकार का मत-मतान्तर देखने को मिलता है। जिसका एक कारण तो अनुवाद की त्रुटि है, दूसरा कारण उपलब्ध साहित्य की अपूर्णता। प्राप्त ग्रन्थों में आयु-निर्णय की अनेक गणितीय तथा अन्य विधियाँ दी गई हैं। यथा – अंशायु, पिण्डायु, निर्सगायु, अष्टकवर्गायु, योगायु तथा जैमिनी पद्धिति से आयु निर्धारण आदि का वर्णन मिलता है।

उक्त सभी पद्धतियों से जैमिनी ऋषि का PAM (पाम) सिद्धान्त तथा महर्षि पाराशर के योगायु के सिद्धान्तों को परस्पर समावेश कर आयु के निकटतम स्थूल बिन्दु को प्राप्त किया जा सकता है, चूंकि यह बहुत ही गूढ़ विषय है अतः इस कलिकाल की अल्पायु में इसे पूरी तरह समझ पाना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है।

यद्यपि जैमिनी ऋषि के सिद्धान्त अपने आप में परिपूर्ण और सत्यता के अत्याधिक निकट माने जाते हैं। परन्तु, उनके सिद्धान्तों को सरलीकृत कर समझने के लिये ऋषि ज्योतिषी योगी के०एन० राव जी जैसी दिव्यात्माओं की आवश्यकता है। अन्यथा जैमिनी ज्योतिष की उपलब्ध भाषा टीकाओं के मत-मतान्तर रूपी मकड़ाजाल में एक जिज्ञासु ज्योतिष उलझकर रह जाएगा।

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