
अनिष्ट ग्रह उपचार
सभी द्वादश भावों में शुभ व अशुभ प्रभाव के योग दिए हैं। इसके बाद उपचार संबंधी मंत्र, स्तोत्र व कवच दिए हैं। पुस्तक का आरंभिक उपाय के उपयोग दृष्टिने वाले पाँच उदाहरणों से हुआ है। इसके बाद ग्रहों पर नक्षत्रों का प्रभाव तथा उपचार के सिद्धान्त पर चर्चा हुई है। अध्याय 4 में अनिष्ट ग्रह गोचर में वैदिक मंत्र का उपयोग तथा अध्याय 5 में कुछ सरल व सटीक उपचारों पर चर्चा हुई है
| Category: | Alpha |
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शिशु चिन्तन
₹360.00शिशु सृष्टि के सृजन का सशक्त, शाश्वत व सार्वभौमिक सत्य है। दाम्पत्य सुख के शीर्ष पर अभिव्यक्त सुखद संपदा है शिशु चिन्तन की सौरभ सुधा। वस्तुतः शिशु, दाम्पत्य सुख की दिशा और गति-मति तथा वंश परम्परा की प्रगति एवं निरन्तरता की अभिलाषा, आकांक्षा और उपलब्धि का अभिनव अभियान एवं अलौकिक आनन्द, अंतरंग आह्लाद का अद्भुत संगम है। पुरुष एवं स्त्री की पूर्णता और महत्ता, उनकी सृजनात्मक गुणवत्ता से ही प्रतिष्ठित और प्रशंसित होती है। शिशु की उत्पत्ति पुरुष को पितृत्व के प्रसाद तथा नारी को मातृत्व की गरिमा से अलंकृत और अभिषिक्त करती है। शिशु चिन्तन के अन्तर्गत ज्योतिष शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में शिशु पक्ष की सर्वकोणीय व्याख्या तथा सांगोपांग अध्ययन और अनुभवपरक अनुसंधान आविष्ठित हैं। अनेक दम्पत्ति शिशु जन्म के संत्रास से संतप्त हैं। शिशु की बालसुलभ किलकारियों का गुंजन, कब कानों में अमृतधारा का संचार करेगा? गर्भस्थ संतान का स्वरूप कैसा होगा? संतान वियोग से अभिशप्त जीवन, संतान सुख से कब अभिषिक्त होगा? संतान अपने माता-पिता के लिए भाग्यशाली सिद्ध होगी अथवा नहीं?
सन्तति जन्म के प्रकार और प्रसंग, शिशु सुख के तत्त्व एवं तत्त्वार्थ, बालारिष्ट योग की विविध स्थितियाँ तथा बालारिष्ट भंग योग की संरचना, कन्या संतति का प्रादुर्भाव, गर्भक्षति एवं गर्भ रक्षा के योग तथा संततिहीनता से रक्षार्थ विविध अद्भुत एवं अनुभूत परिहार विधान शिशु चिन्तन का वैशिष्ट्य हैं। कृति को अग्रांकित 10 अध्यायों में व्याख्यायित, विवेचित और विश्लेषित किया गया है:
1. संततिहीनता का संत्रास एवं संतति सुख का मधुमास, 2. संतति स्वरूप : सहज संज्ञान, 3. कन्या संतति का प्रादुर्भाव, 4. गर्भ रक्षा, 5. संतति वियोग, 6. सर्वाधिक प्रबल बालारिष्ट योग, 7. मध्य बालारिष्ट योग, 8. किशोरावस्था में बालारिष्ट योग, 9. बालारिष्ट भंग, 10. संतान दोष परिहार।
शिशु चिन्तन के अन्तर्गत अनेक दुर्लभ मंत्र प्रयोग, स्तोत्र पाठ तथा अनुष्ठान विधान आदि आविष्ठित हैं जिनके उपयोग से सहस्त्रों सन्तानहीन दम्पत्ति शिशु जन्म से अभिगुंजित और अभिसिंचित हुए हैं और उन्हें अपने जीवन की सम्पूर्णता की सशक्त अनुभूति होने का स्वर्णिम आभास हुआ है। सन्तान प्रतिबन्धक ग्रहयोग व उपाय, वंश विच्छेद, विपुत्र योग, अशुभ जन्म का विचार के अन्तर्गत अमावस्या में जन्म तथा उसके उपाय, कृष्णचतुर्दशी में जन्म व निवारण, भद्रा, संक्रान्ति, एक नक्षत्र, ग्रहण, गण्डान्त, मूल. तथा त्रिखल में जन्म व निवारण, आश्लेषा, मघा, रेवती, अश्विनी में जन्म का फल आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण ज्योतिष के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हितकारी व मार्गप्रदर्शक सिद्ध होगा।शिशु चिन्तन संतान पक्ष पर केन्द्रित एक अलौकिक ग्रन्थ है जिसमें शिशु पक्ष से संबंधित सघन शोध व अनुसंधानपरक विषयवस्तु सन्निहित है। कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, जिज्ञासु छात्रों, प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय, अनुकरणीय व संग्र
₹450.00 -
चद्र दशा फलदीपिका
₹400.00चन्द्रमा अनादि काल से सौन्दर्य का प्रतीक स्वीकारा गया है। चन्द्रमा के दर्शन मात्र से जीवन की अनेक क्लिष्ट स्थितियों के समाधान का पथ प्रशस्त होता है। दर्शन करने में चन्द्रमा जितना निर्मल कोमल और स्वच्छ प्रतीत होता है, वास्तव में देह उतना ही जटिल है। चन्द्रमा के महत्व को समझना सुगम है परंतु उसके वास्तविक फलाफल का सटीक विवेचन अधिक दुःसाध्य है। पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण करने वाला चन्द्रमा, पृथ्वीवासियों पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है इसीलिए चन्द्रमा को जन्मांग का प्राप्ण घोषित किया गया है। चन्द्रमा का बलाबल और स्थिति ही जन्मांग की प्रबलता या निर्बलता का आधार है। चन्द्रमा की विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित अनुकूल-प्रतिकूल फलाफल का तलस्पर्शी अध्ययन और उसके क्रियान्वयन हेतु अनेक शोधपरक सिद्धान्तों तथा विशिष्ट सूत्रों का उपयुक्त समायोजन चन्द्र दशाफल दीपिका में किया गया है ताकि चन्द्रमा की दशान्तर्दशा के अन्तर्गत होने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं का सटीक आकलन किया जाना संभव हो सके।
इस कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है जिनके अध्ययन से चन्द्रमा की महादशा व अंतर्दशा के विषय में सम्यक् संज्ञान प्राप्त करके सटीक भविष्यकथन किया जा सकता है: 1. ग्रहस्थिति एवं फलकथन, 2. भावगत दशाफल विवेचन, 3. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रग्रह का महत्व, 4. विविध भावगत चन्द्रमा की दशा का फल, 5. बारह जन्म राशियों का फल. 6. बारह राशियों में चन्द्रमा का फल, 7. लग्न फल, 8. विविध लग्नों के लिए भावगत चन्द्रमा का फल. 9. चन्द्रमा की महादशा का संभावित फलाफल, 10. चन्द्रमा की महादशा का फल, 11. चन्द्रमा की महादशा के मध्य अंतर्दशाओं का फल, तथा 12. चन्द्र पीड़ा परिहार विधान।
यह एक व्यावहारिक और ज्योतिष शास्त्र पर केन्द्रित शताधिक शोध प्रबन्धों के रचनाकार ज्योतिर्विदों का प्रथम प्रयास है कि विंशोत्तरी दशा पर केन्द्रित प्रत्येक ग्रह की महादशा और अंतर्दशाओं का इतना वृहद, संपुष्ट और अनुभूत फलकथन दशाफल दीपिका की श्रृंखला के अंतर्गत किया जाना संभव हो सका। सर्वविदित है-कि विश्व में सबसे अधिक उपयोग विंशोत्तरी दशाओं का ही होता है इसलिए इस दशाफल दीपिका श्रृंखला को विंशोत्तरी दशाओं तक ही सीमित रखा गया है। विश्वास है कि विंशोत्तरी दशाफल से सम्बन्धित कृति के अध्ययन की आंकाक्षा व समस्त दशाओं की संरचना के परिणाम से सम्बन्धित जिज्ञासा का सशक्त सारभूत व सारगर्भित समाधान है चन्द्र दशाफल दीपिका जो प्रबुद्ध पाठकों, जिज्ञासु छात्रो व ज्योतिष शास्त्र के अध्येताओं के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।
₹500.00 -
परिणय निर्णयवैबाहिक विसंगतियाँ ज्योतिषीय संदर्भ
₹350.00कैटिक निबंद के अनानकारी स्थितियों का प्रमुख कारण वर-वधू के जगाम के उपगुण किनान के अभाव के साथ-साथ उनके जन्मागों में विद्यमान नकारात्मक सहयोग होते हैं जो नाटिक विसंगतियों नितिगों, विघटनकारी स्थितियों, किकृत मानसिकताओं के अतिसित विवाह विछेद अथवा कैय का आधार निर्मित करते हैं। इन महगोगों का विस्तृत विन तथा तलस्पर्शी व्याख्या परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियाँ: ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक कृह में प्रस्तुत की गई है।
किसह निछेद अनाग के लिए उत्तरदागी अन्यान्य ग्रहयोगों तथा विवाह विकेद काल के विभिन्न समीकरणों का परस्पर समायोजन इस कृति में अनेक व्यावहारिक निशिष्य समीकरण भी पाठकों के संज्ञानार्थप्रस्तुत किए गए हैं
कैटिक निगटन तथा निद के समस्त संत्रास का अंत करके उसे प्रणयपूर्ण परिणाम में स्तरित करने हेतु नीति और अनुभूत परिहार विधान इस कृति का लेशिय है। कैटिक विसंगतियों निगटनकारी स्थितियों और विच्छेद के कारण उत्पन्न होने वाले कान कैटिक जीवन पर केन्द्रित शासानुमोदित आचार्यानुमोदित, वेदविहित, गर्भित मस्त और अपनों से अभिपूरित परिश्रम-साध्य कार्य, विश्वविख्यात एटीई दिदी ने पाठकों के प्रबल और अनवरत आग्रह कणकने दागिनों का निर्वाह किया है। कृति को अगाकित पाँच अध्यायों में निभाका व्याख्यानित किया गया है 1. विवाह विच्छेदः काल परिज्ञान; 2. वैधव्य का करुण कंदन ग्रहों का स्पन्दन 3. वत्त विधान वैवाहिक विघटन, वैधव्य एवं विच्छेद का सुगम समाधान 4. पार्वती मंगल स्तोत्र, तथा 5. वांछा कल्पलता स्तोत्र
कैटिक एमके इंदगी रंगों के खेन सभी जातिकाएँ बाल्यकाल से ही देखते हैं परनु कैग का करण कन्दन अपना विवाह विछेद के दुर्दमनी दारुण दुख की किंचित सम्मानना भी उनके मन को प्रमित कर देती है जिसका पूर्वानुमान, परिणय निर्णय-वैवाहिक विसंगतियों ज्योतिषीय सन्दर्भ नामक इस कृति के अय्यन, अनुभव, कान और अगाधर पर किया जा सकना सम्भव है। विवाह की मीमांसा करने से पूर्व विवाह के पश्नमष्णिका संज्ञान अति आवश्यक है जिसका पूर्वानुमान निकि कैसटिक निरामय निगिनिषमश्, विश्श् व विनाश के वीभत्स ताण्डव के की कारु/जा अभिभावकों को सचेत और सतर्क कर युक्त में समर्थ है। समस्त ज्योतिषनियों के सड़ान सार्द्धन हेतु यह कृति पठनीय अनुकरणीय सराहनीय एवं समहणीग है।
₹430.00 -
गीता मंत्र गंगोत्री
₹290.00श्रीमद्भगवद्गीता को महाकाव्य महाभारत का प्राण स्वीकारा गया है जो धरतीवासियों के लिए प्रार्थना पथ नहीं, बल्कि अलौकिक प्रसादामृत और पंचामृत है जिसकी एक बूँद ही मानव का ब्रह्म में विलय करके उसे मोक्षगति प्रदान करके अमरत्व की ओर प्रशस्त करती है। श्रीमद्भगवदगीता की मंत्रशक्ति से प्रायः अधिकांश भक्तजन, साधक, आराधक, पाठक तथा जिज्ञासुगण अनभिज्ञ हैं जिसे प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना अपेक्षित है। गीता की मंत्रात्मक शक्ति एवं उसकी व्याख्या, गीता मंत्र गंगोत्री में सहज और सघन स्वरूप में सन्निहित है। गीता मंत्र गंगोत्री बारह अध्यायों में व्याख्यायित विभाजित है जिन्हें अग्रांकित नामों से शीर्षांकित किया गया है:
₹350.00 -
योग पारिजातभाग्य योग
₹360.00टी.पी. त्रिवेदी
श्रीमती मृदुला त्रिवेदीयोग पारिजात में समस्त प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित, प्रशंसित, प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के प्रमाणित शास्त्रीय ग्रन्थों के मनन, मन्धन और चिन्तन के अथक प्रयास, परिश्रमसाध्य साधना के उपरान्त विविध विशिष्ट ग्रहयोगों को व्यावहारिक जन्मांगों के निकष पर परख कर, उनका स्पष्ट सतर्क श्रृंखलाबद्ध चयन और संकलन करके प्रबुद्ध पाठकों को अनादिकाल से चली आ रही जिज्ञासा का सम्यक्, संपुष्ट, सारगर्भित, सार्वभौमिक, सर्वजनहितार्थ समाधान से संदर्भित ग्रहयोगों से सम्बन्धित तथा व्यक्ति के व्यवसाय, व्यस्तता, विलासिता की उपलब्धता, प्रभुता, अधिकारों की समग्रता, ऐश्वर्य, कीर्ति, वैभव, सम्पत्ति, समृद्धि, सत्ता, सम्पदा, सौभाग्य के अतिरिक्त सिंहासन तथा राज्य प्राप्ति के अन्यान्य योगों के साथ-साथ विपन्नता, दरिद्रता, चिन्ता, विपत्ति, विनाश, विफलता, विकृति, व्यवधान, अवरोध, अनैतिकता, दुर्भाग्य, दुर्दमनीय दारुण दुखों की व्यथा, धनहानि, आस्था तथा विश्वास की निर्बलता, धूर्तता, दैहिक सबलता तथा पुष्टता से सम्बन्धित सभी ग्रहयोगों तथा पाठकों की जिज्ञासा का तर्कसंगत विवेचन, विवरण, व्यावहारिक विश्लेषण सहित प्रत्युत्तर सन्निहित, समाहित व समायोजित है।
किसी भी जन्मांग से सम्बन्धित भविष्य के आकलन हेतु ग्रहयोगों का विस्तृत, सारगर्भित, सारस्वत व तलस्पर्शी अध्ययन, अनुभव, अभ्यास और अनुसंधान का महत्व सर्वोपरि है जिसके अभाव में जातक की प्रभुता, सत्ता, संपदा, समृद्धि तथा प्रशासन आदि से संदर्भित सटीक अनुमान सम्भव नहीं है।
योग पारिजात को 1. राजयोग, 2. भाग्य योग, 3. धन योग, तथा 4. अनुपम योग से शीर्षांकित किया गया है जिसके अंतर्गत 850 प्रामाणिक, शास्त्रगर्भित तथा आचार्यानुमोदित ग्रहयोग, विविध व्यावहारिक जन्मांगों के उदाहरण सहित सन्निहित हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य और चन्द्रमा से संदर्भित ग्रहयोग, केन्द्रत्रिकोण राजयोग, महापुरुष राजयोग, महाभाग्य योग, अखण्ड साम्राज्य योग, उच्चस्थ ग्रहकृत राजयोग, राशिकृत राजयोग, विपरीत राजयोग, नीचभंग तथा राजभंग ग्रहयोग, विपन्नता प्रदायक ग्रहयोग, नाभस योग, नवांश संदर्भित शुभ और अशुभ ग्रहयोग तथा नवांश चक्र पर आधारित राजयोग आदि शीर्षांकित विविध अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में वर्णित ग्रहयोगों को ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक धरातल पर परखकर तथा सहस्रों जातकों, जातिकाओं आदि के जन्मांगों पर क्रियान्वित करने के उपरान्त जिज्ञासु पाठकों के कल्याणार्थ योग पारिजात में सुरुचिपूर्ण स्वरूप में समायोजित किया गया है।₹450.00 -
परिणय निर्णयविवाह समय संज्ञान
₹350.00समस्त सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह हेतु विवाह एक संकल्प है जो तन-मन और मस्तिष्क को, कर्तव्य और प्रेम की भावना से आलोकित, आंदोलित, प्रमुदित व प्रफुल्लित करता है। विवाह एक संस्कार है जिसे सर्वत्र शास्त्र, समाज, संस्कृति एवं न्याय की सहमति, अनुमति प्राप्त है। विवाह समय संज्ञान नामक यह कृति उन अन्यान्य संकल्पों और ज्योतिष प्रेमियों के प्रबल अनुरोध का प्रतिफल है, जो विवाह प्रतिपादन के सटीक समय से संदर्भित, प्रामाणिक, प्रतिष्ठित शोध सिद्धान्तों के अभाव में अंकुरित, प्रस्फुटित हुए थे, जिनके क्रियान्वयन और अनुकरण द्वारा विवाह का सटीक समय सरलता से रेखांकित किया जा सकता है। हमारे समाज में सदा से ही व्याप्त विवाह के असंतुलित समीकरण के संज्ञान के सम्यक् समाधान से अभिपूरित यह कृति, विवाह काल निर्धारण हेतु हीरक हस्ताक्षर सिद्ध होगी। विवाह जीवन को दो पृथक-पृथक् भागों में विभाजित करता है। प्रथम विवाह के पूर्व का जीवन, द्वितीय- विवाह के उपरान्त का जीवन। अतः विवाह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना है और इस विषय में भी अधिकांश ज्योतिर्विदों का भविष्यकथन प्रायः मिथ्या सिद्ध होता है जो ज्योतिष विज्ञान की प्रामाणिकता के समक्ष प्रश्नचिहन लगा देता है। विवाह का सटीक समय रेखांकित न कर सकने का कारण इस विषय का अपूर्ण ज्ञान और अनभिज्ञता ही है। कदाचित आज तक किसी ने भी विवाह समय संज्ञान के संदर्भमें इतने तलस्पर्शी, सघन शोध प्रबन्ध की संरचना नहीं की, जिसके अध्ययन अनुसरण और अभ्यास से विवाह के सटीक समय का पूर्वानुमान किया जा सके। विवाह के समय से संदर्भित अन्यान्य शोध सिद्धान्तों की प्रामाणिकता को शताधिक भिन्न-भिन्न उदाहरणों द्वारा प्रदर्शित और परिलक्षित करके विषय की जटिलता को सुगम स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विवाह समय संज्ञान का वैशिष्ट्य है, जिसे परिज्ञान पक्ष एवं परिहार पक्ष के अंतर्गत तेरह अग्रांकित अध्यायों में विभाजित व व्याख्यायित किया गया है:
* परिज्ञान पक्ष: 1. ज्योतिष विज्ञान एवं विवाह में व्यवधान; 2. शास्त्रानुमोदित विवाह समय संज्ञान सूत्र; 3. विवाह काल निर्णय संदर्भित अनुसंधान; 4. विवाह समय संज्ञान प्रविधिः 5. गोचर का शनि सुनिश्चित करता है, विवाह का समय; 6. विवाह काल निर्धारण में गोचर के मंगल एवं शुक्र की भूमिका: 7. प्रौढ़ावस्था में विवाह; 8. विवाह प्रतिबन्धक योग का विस्तृत विवेचन, परिहार पक्ष 9. शीघ्र, सुखद एवं अखण्ड वैवाहिक सुख हेतु आध्यात्मिक उपचार, 10. ग्रह शान्ति: विविध विधान; 11. कन्याओं के विवाह में अवरोध से रक्षार्थ अनुभूत मंत्र प्रयोग, 12. कन्याओं के शीघ्र एवं सुखद विवाह हेतु स्तोत्र आराधना, एवं 13. पुरुषों के विवाह में व्यवधान का समाधान।
अतः विवाह के समय के संदर्भ में सत्य घटित होने वाले शोध सिद्धान्तों को ज्योतिष शास्त्र के यशस्वी एवं बहुप्रशंसित लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी तथा टी.पी. त्रिवेदी ने इस कृति में प्रस्तुत किया है, जो समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय एवं संग्रहणीय है।₹430.00 -
परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा
₹320.00सृष्टि का प्रत्येक निमिष विशिष्ट और विचित्र होने के साथ-साथ अमूल्य है। कर्म संकुल जीवन में यह अनिवार्य है कि कालदेवता के अंश क्षण का उचित अभिज्ञान हो। इसी विचारधारा के आधार पर ऋषिकल्प व्यक्तियों ने प्रत्येक कार्य के सम्पादन हेतु विशिष्ट क्षण निश्चित किया है। इस क्षणवैशिष्ट्य को मुहूर्त की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। विवाह सदृश अतिमहत्त्वपूर्ण संस्कार हेतु मुहूर्त माहात्म्य सर्वविदित है। सिद्धान्त, संहिता, होरा का सूचक त्रिस्कन्ध ज्योतिष है। मुहूर्त ज्योतिष संहिता के अन्तर्गत विवेच्य है। 1600 ईस्वी में राम दैवज्ञ ने मुहूर्तचिन्तामणि नामक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की संरचना की। वर्तमान में इसी के आधार पर विवाह, द्विरागमन आदि संस्कारों के मुहूर्त रेखांकित किए जाने की प्रथा है।
परिणय परम्परा, जिसके लिए प्राणीमात्र प्रतीक्षारत रहता है और जिसमें पल्लवित व पुष्पित होने वाले प्रणय का परिमाण व प्रमाण अनेक ज्ञात-अज्ञात तत्त्वों पर आश्रित होता है. जिससे कदाचित वर-वधू पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं। विवाह संस्कार के प्रतिपादन और संपादन हेतु उपयुक्त मुहूर्त का चयन भी एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य है जिसकी उपेक्षा से परिणय सुख का परिणाम, उसका विकृत होता हुआ प्रारूप और उसमें उत्पन्न होने वाली विसंगतियाँ, विषमताएँ और विघटनकारी स्थितियाँ होती हैं। विवाह हेतु उपयुक्त मुहूर्त के अभाव में सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना का ऋतुराज, उत्तरोत्तर ऋतुपात में रूपांतरित होने लगता है। उपयुक्त मुहूर्त में किसी भी कार्य का संपादन अथवा प्रतिपादन सफलता की संसिद्धि करता है, इसमें किंचित संदेह नहीं।
मुहूर्त जैसे जटिल विषय पर केन्द्रित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं परन्तु कोई भी ऐसा ग्रन्थ नहीं है जिसमें परिणय सम्बन्धी समस्त मुहूर्त प्रणाली का क्रमबद्ध विवेचन आविष्ठित हो। ज्योतिष शास्त्र की इस आवश्यकता की अभिपूर्ति के उद्देश्य से विश्वविख्यात लेखकद्वय श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं टी.पी. त्रिवेदी ने ‘परिणय निर्णय मुहूर्त मीमांसा’ की संरचना की। उपयुक्त वर-वधू तथा विवाह हेतु तर्कसम्मत मुहूर्त का सम्यक् संज्ञान इस कृति में वर्णित है। कृति को अग्रांकित नौ अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है ताकि पाठकगण इसके अध्ययन में किंचित भी भ्रमित न हों 1. विवाह संस्कार एवं प्रकार; 2. परिणय निर्णय : प्रमुख सूत्र; 3. विवाह निर्णय ज्ञातव्य सिद्धान्त; 4. मुहूर्त मीमांसा; 5. गुरु-शुक्र अस्त विचार; 6. विवाह विचार एवं प्रश्न मार्ग; 7. जन्म समय एवं अशुभ काल : ज्ञातव्य सूत्र; 8. गण्डान्त एवं मूल शान्ति विधान, तथा 9. विवाह प्रतिपादन पद्धति।
यह कृति समस्त ज्योतिष प्रेमियों, अधिकांश ज्योतिर्विदों, जिज्ञासु पाठकों तथा प्रखर छात्रों के लिए पठनीय, अनुकरणीय, प्रशंसनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है।
₹400.00 -
शुक्र दशाफलदीपिका
शुक्र दशाफल दीपिका को अग्रांकित 20 अध्यायों में व्याख्यायित और विभाजित किया गया है जिसमें शुक्र की महादशा के फल के साथ-साथ शुक्र की महादशा के मध्य अन्तर्दशाओं का भी विस्तृत अनुसंधानात्मक अध्ययन पाठकों के कल्याणार्थ प्रस्तुत किया गया है। इस कृति में जहाँ एक ओर समस्त ज्योतिष शास्त्र के शास्त्रीय ग्रंथों में व्याख्यायित उन श्लोकों का उल्लेख है जो ऋषियों ने अब से सैकड़ों या सहस्रों वर्ष पूर्व लिखे थे, वहीं दूसरी ओर इतने लम्बे अंतराल के उपरान्त प्रकृति में होने वाले परिवर्तन ने दशाफल निरूपण में जिस प्रकार के अद्भुत, अविश्वसनीय और समयानुरूप परिवर्तन किये हैं, जिन्हें पूर्णतः समझ पाने के लिए हमने ज्योतिष शास्त्र में दशाफल पर केन्द्रित अपने 40-45 वर्षों के अनुभव और साधना का मर्मस्पर्शी, प्रखर, संज्ञानात्मक, अध्ययनात्मक उपयोग करने के उपरान्त प्रबुद्ध पाठकों के कल्याणार्थ इस कृति को साकार स्वरूप प्रदान किया है।








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